उदास रात बहुत बेक़रार करती है
उदास रात बहुत बेक़रार करती है एक वादा-ए-वफ़ा जिस पे है मौक़ूफ़ हयात लुत्फ़ ये देखिये क्या क्या निहां है उल्फ़त में मुद्द'आ मुझ से नहीं गो कि है शरीक़-ए-हयात सिवा अब और हो क्या कम नसीबियों का करम दुआ इक सहर की थी पाई है बस रात ही रात मौकूफ = मुल्तवी,
Jan 07 2010 08:43 PM



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