पहने लाख गेरुआ बाने..........( गीत )
हम सभी कोई न कोई लबादा ओढे हुए हैं और धीरे धीरे यही लबादा हमें सत्य लगने लगता है ! हमारी वासनाएं छूटती नहीं हैं सिर्फ़ वेश बदल लेती हैं ,एक नया लबादा ओढ़ लेती हैं और इसी को हमारे अन्दर बैठा हुआ जोगी परम सत्य मानकर आत्म मुग्ध होता रहता है !इसी आत्म मु
Dec 29 2009 11:57 AM



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