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इखि ई पिरथिमा ये हि जलम मां

नरेन्द्र सिंह नेगी जी द्वारा गाये बहुत से गाने ऐसे है जिनमें उपमायें, भाव पूरी तरह से नये तरीके हैं। कुछ गाने आप पहले भी सुन चुके हैं जैसे रोग पुराणु कटे ज़िन्दगी नई ह्वैगे, तेरु मुल – मुल हैंसुणु दवाई ह्वैगे या फिर त्यारा रूप कि झौल मां, नौंणी सी ज्यू
 
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साँस छिन आस-औलाद तुमारी हमारी डाली – झम्म

उत्तराखंडी लोक गायक पर्यावरण को बचाने, पेड़ों को ना काटने का संदेश देते हुए लोकगीत गाते रहे हैं। ऐसे ही कुछ गीत हम पहले ही आपको सुना चुके हैं जैसे आवा दिदा भुलौं आवा, नांग धारति की ढकावा , डाळि बनबनी लगावा या डाल्यूं ना काटा चुचो डाल्यूं ना काटा, या फिर
 
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धार मां कु गेणुं पार देख ऐ गे

इस साइट पर आप इससे पहले नरेन्द्र सिंह नेगी जी का गाना “मुल-मुल कैकु हैंसणि छै तू” सुन चुके हैं, जिसमें एक युवती जंगलों के पौधों को अपना मित्र मानते हुए उनसे अपने दिन की बात कह रही है। इसी तरह जंगलों में अपने मवेशियों को चराने गये दल के एक
 
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जिसका आप बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं ..वह घड़ी आ गयी

और अब जिसका आप बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं , यानी ब्लॉग पर मालविका लाईव का प्रसारण ...!आयोजक ने बताया, कि " ....मात्र दस दिनों में १६२ पोस्ट .....१०० से अधिक रचनाकार ....५० से ज्यादा महिला चिट्ठाकारों की उपस्थिति....देश के प्रत्येक क्षेत्र के १७ शलाका
 
रवीन्द्र प्रभात
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घाघरी का घेर, ब्योलि बौ-सैमन्या बौ

प्रस्तुत गाना नेगी जी के लोकप्रिय गानों में से एक है। बारात में आया हुआ एक युवक (देवर) अपनी होने वाली भाभी (दुल्हन) के साथ सामान्य परिचय व हल्की-फुल्की मजाक कर रहा है। ऐसे ही काल्पनिक संवाद के आधार पर यह गाना बना है। देवर अपनी भाभी के साथ परिचय बढाना चाह
 
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यह लीजिये खजाने की चाबियों का गुच्छा!

आज की पोस्ट में कोई गाना नहीं सुनायेंगे पर आपको गाने के खजाने की चाबी नहीं बल्कि चाबियों का गुच्छा ही थमा देंगे। लूट लें जितना लूटने की हिम्मत आपमें है। अन्तर्जाल पर गाने सुनाने वाले बहुत से जालस्थल हैं, पर वे सिर्फ फिल्मवाइज गाने ही सुनाते हैं या फिर
 
सागर नाहर
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तुम भी सूणां मिन सुणियाली, गढ़वाल ना कुमौं जालि

असली लोककलाकार वही है जो जनता की भावना को अपनी कला के माध्यम से प्रसारित करे। सच्चे कलाकार का यह दायित्व नरेन्द्र सिंह नेगी जी सदैव निभाते रहे हैं। पहाड़ की जनता के दुखदर्द और उनकी अपेक्षाओं को अपने गीतों के माध्यम से समाज के बीच रखने का उन्होने हमेशा
 
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गरा रा रा ऐगे रे बरखा झुकि ऐगे

नरेन्द्र सिंह नेगी द्वारा गाये गये सभी गीतों में इस गाने की एक विशेष पहचान है। नेगी जी ने इस गाने के माध्यम से यह सजीव दृश्य सामने रखा है कि एक छोटे से गांव में अप्रत्याशित रूप से बारिश की बूंदे गिरने लगे तो सामान्य जीवन किस तरह अस्त-व्यस्त हो जाता है।
 
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ऐतिहासिक फ़िल्मी गीतों के पीछे का इतिहास..

