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हिंसा की देवी,तुम सुन रही हो न..?

दो नई कविताएँ (१)हिंसा की देवी, तुम सुन रही हो न..?  हिंसा की देवी, तुम सुन रही हो न..? जब तुम अपने कोमल होंठों से गाती हो हिंसा के गीत तब लगता है, एक सुन्दर फूलकाँटों के साथ मिल कर अपने ही फूलो के जिस्मो को छलनी कर रहा है.ओ
 
girish pankaj
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गीत/ पापी है वह गौपालक तो, जिसकी गैया हुई हलाल.

कल रात नाली में गिरकर एक गर्भवती गाय की जान चली गयी. मै अपने आँसूं नहीं दिखा सकता लेकिन इस घटना ने मुझे कितना दुःख दिया, वह मेरी आहत-भावना को देख कर समझ सकते है. अब तक उबर नहीं पाया हूँ इससे. कल बेटे साहित्य ने आकर बताया कि घुप्प अँधेरे के कारण एक गाय
 
girish pankaj
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एक जून ...दो ग़ज़ले...

एक जून... सुधी पाठक अनुमान लगा सकें तो लगा लें, मगर मैं बताऊंगा नही, कि आज के दिन क्या हुआ था. बस इतना ही कहूंगा कि, ज़िंदगी की राह पर अच्छा-खासा अकेला चला जा रहा था, कि कोई और साथ आ गया और बोला, ''अकेले-अकेले कहाँ जा रहे हो/ हमें साथ ले लो, जहाँ जा रहे
 
girish pankaj
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कानपुर के अभिषेक को समर्पित एक गीत

आज एक समाचार पढ़ा कि जूता पालिश करने वाले पिता के मेहनतकश बेटे ने लालटेन की रौशनी में पढ़ाई करके 'आईआईटी'की परीक्षा पास की.पिछले दिनों एक और खबर आई थी, कि एक मजदूर का लड़का कलेक्टर बन गया.समय-समय पर इस तरह की प्रेरक खबरे उन बच्चों का हौसला बढ़ाती है
 
girish pankaj
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स्वारथ जब दिमाग पर छाया रिश्ते टूट गए...

इस क्रूर समय में अच्छे लोगों का जीना कठिन हो गया है, बाहर की क्या बात करुँ , अब तो घर-घर में नफ़रत और अलगाव का मंज़र नज़र आने लगे हैं. दुःख होता है देख कर, जब एक भाई दूसरे भाई की जान लेने पर आमादा हो जाता है,क्योंकि उसे संपत्ति में बंटवारा चाहिए. यह दौलत
 
girish pankaj
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मुझे चोट लगने पर अम्मा की आँखों में आँसू आए : गिरीश पंकज

 श्री गिरीश पंकजसद्भावना दर्पण (भारतीय एवं विश्व साहित्य की अनुवाद-पत्रिका) के संपादक श्री गिरीश पंकज कलम के दम पर जीवन यापन करने वाले चंद लोगों में से एक विशिष्ट साहित्यकार हैं । चर्चित व्यंग्यकार गिरीश पंकज नवसाक्षर साहित्य लेखन में सिद्ध है । वे
 
संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari