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कहां गई गौरैया की चहचहाट

याद है, जब छोटे थे, तब स्कूल जाने के लिए अलह सुब्बह उठाया जाता था, यह कहकर देखो चिडिया आई, देखो कौआ आया, वो देखो मोर आया। घर की मुण्डेर पर छोटी सी चिडिया चहकती रहती, और उठकर स्कूल के लिए तैयार होने लगते। गरमी में कोयल की कूक मन को अलग ही सुकून देती थी।
 
शांति स्वरूप गौड़
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मिट्टी के कोरे कूंडे टंगे हैं...

गरमी से बेहालप्यासी चिड़ियों के लिएघने दरख्तों की शाख़ों परठंडे पानी से भरे मिट्टी के कोरे कूंडे टंगे हैं...किसी न ख़त्म होने वालेसवाब की तरह...-फ़िरदौस ख़ान
 
फ़िरदौस ख़ान
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एक सम्वेदना

चढते हुए पारे ने चालीस का स्तर पार कर लिया हैपरिंदे प्यास के मारे दम तोड़ रहे हैं...आइए... अपनी सम्वेदनशीलता को जीवित करेंअपने घर, आँगन, छत, मुंडेर, बाग, बगीचे, कहीं भीएक बरतन में पानी रखेंउन परिंदों के लिए, उनके जीवन के लिएधरोहर हैं ये हमारी...
 
SAMVEDANA KE SWAR