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गुलजारगी...आवारगी...हर कुछ मेरे गुलजार में

जब कोई पूछता है कि गुलजार तुम्हें क्यों पसंद है तो मैं जवाब देने के लिए पल भी नहीं सोचता, बस कह देता हूं- गुलजार हमारी भाषा बोलते हैं। मेरे लबों पर तुंरत उनकी यह त्रिवेणी आ जाती है- आओ सारे पहन लें आईने.. सारे देखेंगे अपना ही चेहरा..सबको सारे हंसी लगेंगे
 
गिरीन्द्र नाथ झा
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इतने अरसे बाद" हेंगर "से कोट निकाला ......

गुलजार साब, नमक इश्क का और जय हो कहने वाले गुलजार साब। अभी उनकी हर जगह जय हो हो रही है, जरी वाले रहमान के साथ। वैसे यह कोई नई बात नहीं है। उनकी जय तब से हो रही है, जब उन्होंने कहा था- मोरा गोरा अंग लई ले..... । खैर, अभी उनकी त्रिवेणी में डूबकी लगाकर
 
गिरीन्द्र नाथ झा