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बिहार से फिर लौटकर

मेरे बचपन का बिहार अर्थात गर्मी की छुट्टियों वाला बिहार, पके आम, घोड़ागाड़ी, बैलगाड़ी, खेत-खलिहान, बंसवारी, बगीचों, अनथक धमा-चौकड़ी वाला बिहार, गांव के साप्ताहिक बाजार वाला बिहार, गांव के सुन्दर मंदिर वाला बिहार। अब पीछे छूटता जा रहा है। मैं उसे पकड़
 
ज्ञानेश उपाध्याय (gyanesh upadhyay)
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मुलैमा, टीवी, महतो, माओ, उखाड पटरी, राजनीति वाली मुनिया......और अबूझा मन.....सतीश पंचम

          दिल की ये आरजू थी कोई दिलरूबा मिले……सितार वाले…   राजबब्बर.…….महेंद्र कपूर…….……चाय पी लो ठंडी हो रही है…..सी टी सी चाय ……..……गर्म हैंडल…..ए घुम ले ........ए घूम ले..... ये दुनिया बड़ी मजेदार….अमेरिकन
 
सतीश पंचम
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यहाँ हैल्थ की मजबूरी है , वहां वैल्थ की मजबूरी है ---

ब्लोगिंग में आजकल जो गहमा गहमी , वाद विवाद और आरोप प्रत्यारोप हो रहे हैं , उनसे अलग कुछ ऐसे मित्र ब्लोगर भी हैं जो सभी विवादों से दूर निर्विकार भाव से हिंदी सेवार्थ कार्य में लीन हैं। ऐसे ही एक मित्र हैं , मुंबई में रहने वाले श्री नीरज गोस्वामी जी , जो
 
डॉ टी एस दराल
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गाँव में छत पर सोना...पुरूआ बयार....टूटता तारा....छूटता लुक्क....चंदा मामा... आरे पारे......ग्राम्य सीरिज....और मैं सतीश पंचम

   गाँव में खुले छत पर सोने का आनंद ही कुछ और होता है। आप छत पर पडे पडे आकाश में लटके सितारों को देख रहे हैं…..चाँद दिख रहा है….उसमें किसी का चेहरा ढूँढा जा रहा है….बचपन की लोरी याद आ रही है…चंदा मामा आरे आवा…पारे आवा…नदिया किनारे आवा…दूध
 
सतीश पंचम
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बहुत याद आता है , नीम का वो पेड़

कुछ दिन पहले मॉर्निंग वाक पे मेरी सहेली ने, फलों से लदे एक कटहल के पेड़ को दिखाते हुए कहा, '.तुम्हे पता है...कटहल जड़ों के पास  भी फलते हैं'.मैने कहा 'हाँ...मैने भी देखा है'..फिर वो बताने लगी कि केरल के एक गाँव में उसकी मौसी के घर के पास एक कटहल का
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ये देखिये खुल्ले में नहा रहा हूँ.....हरियाली के बीच....ग्राम्य सीरिज चालू आहे ...सतीश पंचम

         क्या कभी आपने खुले में नहाया है ? पोखर में, नलकूप पर, बाल्टी लेकर रास्ते में ही, या सींचे जा रहे खेत में  पाईप से.......कभी नहाया हो तो उसका आनंद भी पाए होंगे जरूर।     यहाँ देखिए मैं गाँव में
 
सतीश पंचम
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सन्तों के चरण छूते हुए चिकोटी काटने का मन हो रहा है....कहीं आप का भी मन लहक रहा हो

     जहँ जहँ चरण पड़े सन्तन के, तहँ तहँ बंटाढार……यह बात मेरे गाँव के पोखरे के लिए सटीक बैठती है। ठीक दो साल पहले के ये तीन चित्र हैं और ठीक दो साल बाद के ही सूखे पोखर वाले चित्र है…..नरेगा का भरपूर उपयोग हुआ है…..पैसा पानी की तरह बहा
 
सतीश पंचम
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सोच गाँव की बनाए सयाना

एक ड्राफ्ट की हुई पोस्ट पता नहीं कब से रखी पड़ी थी (मार्च २००८) . सोच तो ठीक थी, चलो पुब्लिश कर देते है ...कभी कभी में सोचता हूँ की क्यों न हमारे पॉलिसी बनाने वालो को कुछ दिनों तक पहले किसी गांव में कुछ दिन बिताने चाहिए , जितना सीखने को विदेश से नही
 
राम त्यागी
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जासूस छिनारी, पलंग तोड़- मर्द चौड़ी पत्ती, जेल यात्रा, मट्ठा, गोदान, रोवनछा और मैं .........सतीश पंचम

     गाँव की ही  एक दुकान में बैठे हुए  कुल्हड़ वाली चाय पी रहा था कि तभी नजर पान – तमाखू और जर्दे आदि के बीच रखे एक तमाखू वाले डिब्बे पर जा टिकी। लिखा है – पलंग तोड़, मर्द चौड़ी पत्ती……… तमाखू …..साथ ही डिब्बे पर एक दाढ़ी मूँछ
 
सतीश पंचम
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धरती को बचाने का सुख (व्यंग्य/कार्टून)

धरती को बचाने के लिये सवा सौ देशों ने ‘अर्थ आवर’ में बत्ती बुझाई । <=काश हमारे यहां भी बिजली आती तो हम भी धरती को बचाने के लिये एक घंटे के लिये सभी स्विच आफ कर देते । हमारे गांव में तो अभी सिर्फ बिजली के खंभे ही गड़े हैं । ट्रांसफार्मर लगना [...]
 
K M Mishra
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डॉक्‍टर साब, क्‍या गांवों में इंसान नहीं रहते?

सरकार ने कहा कि डॉक्‍टरों को एक साल गांवों में काम करने के बाद ही उपाधि दी जाएगी तो इसे लेकर हाय तौबा शुरू हो गई. लड़कियों ने मंत्री महोदय को शादी करने के लिए प्रपोज़ कर के विरोध जताया. ठीक है भई लोकतंत्र में अभिव्‍‍यक्ति की आजादी की सुविधा जो मिली ह
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चुनुवा फ़कीर

मैनहन की तमाम सुबहों में मैने वो गीत सुने जिन्हे चुनुवा फ़कीर गाया करते थे। अब वे लोग जैसे विलुप्त हो गये या यूं कहे कि विकास की बलि-वेदीं पर चढ़ा दिए गये। भोर हो नही पाता था पांच या सात की तादाद में ये लोग पीले य सफ़ेद वस्त्रों से आच्छादित, नंगे पैर, और
 
Krishna Kumar Mishra
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नयी बिल्डिंग में पहला गणतंत्र दिवस

गणतंत्र दिवस की आप सभी को शुभकामनाएं। देश फिर से उठ खड़ा हो और शांति की राह पर चले। हमारे प्रधानमंत्री जल्द से जल्द अपने घर और काम पर लौटे, ऐसी मेरी भगवान से प्रार्थना है। आज अपने सोसाइटी की मीटिंग अटेंड की। ऐसा करना मुझे अच्छा लगता है। इस बिल्डिंग क
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