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बच्चन – कविता – जो बीत गई सो बात गई

जो बीत गई सो बात गई जीवन में एक सितारा था माना वह बेहद प्यारा था वह डूब गया तो डूब गया अम्बर के आनन को देखो कितने इसके तारे टूटे कितने इसके प्यारे छूटे जो छूट गए फिर कहाँ मिले पर बोलो टूटे तारों पर कब अम्बर शोक मनाता है जो बीत गई सो [...]
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बच्चन – कविता – कोई बिरला विष खाता है

कोई बिरला विष खाता है! मधु पीने वाले बहुतेरे, और सुधा के भक्त घनेरे, गज भर की छातीवाला ही विष को अपनाता है! कोई बिरला विष खाता है! पी लेना तो है ही दुष्कर, पा जाना उसका दुष्करतर, बडा भाग्य होता है तब विष जीवन में आता है! कोई बिरला विष खाता है! स्वर्ग
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रमानाथ अवस्थी – कविता – जिसे नहीं कुछ चाहिए

जिसे नहीं कुछ चाहिए, वही बड़ा धनवान। लेकिन धन से भी बड़ा, दुनिया में इन्सान। चारों तरफ़ मची यहाँ भारी रेलमपेल। चोर उचक्के खुश बहुत, सज्जन काटें जेल। मतलब की सब दोस्ती देख लिया सौ बार। काम बनाकर हो गया, जिगरी दोस्त फ़रार। तेरे करने से नहीं, होगा बेड़ा
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अज्ञेय – कविता – मैंने आहुति बन कर देखा

मैं कब कहता हूँ जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने, मैं कब कहता हूँ जीवन-मरू नंदन-कानन का फूल बने? काँटा कठोर है, तीखा है, उसमें उसकी मर्यादा है, मैं कब कहता हूँ वह घटकर प्रांतर का ओछा फूल बने? मैं कब कहता हूँ मुझे युद्ध में कहीं न तीखी चोट मिले? मैं कब
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कैलाश वाजपेयी – कविता – ऐसा कुछ भी नहीं

ऐसा कुछ भी नहीं जिंदगी में कि हर जानेवाली अर्थी पर रोया जाए. काँटों बीच उगी डाली पर कल जागी थी जो कोमल चिंगारी, वो कब उगी खिली कब मुरझाई याद न ये रख पाई फुलवारी. ओ समाधि पर धूप-धुआँ सुलगाने वाले सुन! ऐसा कुछ भी नहीं रूपश्री में कि सारा युग खंडहरों में
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बच्चन – कविता – रीढ़ की हड्डी

मैं हूँ उनके साथ,खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़ कभी नही जो तज सकते हैं, अपना न्यायोचित अधिकार कभी नही जो सह सकते हैं, शीश नवाकर अत्याचार एक अकेले हों, या उनके साथ खड़ी हो भारी भीड़ मैं हूँ उनके साथ, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़ निर्भय होकर घोषित करते, जो
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रामावतार त्यागी – कविता – एक भी आँसू न कर बेकार

एक भी आँसू न कर बेकार जाने कब समंदर माँगने आ जाए पास प्यासे के कुँआ आता नहीं है यह कहावत है अमरवाणी नहीं है और जिसके पास देने को न कुछ भी एक भी ऎसा यहाँ प्राणी नहीं है कर स्वयं हर गीत का श्रंगार जाने देवता को कौन सा भा जाय चोट खाकर टूटते हैं सिर्फ
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सर्वेश्वरदयाल सक्सेना – कविता – उठ मेरी बेटी सुबह हो गई

पेड़ों के झुनझुने, बजने लगे; लुढ़कती आ रही है सूरज की लाल गेंद। उठ मेरी बेटी सुबह हो गई। तूने जो छोड़े थे, गैस के गुब्बारे, तारे अब दिखाई नहीं देते, (जाने कितने ऊपर चले गए) चांद देख, अब गिरा, अब गिरा, उठ मेरी बेटी सुबह हो गई। तूने थपकियां देकर, जिन
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गिरिजाकुमार माथुर – कविता – हम होंगे कामयाब

होंगे कामयाब, होंगे कामयाब हम होंगे कामयाब एक दिन हो-हो मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास हम होंगे कामयाब एक दिन होंगी शांति चारो ओर होंगी शांति चारो ओर होंगी शांति चारो ओर एक दिन हो-हो मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास होंगी शांति चारो ओर एक दिन हम
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अशोक वाजपेयी – कविता – समय से अनुरोध

समय, मुझे सिखाओ कैसे भर जाता है घाव?-पर एक अदृश्य फाँस दुखती रहती है जीवन-भर. समय, मुझे बताओ कैसे जब सब भूल चुके होंगे रोज़मर्रा के जीवन-व्यापार में मैं याद रख सकूँ और दूसरों से बेहतर न महसूस करूँ. समय, मुझे सुझाओ कैसे मैं अपनी रोशनी बचाए रखूँ तेल चुक
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सर्वेश्वरदयाल सक्सेना – कविता – आज पहली बार

आज पहली बार थकी शीतल हवा ने शीश मेरा उठा कर चुपचाप अपनी गोद में रक्खा, और जलते हुए मस्तक पर काँपता सा हाथ रख कर कहा- “सुनो, मैं भी पराजित हूँ सुनो, मैं भी बहुत भटकी हूँ सुनो, मेरा भी नहीं कोई सुनो, मैं भी कहीं अटकी हूँ पर न जाने क्यों पराजय नें
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भवानीप्रसाद मिश्र – कविता – गीतफ़रोश (गीत बेचनेवाला)

जी हाँ हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ, मैं तरह-तरह के गीत बेचता हूँ, मैं किसिम-किसिम के गीत बेचता हूँ! जी, माल देखिए, दाम बताऊँगा, बेकाम नहीं हैं, काम बताऊँगा, कुछ गीत लिखे हैं मस्ती में मैंने, कुछ गीत लिखे हैं पस्ती में मैंने, यह गीत सख्त सर-दर्द भुलाएगा, यह
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है अँधेरी रात पर दीपक जलाना कब मना है?

कल्पना के हाथ से कमनीय जो मंदिर बना था भावना के हाथ ने जिसमें वितानों को तना था स्वप्न ने अपने करों से था जिसे रुचि से सँवारा स्वर्ग के दुष्प्राप्य रंगों से, रसों से जो सना था ढह गया वह तो जुटाकर ईंट, पत्थर, कंकड़ों को एक अपनी शांति की कुटिया बनाना कब मना
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कविता – आराम करो

हिंदीज़ेन ब्लॉग में कभी-कभार हल्की-फुल्की सामग्री भी प्रस्तुत की जाती है. इसी क्रम में आज पेश है श्री गोपालप्रसाद व्यास की मशहूर कविता “आराम करो”. ********** एक मित्र मिले, बोले, – “लाला, तुम किस चक्की का खाते हो इस डेढ़ छटाक