परदे पर दिखने फिल्म में परदे के पीछे भी बहुत कुछ ऐसा घटित होता जो उस फिल्म के इतिहास का हिस्सा बन जाता है। हालाँकि परदे के पीछे के इस इतिहास की खबर आम लोगों तक कम ही पहुँच पाती है। चलिए ऐसे ही कुछ दिलचस्प किस्सों केसाथ आज इस ब्लॉग पोस्ट का सफ़र पूरा करते
 
Season..
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रंग नीलु उंचा अगास को – दिखैंणा कुई नीलु

नरेन्द्र सिंह नेगी के गानों में कोमल मानवीय भावनाएं तथा जीवन का सार अन्तर्निहित रहता है। यह सुन्दर गाना देखिये-एक युवक किसी अत्यन्त सुन्दर युवती से कुछ सवाल पूछ रहा है। सामान्य रूप से देखने पर इस गाने के बोल प्रेमी द्वारा प्रेमिका को रिझाने के लिये बोले
 
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सात समौंदर पार च जाणा ब्वै, जाज मां जोंलु कि ना

नरेन्द्र सिंह नेगी जी के अधिकांश गीत पारम्परिक लोकसंगीत की विभिन्न विधाओं पर आधारित होते हैं। प्रस्तुत लोकगीत "खुदेड़ गीत" का एक बेहतरीन उदाहरण है। "खुदेड़ गीत" उत्तराखण्ड के विरह वेदना, स्मृति और वियोग से भरे पारम्परिक गीत हैं। (खुद+एड़,
 
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रोग पुराणु कटे ज़िन्दगी नई ह्वैगे, तेरु मुल – मुल हैंसुणु दवाई ह्वैगे

नरेन्द्र सिंह नेगी जी ने बहुत से प्रेम-गीत गाये हैं लेकिन उनके गाये कुछ प्रेम गीत ऐसे  हैं जिसमें प्रेम को लेकर एक नये तरीके के उपमानों का प्रयोग किया गया है उदाहरण के लिये उनके गाये त्यारा रूप कि झौल मां, नौंणी सी ज्यू म्यारु को ही लें जिसमें
 
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रोग पुराणु कटे ज़िन्दगी नई ह्वैगे, तेरु मुल – मुल हैंसुणु दवाई ह्वैगे

नरेन्द्र सिंह नेगी जी ने बहुत से प्रेम-गीत गाये हैं लेकिन उनके गाये कुछ प्रेम गीत ऐसे  हैं जिसमें प्रेम को लेकर एक नये तरीके के उपमानों का प्रयोग किया गया है उदाहरण के लिये उनके गाये त्यारा रूप कि झौल मां, नौंणी सी ज्यू म्यारु को ही लें जिसमें
 
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रोग पुराणु कटे ज़िन्दगी नई ह्वैगे, तेरु मुल – मुल हैंसुणु दवाई ह्वैगे

नरेन्द्र सिंह नेगी जी ने बहुत से प्रेम-गीत गाये हैं लेकिन उनके गाये कुछ प्रेम गीत ऐसे  हैं जिसमें प्रेम को लेकर एक नये तरीके के उपमानों का प्रयोग किया गया है उदाहरण के लिये उनके गाये त्यारा रूप कि झौल मां, नौंणी सी ज्यू म्यारु को ही लें जिसमें
 
श्री भीष्म कुकरेती जी
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द्वी दिन की हौरि छ अब खैरि- मुट्ट बोटीकि रख

उत्तराखंड राज्य प्राप्ति आन्दोलन में अनेक लोगों ने योगदान दिया। कुछ लोग शहीद हुए तो कुछ लोगों नें अपनी कलम के माध्यम से अपनी बात रखी, चाहे वह गिरीश चन्द्र तिवारी ‘गिर्दा’ हों या फिर नरेन्द्र सिंह नेगी। नेगी जी के गाये कुछ गीत जैसे “मथि
 
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द्वी दिन की हौरि छ अब खैरि- मुट्ट बोटीकि रख

उत्तराखंड राज्य प्राप्ति आन्दोलन में अनेक लोगों ने योगदान दिया। कुछ लोग शहीद हुए तो कुछ लोगों नें अपनी कलम के माध्यम से अपनी बात रखी, चाहे वह गिरीश चन्द्र तिवारी ‘गिर्दा’ हों या फिर नरेन्द्र सिंह नेगी। नेगी जी के गाये कुछ गीत जैसे “मथि
 
