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एक गीतिका : जड़ो तक साजिशें गहरी ......

एक गीतिका : जड़ों तक साज़िशें गहरी..... जड़ों तक साज़िशे गहरी सतह तक हादसे थे जहाँ बारूद की ढेरी वहीं पर घर बसे थे उनकी आदतें थी आस्माँ ही देखते चलना ज़मीं पाँवों के नीचे खोखली थी ,बेख़बर थे बहुत उम्मीद थी उनसे ,बहुत आवाज़ दी हमने कि जिनको चाहिए था जागना, सोए
 
आनन्द पाठक
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एक गीतिका >वातानुकूलित आप ने .......

एक गीतिका: वातानुकूलित आप ने... वातानुकूलित आप ने आश्रम बना लिए सत्ता के इर्द-गिर्द ही धूनी रमा लिए "दिल्ली" में बस गए तपोवन को छोड़ कर "साधु" भी कैसे कैसे चेहरे चढ़ा लिए गूँगों की बस्तियों में अंधों की भीड़ थी हर युग में आप खोटे सिक्के चला लिए यह आप की कला
 
आनन्द पाठक