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उदास रात बहुत बेक़रार करती है

उदास रात बहुत बेक़रार करती है एक वादा-ए-वफ़ा जिस पे है मौक़ूफ़ हयात लुत्फ़ ये देखिये क्या क्या निहां है उल्फ़त में मुद्द'आ मुझ से नहीं गो कि है शरीक़-ए-हयात सिवा अब और हो क्या कम नसीबियों का करम दुआ इक सहर की थी पाई है बस रात ही रात मौकूफ = मुल्तवी,
 
अमिताभ मीत
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"जले तो जलाओ गोरी ..." : पहचानिये ये आवाज़!

यूं ही दफ्तर से आ के कुछ पढ़ रहा था और कुछ सुन रहा था ..... लीजिये एक अल्हड़ सा .... मचलता सा गीत सुनिए ........ और पहचानिये ये आवाज़ किस की है .......चंद शेर याद आये .. वो भी पेश हैं ....."दफ़्न कर सकता हूँ सीने में तुम्हारे राज़ को और तुम चाहो तो अफ़साना
 
अमिताभ मीत
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कौन कहता है तुझे मैं ने भुला रखा है

रोने से और इश्क में बेबाक हो गए धोये गए हम ऐसे, कि बस पाक हो गए कहता है कौन नालः-ए-बुलबुल को बे असर पर्दे में गुल के लाख जिगर चाक हो गए करने गए थे उस से तगाफ़ुल का हम गिला की एक ही निगाह कि हम ख़ाक हो गए ग़ालिबशाम हो ... तन्हाई हो ..... किसी की याद आई हो
 
अमिताभ मीत
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अहमद 'फ़राज़' : एक नज़्म ..... एक ग़ज़ल

किसी ज़माने में एक छोटी से नज़्म पढ़ी थी अहमद फ़राज़ की ..... तब न जाने क्यों अच्छी लगी थी सो कहीं नोट कर के रख ली थी .... आदतन. आज अचानक नज़र पड़ी उस पे और इत्तेफ़ाक़ से आज ही ये ग़ज़ल भी सुन रहा था "फ़राज़" की ...... आज के दौर के बेहतर शायरों में से एक,