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“कहीं सो न जाना!”

चमक और दमक में, कहीं खो न जाना!कलम के मुसाफिर, कहीं सो न  जाना! जलाना पड़ेगा तुझे, दीप जगमग, दिखाना पड़ेगा जगत को सही मग, तुझे सभ्यता की, अलख है जगाना!! कलम के मुसाफिर...................!! सिक्कों की खातिर कलम बेचना मत,कलम में छिपी है ज़माने की
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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फिल्म -----गुड्डी का गीत ----वाणी जयराम जी का गाया .....................

बोले रे पपिहरा ,पपिहरा नित घन बरसे ,नित मन प्यासा नित मन प्यासा.नित मन तरसे पलको पर एक बूँद सजाए  बैठी हूँ सावन ले जाये  जाए पी के देस में बरसेनित मन प्यासा.नित मन तरसे सावन जो संदेसा लाये मेरी आँख से मोती पाए दान
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“बादल तो बादल होते हैं” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक)

सूचनाः- 17 जून से 19 जून तक लुधियाना में रहूँगा! 21 जून को ही ब्लॉगिस्तान  में वापिस लौटूँगा! मेरा एक पुराना गीत बादल तो बादल होते हैं ।भरी हुई छागल होते हैं।। तन में जल का सिन्धु समेटे,नभ में कृष्ण दिखाई देते, लेकिन धुआँ-धुआँ होते हैं ।बादल तो
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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इस बारिश में बूँदें कुछ कम गिरेंगी

दिल के दायरे की हद नहीं होती जज़्बात कोई हो, ग़म या खुशी ना करने की ज़िद नहीं होती
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“टीस” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

(नोट-कलाई में मोच आ जाने के कारण केवल आपको पढ़ ही रहा हूँ! चाह कर भी टिप्पणी नही कर पा रहा हूँ! किसी तरह से कृतिदेव मे लिखी हुई इस रचना को किसी से यूनिकोड में बदलवा कर यह रचना लगवा दी है!)  टीस उठ रही है तन-मन में, पोर-पोर में दर्द भरा है! बाहर से
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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आओ प्रियवर स्नेह तलैया में मिल कर स्नान करे

आओ प्रियवर स्नेह तलैया में मिल कर स्नान करे एकाकीपन की घड़ियों में, इक दूजे का ध्यान करें देंखे स्वप्न सलोने सुन्दर, नीड़ बनायें इक अनुपममधुर चांदनी में बन  जाएँ,  इक दूजे के हम शबनम अंतर्मन के अहसासों का, आओ हम पहचान
 
किशोर पारीक 'किशोर'
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मैंने जब से चलना सीखा, तबसे चलता रहा निरंतर

मैंने जब से चलना सीखा, तबसे चलता रहा निरंतर धरती नापी, अम्बर नापा, नापे अनगिन दिशा दिशंतरआदिकाल से इस पल का रुख, जैसा मैंने चाहा बदला गिरकर संभला में मुस्काता, राहों पर जब भी में फिसला समय चक्र
 
किशोर पारीक 'किशोर'
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“वो चमन चाहिए!” (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

♥ एक पुराना गीत  ♥मन-सुमन हों खिले, उर से उर हों मिले, लहलहाता हुआ वो चमन चाहिए। ज्ञान-गंगा बहे, शन्ति और सुख रहे- मुस्कराता हुआ वो वतन चाहिए।।  दीप आशाओं के हर कुटी में जलें, राम-लछमन से बालक, घरों में पलें, प्यार ही
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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Shoonyakonn's Blog... ।शून्यकोण।

होठों पर उफ़्फ़ है ये मदिरा साँच बराबर तप है ये मदिरा
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आज एक प्रार्थना ..........................ईश्वर से ...........................

