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राँझा राँझा

प्रायद्वीपीय भारत को पछाड़ती, दक्षिण से उत्तर की ओर भागती एक रेलगाड़ी में गुलज़ार द्वारा फ़िल्म ’रावण’ के लिए लिखा गीत ’राँझा राँझा’ सुनते हुए… बड़ा मज़ेदार किस्सा है… शुरुआती आलाप में कहीं गहरे महिला स्वर की गूँज है. और बहती हवाओं की सनसनाहट
 
मिहिर
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सात खून माफ़ ?

नोट: इस पाठ्यांश के सारे पात्र सत्य हैं. आशाओं के विपरीत, कल्पना से इनका दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं है. संधू (मदारी): अबे! तू इतना घबराया क्यूँ है… करीम (बन्दर): कुछ नहीं सरकार! बस गर्मी है संधू: नहीं लगती तो बात कुछ और है…छिपाता क्यूँ है
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सात खून माफ़ ?

नोट: इस पाठ्यांश के सारे पात्र सत्य हैं. आशाओं के विपरीत, कल्पना से इनका दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं है. संधू (मदारी): अबे! तू इतना घबराया क्यूँ है… करीम (बन्दर): कुछ नहीं सरकार! बस गर्मी है संधू: नहीं लगती तो बात कुछ और है…छिपाता क्यूँ है
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यंहा ख्वाब भी टांगो पर चलते है

बड़ी लम्‍बी-सी मछली की तरह लेटी हुई पानी में ये नगरीकि सर पानी में और पाँव जमीं पर हैंसमन्‍दर छोड़ती है, न समन्‍दर में उतरती हैये नगरी बम्‍बई की...जुराबें लम्‍बे-लम्‍बे साह‍िलों की, पिंडलियों तक खींच रक्‍खी हैसमन्‍दर खेलता रहता है पैरों से लिपट करहमेशा
 
मोक्ष
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ओशियंस में गुलज़ार और विशाल की जुगलबन्दी

ओशियंस में गुलज़ार और विशाल भारद्वाज साथ थे. बात तो ’कमीने’ पर होनी थी लेकिन शुरुआत में कुछ बातें संगीत को लेकर भी हुईं. बातों से सब समझ आता है इसलिए हर बात के साथ उसे कहने वाले का नाम जोड़ना ज़रूरी नहीं लगता. सम्बोधन से ही सब साफ़ हो जाता है. वहीं ग
 
मिहिर
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“शंकर शैलेन्द्र को हिन्दी सिनेमा का सबसे बड़ा गीतकार कहा जा सकता है.” -गुलज़ार.

इस बार के ओशियंस में प्रस्तुत गुलज़ार साहब का पर्चा “हिन्दी सिनेमा में गीत लेखन (1930-1960)” बहुत ही डीटेल्ड था और उसमें तीस और चालीस के दशक में सिनेमा के गीतों से जुड़े एक-एक व्यक्ति का उल्लेख था. वे बार-बार गीतों की पंक्तियाँ उदाहरण के रूप में पेश कर
 
मिहिर
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बस तेरा नाम ही मुकम्मल है.............

अक्टूबर शनिवार शाम से शुरू हुए ओसियान सिनेफ़ैन फ़िल्म समारोह की शुरुआत "गुलज़ार साहब को सम्मानित किये जाने के साथ" होने की खबर बहुत सुखद लगी.......इस बरस की शुरुआत में भी तब बहुत अच्छा लगा था जब ऑस्कर में उनके "जय हो" ने हम भारतियों को बरसों की साध पू
 
singhsdm
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इसे कहते हैं धमाकेदार शुरुआत!

इस बार के ओशियंस में लाइफ़ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित हुए गुलज़ार साहब समारोह के डायरेक्टर जनरल मणि कौल के हाथों तैयार किया प्रशस्ति पत्र ग्रहण कर बैठने को हुए ही थे कि अचानक मंच संचालक रमन पीछे से बोले, “गुलज़ार साहब, हमने आपके लिए कुछ सरप्राइज़
 
मिहिर
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बदहवास शहर में फंसी जिन्दगियों की कहानी : कमीने

उस शाम सराय में रविकांत और मैं मुम्बई की पहचान पर ही तो भिड़े थे. ’मुम्बई की आत्मा महानगरीय है लेकिन दिल्ली की नहीं’ कहकर मैंने एक सच्चे दिल्लीवाले को उकसा दिया था शायद. ’और इसी महानगरीय आत्मा वाले शहर में शिवसेना से लेकर मनसे तक के मराठी मानुस वाले
 
मिहिर
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’तुम जो कह दो तो आज की रात चाँद डूबेगा नहीं’, कमीने संगीत समीक्षा.

मैं झमाझम बारिश से भीगती बस में था. यह शाम का वही वक़्त था जिसके लिये एक गीतों भरी प्रेम कहानी में कभी गुलज़ार ने लिखा था कि सूरज डूबते डूबते गरम कोयले की तरह डूब गया… और बुझ गया! गुड़गांव से थोड़ा पहले महिपालपुर क्रॉसिंग पर जहाँ मेट्रो की नई बनी लाइन
 
मिहिर
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