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फूल तुमने जो कभी मुझको दिए थे ख़त में...फ़िरदौस ख़ान

चांदनी रात में कुछ भीगे ख्यालों की तरहमैंने चाहा है तुम्हें दिन के उजालों की तरहसाथ तेरे जो गुज़ारे थे कभी कुछ लम्हेंमेरी यादों में चमकते हैं मशालों की तरहइक तेरा साथ क्या छूटा हयातभर के लिएमैं भटकती रही बेचैन गज़ालों की तरहफूल तुमने जो कभी मुझको दिए थे
 
फ़िरदौस ख़ान
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Gazal: उनके कहने पे हम

उनके कहने पे हम, शोलों में भी रह लेते हैं।फूलों की बात क्या, काँटों को भी सह लेते हैं।उसने देखी कहाँ अभी तिश्नगी मेरी,उसकी खातिर तो हम, मर के भी जी लेते हैं।काश देखें कभी वो फटा सा दामन मेरा,क्योंकि हम जिगर तो उस वक़्त ही सी लेते हैं।उनको आता नहीं मखमली
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चाय बिन मांगे , पानी मांगे से हम पिलाने लगे ---एक ग़ज़ल

कहते हैं -- अतिथि देवो भव: । हमारे देश में अतिथि का आदर सत्कार करना परम कर्तव्य माना जाता है । लेकिन ऐसा लगता है कि बदलते ज़माने के साथ यह सोच भी बदल रही हैं ।बोर्ड रूम में मीटिंग चल रही थी । अस्पताल की गर्म समस्याओं पर गर्मागर्म बहस चल ही थी । बाहर भी
 
डॉ टी एस दराल
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Ajnabi

मेरी काया में जो आत्मा सी हैउसके लौट आने की संभावना सी हैवो बदल ले मार्ग या सम्बंध बदल लेवही रहेगी, जो प्रेम की भावना सी हैमैं पानी की तरह पटकता रहूंगा सरउस पत्थर में विचित्र चाहना सी हैमैं क्यों उस मौन को नकार मान लूंउस मौन में मेरी सराहना सी हैछानूंगा,
 
Rajey Sha
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ग़ज़ल............- दिल में ऐसे उतर गया कोई..............मनोशी जी

दोस्त बन कर मुकर गया कोई अपने दिल ही से डर गया कोईआँख में अब तलक है परछाईंदिल में ऐसे उतर गया कोईसबकी ख़्वाहिश को रख के ज़िंदा फिरख़ामुशी से लो मर गया कोईजो भी लौटा तबाह ही लौटाफिर से लेकिन उधर गया कोई"दोस्त" कैसे बदल गया देखोमोजज़ा ये भी कर गया कोई
 
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ग़ज़ल/ मै उजियारा बाँट रहा था मगर हवा को रास न आया

मै उजियारा बाँट रहा था मगर हवा को रास न आया उसने आँधी को भेजा और मेरा जलता दीप बुझायाएक दीप बुझ जाने पर भी हार नहीं मानी मैंने फिर से दीप जलाकर मैंने बस आँधी को सबक
 
girish pankaj
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छोरियां क्या से क्या हो गयी............

ज़िन्दगी इक व्यथा हो गयी.प्रीत की दुर्दशा हो गयी.देखते, देखते, देखते...ज़िन्दगी क्या से क्या हो गयी.आया तूफ़ान महंगाई का,सारी खुशियां हवा हो गयी.पीड़ा इतनी बढ़ी अंततः,कुल दिनों की दवा हो गयी.मूं छिपाती फिरै मुफ़लिसी,लो अमीरी अना हो गयी.देख टीवी को अम्मा
 
योगेन्द्र मौदगिल
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ग़ज़ल

तू पथ पर अपने चलता चल  |मंजिल को पास बुलाता चल |सभी समस्याओं का मिलकर ,बात -चीत से  निकले  हल  |कैसी भी हो आग भयानक  ,कर सकते हो तुम शीतल  |मंदिर हो या गुरुद्वारा हो  ,शीश झुका दें  गंगा जल  |चंदा -तारों से हम
 
आदेश कुमार पंकज
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क्यों नींद उनको सारी रात नहीं आती----

भाई तिलक राज कपूर जी का लेख पढ़कर ग़ज़ल लिखना सीखने का प्रयास किया है । इस में मत्ला और मक्ता सहित सिर्फ पांच शेर (अश`आर ) कहे हैं । इसमें काफिया --आत है जैसे गात , रात , बात आदि । रदीफ़ है --नहीं आती । पहले शेर यानि मत्ला में काफिया और रदीफ़ दोनों मिसरों
 