आज एक गीत याद आ रहा है ................भजन कहे या प्रार्थना सुनिए मेरी आवाज में.........................सुबह -सुबह सुनने से ..........................मुझे अच्छा लगता है ..........................     Get this widget
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चलो श्मशान पर एक मचान बनायें

तो जीवन क्या ये श्मशान नहीं जलती चिता की पहचान नहीं ये जी जीवन सुलगता है और सुख दुख की आग होती है
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हम भी जियेंगे कभी खाक से निकलकर

बना उन्ही पत्थरों को निशाना हम फिर से गिर गिर जायेंगे हर हार के सीने से लिपट गल्तियाँ फिर वहीं दोहरायेंगे
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विलम्ब न करना तुरंत आना

विलम्ब न करना तुरंत आना छूटा साथ अधीर रहेगा होंठों पर कुछ चन्दन बाकी है अभी तो सांस महक रही है बहकी सांस अधीर रहेगी विलम्ब न करना तुरंत आना अभी तो आँखें बंद हैं सांझे स्वप्न बह रहे हैं बंद आँखें खुल न पाएंगी विलम्ब न करना तुरंत आना अभी तो हाथ भरे थे [...]
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प्रकृति की सुन्दरता -------------------------------गानों में ----------------मेरी पसंद ...........

आज सुनिए बल्कि देखिए मेरी पसंद के ये गीत ...............प्रकृति की सुन्दरता लिए ...............( यू -ट्यूब से साभार ..).http://www.youtube.com/watch?v=K9b63nSt9jY&feature=relatedhttp://www.youtube.com/watch?v=BeYFRzr1jKkऔर इसका नया रूप भी
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हस्ती

बात बेबात कभी रुत है पलटती मस्ती कभी नशे सी है उतरती बनते बिगड़ते दायरों में टूटती-चढ़ती लहरों सी हस्ती
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“बेमौसम वीरान हो गये!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

गुमनामों की इस बस्ती में, नेकनाम बदनाम हो गये! जो मक्कारी में अव्वल थे, वो अव्वल सरनाम हो गये! जो करते हैं दगा-फरेबी, वो पाते हैं दूध-जलेबी, सच्चाई के सारे जेवर, महफिल में नीलाम हो गये! न्यायालय में न्याय बिक रहा, सरे-आम अन्याय टिक रहा, पंच और सरपंच
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“आओ चलें गाँव की ओर!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

छोड़ नगर का मोह, आओ चलें गाँव की ओर! मन से त्यागें ऊहापोह, आओ चलें गाँव की ओर! ताल-तलैय्या, नदिया-नाले, गाय चराये बनकर ग्वाले, जगायें अपनापन व्यामोह, आओ चलें गाँव की ओर! खेतों में हल लेकर जायें, भाभी भोजन लेकर आयें, मट्ठा बाट रहा है जोह! आओ चलें गाँव की
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“मौसम नैनीताल का” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

गरमी में ठण्डक पहुँचाता, मौसम नैनीताल का! मस्त नज़ारा मन बहलाता, माल-रोड के माल का!!  नौका का आनन्द निराला, क्षण में घन छा जाता काला, शीतल पवन ठिठुरता सा तन, याद दिलाता शॉल का! लू के गरम थपेड़े खा कर, आम झूलते हैं डाली पर, इन्हें देख कर मुँह में
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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मेरे मन की

आज मेरी पसंद का ये गीत सुनिए-------------मेरी आवाज मे............................. Get this widget | Track details | eSnips Social DNA
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“परछाँई की तासीर बदल जाती है” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

आमन्त्रण में बल हो तो , तस्वीर बदल जाती है। पत्थर भी भगवान बनें, तकदीर बदल जाती है।। अपने अधरों को सीं कर, इक मौन निमन्त्रण दे दो, नयनों की भाषा से ही- मुझको आमन्त्रण दे दो, भँवरे की बिन गुंजन ही- तदवीर बदल जाती है। आमन्त्रण में बल हो तो , तस्वीर बदल
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“कर देंगे गुलशन वीराना” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

किया बहुत था प्यार हमेशा हमने सौतेलों को, किन्तु उन्होंने हमको भाई नहीं माना! -- लाड़-चाव से हाथ थाम कर चलना  जिन्हें सिखाया था, जीवन में आगे बढ़ने का  पथ जिनको दिखलाया था, हमने उन्हें अनुज माना था, किन्तु
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“जीवन एक पाठशाला है” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक)

ऐसा कोई शख़्श नही है, आसमान से जो आया हो! ऐसा कोई नक्श नही है, जिसने मन नही भरमाया हो!! जो कुछ भी जिसने सीखा है, दुनिया ने ही सिखलाया है, सजना और सवँरना सबको, दर्पण ने ही बतलाया है, ऐसा कोई अक्स नही है, जिसने नूर नही पाया हो! ऐसा कोई नक्श नही है, जिसने
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“उम्र तमाम हो गई” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक)

