एक गीतिका : जड़ो तक साजिशें गहरी ......
एक गीतिका : जड़ों तक साज़िशें गहरी..... जड़ों तक साज़िशे गहरी सतह तक हादसे थे जहाँ बारूद की ढेरी वहीं पर घर बसे थे उनकी आदतें थी आस्माँ ही देखते चलना ज़मीं पाँवों के नीचे खोखली थी ,बेख़बर थे बहुत उम्मीद थी उनसे ,बहुत आवाज़ दी हमने कि जिनको चाहिए था जागना, सोए
Apr 30 2010 09:48 PM



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