डॉ टी एस दराल
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भूल गया सारी कडुवाहट इतना ज्यादा प्यार मिला

नई ग़ज़ल..ग़ज़ल के हर शेर अपनी बात खुद बयाँ  कर देते है. इसलिए उनके लिए कुछ लिखना ठीक नहीं, इसलिए बिना किसी लम्बी व्याख्या के, पेश है मेरी नई ग़ज़ल...जितना मुझको मिला सच कहूँ जी भरकर उपहार मिलाभूल गया सारी कडुवाहट इतना ज्यादा प्यार मिलाजैसा दोगे इस दुनिया
 
girish pankaj
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ज़िंदगी..........(श्यामल सुमन).................गजल

आग लग जाये जहाँ में फिर से फट जाये ज़मीं।मौत हारी है हमेशा ज़िंदगी रुकती नहीं।।आँधी आये या तूफ़ान बर्फ गिरे या फिर चट्टान।उत्तरकाशी भुज लातूर सुनामी और पाकिस्तान।।मौत का ताण्डव रौद्र रूप में फँसी ज़िंदगी अंधकूप में।लाख झमेले आने पर भी बढ़ी ज़िंदगी छाँव धूप
 
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कुछ सुनती, कुछ कहती बातें........

कुछ सुनती, कुछ कहती बातें.खामोशी से बहती बातें.हाय, ज़माना देख-देख कर,मन भीतर ही रहती बातें.सच कहना तो मुश्किल है भई,मुझको अक्सर कहती बातें.उन्हें समझना कठिन नहीं रे,सीमा में जो रहती बातें.ज्वालामुखी फूटता है तब,जब बातों को सहती बातें.सुन कर हवा-हवाई
 
योगेन्द्र मौदगिल
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बस आँखों में दिखता पानी

सूखे खेत, सरोवर,झरने, बस आँखों में दिखता पानी हाहाकार मचा है जग में, छाए मेघ न बरसा पानी। भ्रष्टाचार के दलदल में अब, अपना देश धंसा है पूरा कौन उबारे, सबके तन में ठंडा खून रगों का पानी। अब रक्षक को भक्षक कहिए,कलियां रौंद रहे है माली लोग तमाशा देख रहे हैं,
 
अर्चना तिवारी
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कौन जिन्दा है कब तलक जाने

आज एक अरसे बाद मैं फिर लौटा हूँ ब्लाग की दुनिया में......है न....! जब मैं वाराणसी से बाहर था तो मेरे कार्यक्षेत्र के एक पुराने एडवोकेट इस दुनिया को छोड़ गये । इसी परिस्थिति में पूर्व की लिखी गयी मुझे अपनी कुछ पंक्तियाँ याद आ गयीं जो मैं आप से जरूर बांटना
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ग़ज़ल

जिन ख्वाबों से नींद उड़ जाये ऐसे ख्वाब सजाये कौन \इक पल झूठी तस्कीं पा कर सारी रात गवाएं कौन \यह तन्हाई यह सन्नाटा  दिल को मगर समझाए कौन \इतनी काली रात में आखिर मिलने मिलाने  आये कौन \इक दो धोखे हों तो यारों  दिल रखने को खा भी लेंयह तो उसकी
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मैं हूं औरतज़ात, है मेरा........

लीजिये संडे है आजसमझ में नहीं आ रहा है कि क्या लिखूंदिमाग भी लगता है छुट्टी पर हैफिर भी आदतन कुछ पुरानी पंक्तियांप्रस्तुत करता हूंकाग़ज़, कलम, दवात का रिश्तासमझो तो जज्ब़ात का रिश्तामैं हूं औरतज़ात, है मेराभरे उजाले, रात का रिश्तामजदूरी, क्या मांग ली
 
योगेन्द्र मौदगिल
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गजल...............कवि दीपक शर्मा

लो राज़ की बात आज एक बताते हैंहम हँस-हँसकर अपने ग़म छुपाते हैं,तन्हा होते हैं तो रो लेते जी भर करसर-ए-महफ़िल आदतन मुस्कुराते हैं.कोई और होंगे रुतबे के आगे झुकने वालेहम सिर बस खुदा के दर पर झुकाते हैंमाँ आज फिर तेरे आँचल मे मुझे सोना हैआजा बड़ी हसरत से देख
 