पथ पर आगे बढ़ते-बढ़ते, अब जीवन की शाम हो गई! पोथी जग की पढ़ते-पढ़ते, सारी उम्र तमाम हो गई!! जितना आगे कदम बढ़ाया, मंजिल ने उतना भटकाया,  मन के मनके जपते-जपते,  माला ही भगवान हो गई! पोथी जग की पढ़ते-पढ़ते, यों ही उम्र तमाम हो गई!! चिढ़ा रही मुँह
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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राकेश खंडेलवाल के दो गीत

राकेश खंडेलवाल का जन्म १८ मई १९५३ को भरतपुर ( राजस्थान ) में हुआ और प्राथमिक शिक्षा भी भरतपुर में ही हुई। इन्हें घर में उपलब्ध कल्याण के सभी पुराण और विशेषांकों से पढ़ने का व्यसन प्रारंभ से ही लग गया था। भरतपुर की हिन्दी साहित्य समिति में उपलब्ध हज़ारों
 
रवीन्द्र प्रभात
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“न्याय करेगा कौन?” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

वानर बैठा है कुर्सी पर,  हुई बिल्लियाँ मौन!  अन्धा है कानून हमारा,  न्याय करेगा कौन? लुटी लाज है मिटी शर्म है, अनाचार में लिप्त कर्म है, बन्दीघर में बन्द धर्म है, रिश्वत का बाजार गर्म है, हुई योग्यता गौण! अन्धा है कानून हमारा,  न्याय
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“मखमली लिबास” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

मखमली लिबास आज तार-तार हो गया! मनुजता को दनुजता से आज प्यार हो गया!!  सभ्यताएँ मर गईं हैं, आदमी के देश में, क्रूरताएँ बढ़ गईं हैं, आदमी के वेश में, मौत की फसल उगी हैं, जीना भार हो गया! मनुजता को दनुजता से आज प्यार हो गया!!  भोले पंछियों के पंख,
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“सूखे हुए छुहारे, उनको लुभा गये हैं” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

“प्रियवर अलबेला खत्री जी को समर्पित” अंगूर के सभी गुण, किशमिश में आ गये हैं! सूखे हुए छुहारे, उनको लुभा गये हैं!! बूढ़े हुए तो क्या है, मन में भरा है यौवन, गीतों के जाम में ही, ढाला हुआ है जीवन, इस उम्र में भी हम तो, दुनिया को भा गये हैं! सूखे हुए
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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इतना दूर चला हूँ , फिर भी मंजिल नहीं मिली

गीत केवल दिखलाने को सारे, कात रहे तकलीमुस्काने जो मिलीं हजारों, ज्यदातर नकलीघुप्प अँधेरा था पर, कोइ कंदील नहीं मिलीइतना दूर चला हूँ , फिर
 
किशोर पारीक 'किशोर'
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“ढाई आखर नही व्याकरण चाहिए!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

मोक्ष के लक्ष को मापने के लिए, जाने कितने जनम और मरण चाहिए । प्यार का राग आलापने के लिए,शुद्ध स्वर, ताल, लय, उपकरण चाहिए।।लैला-मजनूँ को गुजरे जमाना हुआ,किस्सा-ए हीर-रांझा पुराना हुआ, प्रीत की पोथियाँ बाँचने के लिए- ढाई आखर नही व्याकरण चाहिए । प्यार का
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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"मेरा हिन्दुस्तान!" (डा0 रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

नेताओं का बदल गया है, धर्म और ईमान, जितने बड़े करें घोटाले, उतने बनें महान, सारा जग करता गुणगान, ये है मेरा हिन्दुस्तान। भूखी-नंगी जनता को, भाषण से ही भरमाता, प्रश्न उठाने को संसद में, भारी नोट कमाता, कोठी, बंगला, कार विदेशी, पाल रहा ये श्वान, सारा जग
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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हो गया क्यों देश ऐसा ? (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

कल्पनाएँ डर गयी हैं, भावनाएँ मर गयीं हैं,देख कर परिवेश ऐसा।हो गया क्यों देश ऐसा??पक्षियों का चह-चहाना , लग रहा चीत्कार सा है।षट्पदों का गीत गाना ,आज हा-हा कार सा है।गीत उर में रो रहे हैं, शब्द सारे सो रहे हैं,देख कर परिवेश ऐसा। हो गया क्यों देश ऐसा??एकता
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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सुर -मन्दिर ...............................बिना संगीत के................................