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आवा दिदा भुलौं आवा, नांग धारति की ढकावा , डाळि बनबनी लगावा

वनों पर मानव समाज की निर्भरता हमेशा से ही रही है, लेकिन बढते जनसंख्या के दवाब और औद्यौगिकरण के लिये जंगलों के अनियंत्रित दोहन से असन्तुलन की चिन्ताजनक स्थिति पैदा हो चुकी है। इस समय “ग्लोबल वार्मिंग ” और अन्य पर्यावरणीय मुद्दों पर
 
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आवा दिदा भुलौं आवा, नांग धारति की ढकावा , डाळि बनबनी लगावा

वनों पर मानव समाज की निर्भरता हमेशा से ही रही है, लेकिन बढते जनसंख्या के दवाब और औद्यौगिकरण के लिये जंगलों के अनियंत्रित दोहन से असन्तुलन की चिन्ताजनक स्थिति पैदा हो चुकी है। इस समय “ग्लोबल वार्मिंग ” और अन्य पर्यावरणीय मुद्दों पर
 
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रंग-रंगिलि बहार ऐगे होरी की

बसंत का मौसम उल्लास, प्रेम, नवजीवन का प्रतीक है। बसंत के मौसम में पृकृति अपने पूरे यौवन पर होती। इस मौसम में उत्तराखंड की धरती भी दुल्हन की तरह सज जाती है। इसी लिये नरेन्द्र सिंह नेगी जी कहते हैं “मेरा डांडी काण्ठियों का मुलुक जैल्यु, बसन्त रितु मा
 
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मैं नि करदु त्वैं से ते बात, बोल चिट्ठी किले नि भैजि

नरेन्द्र सिंह नेगी जी के गाये युगल प्रेम-गीत श्रोताओं का मनमोहते रहे है। चाहे वह ज्यू त यन बौनूं च आज नाच नाचि की या फिर त्यारा रूप कि झौल मां, नौंणी सी ज्यू म्यारु हो। आज प्रस्तुत है उन्ही का गाया एक और प्रेम गीत। नरेन्द्र नेगी जी ने यह प्रसिद्ध युगल
 
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ठण्डो रे ठण्डो, मेरा पहाड़ै की हव्वा ठण्डी – पाणि ठण्डो

पहाड़ और ठण्ड – दोनों शब्द एक दूसरे के पूरक लगते हैं। पहाड़ शब्द सुनते ही ऐसा लगता है जैसे कहीं दूर से आती हुई किसी ठण्डे, निर्मल हवा के झौंके ने दिल-दिमाग को ठण्डा कर दिया हो। पहाड़ से जुडे इसी शीतलता के अहसास को नरेन्द्र नेगी जी ने इस बेहद सुन्दर
 
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भलु लगुदु भनुलि तेरु माठु-माठु हिटणु हेss भलु लगुदु

नरेन्द्र सिंह नेगी जी के गाये सैकड़ों गीतों में यह युगल गीत अपेक्षाकृत नया माना जा सकता है । यह उनकी सर्वाधिक बिक्री होने वाली वीडियो सीडी "नौछमी नरैण" में रिलीज हुआ था। इस गीत के बोल बाजूबन्द शैली के कवित्त में लिखे गये हैं, इस तरह के बोलों को
 
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छाना बिलौरी कै भलो लांगुं, छाना बिलौरी का ज्वाना

कुमाऊंनी भाषा का एक बहुत पुराना लोकगीत है – “छाना बिलौरी झन दिया बौज्यू, लागनि बिलोरिक घाम“। इस गाने में एक युवती अपने पिता से मनुहार करती है कि उसकी शादी छाना बिलौरी नामक गांव/इलाके में न की जाये क्योंकि वहाँ अनेक प्रकार के कष्ट है और
 
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परसि बटि लगातार, बारि-बारि कू बुखार, चड़्यू च रे डाग्टार, मोर्दु छौं उतार-उतार

नरेन्द्र सिंह नेगी जी के गाये गये सैकड़ों गीतों में हर शैली के गीत उपलब्ध हैं। इन गीतों में बहुत विविधताएं देखने को मिलती है, लेकिन सभी गीत मानवीय भावों के उत्कृष्ट चित्रण, सुन्दर बोलों और मधुर संगीत से सजे हैं। प्रस्तुत गीत नेगी जी ने
 
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