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हाय ! ऐसी मोहब्बत

इस भरी दोपहरी में, क्यूँ शमा जलाए बैठी हो |किसका इंतजार है , जो द्वार खोले बैठी हो||ये कैसी तलब है, जो पलके बिछाए बैठी हो|ये कैसी तन्हाई है, जो बेचैन हुए बैठी हो||निकला पतझड सावन, निकला बसंत-बहार |किसका इंतजार है, जो आस लगाए बैठी हो ||कैसे कैसे राज़ जो
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राष्ट्रवादी..............(गजल)......................श्यामल सुमन

तनिक बतायें नेताजी, राष्ट्रवादियों के गुण खासा।उत्तर सुनकर दंग हुआ और छायी घोर निराशा।।नारा देकर गाँधीवाद का, सत्य-अहिंसा क झुठलाना।एक है ईश्वर ऐसा कहकर, यथासाध्य दंगा करवाना।जाति प्रांत भाषा की खातिर, नये नये झगड़े लगवाना।बात बनाकर अमन-चैन की, शांति-दूत
 
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ग़ज़ल/ सच कहना दुश्वार हुआ है...

सच कहना दुश्वार हुआ हैखुलकर अत्याचार हुआ हैबड़े-बड़े भी मात खा गए छिपकर जब भी वार हुआ हैझूठ बिका है सबसे ज्यादा अच्छा कारोबार हुआ है टूट गया हर सुन्दर सपना ऐसा बारम्बार हुआ हैहार नहीं मानी जिद्दी नेसपना तब साकार हुआ हैखून-खराबा सहज हो
 
girish pankaj
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उसके बगैर कितने ज़माने गुज़र गए...

कुछ ख़्वाब इस तरह से जहां में बिखर गएअहसास जिस क़द्र थे वो सारे ही मर गएजीना मुहाल था जिसे देखे बिना कभीउसके बगैर कितने ज़माने गुज़र गएमाज़ी किताब है या अरस्तु का फ़लसफ़ाऔराक़ जो पलटे तो कई पल ठहर गएकब उम्र ने बिखेरी है राहों में कहकशांरातें मिली स्याह,
 
फ़िरदौस ख़ान
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मरा सभी की आंख का पानी..........

बिग-बी, राखी, एकता रानीघर-घर की बस यही कहानीटेली-वीज़न देख-देख करबच्चों पर चढ़ रही जवानीसास बनी है बास अगर तोबहू स्वयंभू है पटरानीनाती-पोते कम्प्यूटर केदेख फालतू दादी-नानीविग्यापन भी कैसे-कैसेमरा सभी की आंख का पानीजिस को देखो वो ही नंगागये कुएं में
 
योगेन्द्र मौदगिल
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जज साहब को जूता चहिये........

दादा दिनेश राय द्विवेदी की हार्दिक इच्छा थी कि कचैहरी के सामने भी आईना रखा जाये उन के आदेश पर मैंने प्रयास भर किया है विश्वास है कि दादा के साथ-साथ आप सब भी मेरा समर्थन करेंगें लंपट, चोर, लुटेरे, डाकू मिलते यार कचैहरी मेंकैक्टस भी चंपा के जैसे खिलते यार
 
योगेन्द्र मौदगिल
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लीक पर चलना, कहाँ दुश्वार है..? (गजल)..........नीरज गोस्वामी

खौफ का जो कर रहा व्यापार है आदमी वो मानिये बीमार है चार दिन की ज़िन्दगी में क्यूँ बता तल्खियाँ हैं, दुश्मनी, तकरार है जिस्म से चल कर रुके, जो जिस्म पर उस सफ़र का नाम ही, अब प्यार है दुश्मनों से बच गए, तो क्या हुआ दोस्तों के हाथ में तलवार है लुत्फ़ है जब
 
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सरफ़रोशी के हम गीत गाते रहे...

मुस्कराते रहे, ग़म उठाते रहेसरफ़रोशी के हम गीत गाते रहेरोज़ बसते नहीं हसरतों के नगरख़्वाब आंखों में फिर भी सजाते रहेरेगज़ारों में कटती रही ज़िन्दगीख़ार चुभते रहे, गुनगुनाते रहेज़िन्दगीभर उसी अजनबी के लिएहम भी रस्मे-दहर को निभाते रहे-फ़िरदौस ख़ान
 
फ़िरदौस ख़ान
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उर्मिल पूछ रही लछमन से.......

