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धरातल

मनुष्य प्राणी है पृथ्वी लोक का। हर हाल में जुडे रहना है धरती से। जब छूट जाती है धरती, जीने लगता है देव लोक में, इंद्रियों के सहारे, बुद्धि के सहारे प्राणों के सहारे, तब उखड जाते हैं पांव जमीन से। जवाब देने लगता है शरीर, छूटने लगते हैं सहारे डरने लगता है
 
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नकेल हाथ में लें

हमारा जीवन आशाओं, अपेक्षाओं और आकांक्षाओं के साथ आगे बढ़ता है। जीवन किसी दर्शन के साथ लक्ष्य की ओर चले तो लक्ष्य प्राप्त हो जाता है। केवल व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए जीना पशु भाव है। संवेदना, सह्वदयता एवं वसुधैव कुटम्बकम् की अवधारणा ही मनुष्य को बड़ा बनाती
 
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भूषण

भूषण, आभूषण, अलंकरण, प्रसाधन, परिष्कार आदि शब्द एक ही परिवार से सम्बन्ध रखते हैं। भ+उ+ष+ण। प्रभावशाली, शक्तिशाली अभिव्यक्ति अथवा विषय का प्रकाशन करना। इसमें व्यक्ति एवं विषय दोनों समाहित हंै। समाज भूषण, देश भूषण जैसे पर्याय भी हैं। आभूषण शब्द व्यवहार में
 
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बड़ा बनाने वाले!

बहुत बड़े थे शेखावत सा.। राजनीति में तो कहते हैं कि संवेदना होती ही नहीं। उन्हें सत्ता के अलावा कुछ दिखाई भी नहीं देता। अधिकांश राजनेता खूब बहादुरी से झूठ ही बोलते हैं। निष्ठुर एवं घोर स्वार्थी भी होते हैं। हो सकता है शेखावत सा. में भी किसी ने ये गुण
 
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बस भोगवाद

ऎसा क्यूं होता है कि, भारतीय सभ्यता, संस्कृति और जीवन शैली से जुड़े मुद्दों के खिलाफ “अघिकांश कानूनों” का निर्माण तभी हुआ जब-जब केन्द्र में कांग्रेस सत्ता में रही। इनमें से अघिकांश विदेशी संस्कृति अथवा शुद्ध वोटों की राजनीति पर आधारित थे।
 
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रसविहीन

कोई देखे तो झगडना मां-बेटे का उन मुद्दों पर जो कभी थे नहीं परिवारों में जब से पनपने लगी है सोच समानता की स्वतंत्रता की स्त्री दूर होती गई अपनी भूमिका से चूल्हा-चौका अब नहीं काम उसका नौकर बनाने लगा खाना भावहीन-नीरस कैसे संतुष्ट हो बालक रोज झगडता है अच्छे
 
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पुनरागमन

पूरब की दुल्हन पश्चिम का दूल्हा मिल गए न जाने कैसे मानते थे भीतर से तो हैं सभी बराबर सभी एक से, यह भरम टूट गया कुछ सालों में विचारों का भेद मिलने नहीं देता दोनों को अहंकार तैयार नहीं झुकने को। पहले घायल हुई दुल्हन चली गई साथ पूरबिया के छोड़कर अपनी लाड़ली
 
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भय

किसी भी रोग के मूल में व्यक्ति के भाव ही होते हैं। शरीर की विभिन्न ऊर्जाओं का संचलन भावों के द्वारा ही प्रतिपादित होता है। भावों के कारण ही ऊर्जाएं सन्तुलित रहती हैं और ऊर्जाओं का असन्तुलन ही रोगों का मूल कारण बनता है। रोगों की शुरूआत भीतर से होती है और
 
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किसके साथ

पशुभाव है कर्म ज्ञान के बिना ज्ञान भी बन जाता है विष बिना उपयोग के। पैदा किसने किया अज्ञान को कौन करता है इसको विकसित फिर भी होता है बहुत बडा ज्ञान से असीम-अनंत। सर्वाधिक त्रस्त होते हैं ज्ञानी ही अज्ञान से ज्ञान के अहंकार से दुत्कारते हैं अपने ही कर
 
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