बहुत ही कठिन गाना...................पर.................कोशिश की है..................क्योंकि बहुत पसंद है मुझे..............आप भी सुनिए..................अच्छा न लगे तो भी बताएं..............यानि नापसंद पर एक चटका.............जरूरी नहीं सब पसंद
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हम तो तंतु कसे कसे से ठोकर से सरगम ही देंगे

शाम अधूरी मीत   याद बिन उसनींदे दिन मीत साथ बिन !***********हम तो तंतु कसे कसे से ठोकर से सरगम ही देंगेसर ढोऎंगें तपन पोटलीआओ तल में छांह ही देंगें ! क्योंकर मन में अवगुंठन है  शाम सुहानी कहां प्रात बिन ?***************मोहक मादक मदिरा
 
गिरीश बिल्लोरे
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“उस जननी का है उपकार” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

जिसने दिया हमें आकार!माँ सन्तानों का संसार! पीड़ा को सहकर जिसने दुनिया में हमें उतारा, माता को अपना शिशु सबसे ज्यादा होता प्यारा, कोटि-कोटि करते आभार! माँ सन्तानों का संसार! ममता के जल से धो-धोकर जिसने हमें सँवारा, कदम-कदम पर जिस माता ने हमको दिया सहारा,
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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एक गीत

‘बहुत दिन हुऐ कि कोई नई पोस्ट नहीँ डाली’ - शिकायत वाजिब है। बीमार था भाई, अब शिकायत दूर किये देता हूँ। कुछ और नहीं इस बार अपना ही एक गीत जो जनवरी 2010 में पाखी में छपा है। बहुत दिनों से यही कुछ मित्रों का भी आग्रह था कि भाई अपना भी कुछ डालिये सो पूरा कर
 
प्रदीप कांत
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“बचपन” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

मुझे याद जब आता है अपना बचपन।खट्टी-मीठी यादों को लाता जीवन।। गुल्ली-डण्डा और कबड्डी सारे  खेल निराले, जब भी खेला करते थे हम  हो-होकर मतवाले, किलकारी से गूँजा करता था आँगन। खट्टी-मीठी यादों को लाता जीवन।। बागों से कच्ची अमियों को तोड़-तोड़ लाते
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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वैसे तो मै गाती नही हूँ ...............................पर सुना देती हूँ........................

इस गीत में पहले बताया है कि क्या करना है ..............फ़िर पूछा है कि क्या करेगा ???....................भला ऐसाक्यों????? Get this widget | Track details | eSnips Social DNA
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ऋतु बसंत की मादक बेला, तुझ बिन सूनी ओ हरजाई

ऋतु बसंत की मादक बेला तुझ बिन सूनी ओ हरजाई मन का दर्पण बिखरा-बिखराजैसे अम्बर की तन्हाई... कंगन, पायल, झूमर, झांझर सांझ सुहानी, नदी किनाराआकुल, आतुर विरह, व्यथित मनपंथ प्रिय का देख के हाराकल की यादें बांह में ले के मुझको सता रही अमराई...क्षण, रैना, दिन सब
 
फ़िरदौस ख़ान
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“आँसू हैं अनमोल” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

“मेरा एक बहुत पुराना गीत” आँसू हैं अनमोल, इन्हें बेकार गँवाना ठीक नही! हैं इनका कुछ मोल, इन्हें बे-वक्त बहाना ठीक नही! हीरक वाला, हर खदान नही हो सकता है, सारे ही पाषाणों में, भगवान नही हो सकता है, बोल न कातर बोल, इन्हें हर वक्त मनाना ठीक नहीं! हैं इनका
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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" एक और एक ग्यारह "..................... कौन कहता है.???.........................नहीं होते ......................

आज एक नया प्रयोग किया है ...................................सुनिए मेरी आवाज में................... दिलीप का लिखा एक देशभक्ति गीत-------.............."तब एक तिरंगा बनता है " ......................दिलीप का ब्लोग है ........." दिल की कलम से
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