तन का क्या विश्वास रे जोगीतन तो मन का दास रे जोगीभगवे में भगवान बसे हैंजटा-जूट विन्यास रे जोगीउर्मिल पूछ रही लछमन सेकौन दोष मम् खास रे जोगीजाम-सुराही छूट गये सबछूट गया अभ्यास रे जोगीसूरज, चंदा, जुगनू, तारेकिस को, किस की आस रे जोगीतितली, भंवरे, कोयल,
 
योगेन्द्र मौदगिल
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दोस्त बनकर गले लगाता है वही पीठ पर खंजर भी लगाता है वही....

दोस्त बनकर गले लगाता है वहीपीठ पर खंजर भी लगाता है वही....वफा की जो रोज़ कसमें खाता है करवटों संग बदल जाता है वही.....बंद पलकों में हैं ख्‍वाब जिसके सजे खुले आम लूट ले जाता है वही.....तोड़ गया है जो इक रिश्‍ते की गिरह आह किस अदा से मुस्‍कुराता है
 
वाणी गीत
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ज़िन्दगी के भवन में चढ़ते हुए

कैसे कैसे दौर से गुज़रा हूं मैं भरतनाट्यम्, कुचिपुड़ी, मुजरा हूं मैं।ज़िन्दगी के भवन में चढ़ते हुएमौत की सौ सीढ़ियां उतरा हूं मैं।थी मिली सूरत भली , सीरत भली गदिर्शों के दांत का कुतरा हूं मैं।कुछ गली गंदी मिलीं, कुछ पाक साफ़पैरहन मत देखिए सुतरा हूं मैं।पल फले
 
kumar zahid
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हकीकत .....ग़ज़ल ......कवि दीपक शर्मा

मैं भी चाहता हूँ की हुस्न पे ग़ज़लें लिखूँमैं भी चाहता हूँ की इश्क के नगमें गाऊंअपने ख्वाबों में में उतारूँ एक हसीं पैकरसुखन को अपने मरमरी लफ्जों से सजाऊँ ।लेकिन भूख के मारे, ज़र्द बेबस चेहरों पेनिगाह टिकती है तो जोश काफूर हो जाता हैहर तरफ हकीकत में क्या
 
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Gazal: इक पैकरे-जमाल नज़र आ रहा था वोह

------- पैकरे-जमाल -------इक पैकरे-जमाल नज़र आ रहा था वोह जोड़े में लाल, ‘लाल’ नज़र आ रहा था वोहहर ज़ुबां पर तारीफ थी रूख्सारे यार की'साहिल' तेरा अशआर नज़र आ रहा था वोहऔरों की तरह हम भी खिल्द-ए-ख्वाह हैं यारोमेरी नज़र में खिल्द नज़र आ रहा था
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देख कचहरी में चलती हैं.....

भाई सतपाल ख्याल जी ने राहत इंदौरी साहब का मिसरा ग़ज़ल कहने के लिये अपने ब्लाग आज की ग़ज़ल पर लगाया था इस खूबसूरत मिसरे पर जो भी जैसा भी कह पाया उन्हें भेज दिया था लेकिन मिसरे का नशा दिमाग़ से उतरा नहीं सो उन्हें भेजने के बाद भी शेर होते रहे रदीफ बदल कर
 
योगेन्द्र मौदगिल
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सीख................(गजल).................श्यामल सुमन

रो कर मैंने हँसना सीखा, गिरकर उठना सीख लिया।आते-जाते हर मुश्किल से, डटकर लड़ना सीख लिया।। महल बनाने वाले बेघर, सभी खेतिहर भूखे हैं।सपनों का संसार लिए फिर, जी कर मरना सीख लिया।। दहशतगर्दी का दामन क्यों, थाम लिया इन्सानों ने।धन को ही परमेश्वर माना, अवसर
 
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“उदास चेहरे सिसकते हुए हजार मिले” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

"ग़ज़ल"वफा की राह में, घर से निकल पड़े हम तो,डगर में फैले हुए झाड़ और खार मिले!खुशी की चाह में, भटके गली-गली हम तो,उदास चेहरे सिसकते हुए हजार मिले!!हमारे साथ तो बस दिल की दौलतें ही थी,खुदा की बख्शी हुई चन्द नेमते ही थी,मगर यहाँ तो हमें सिर्फ खरीदार
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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एक ग़ज़ल : जूनून-ए-इश्क में हमनें ......

जुनून-ए-इश्क़ में हमने न जाने क्या होगा ! हैं इतने बेख़ुदी में गुम कि हम को क्या पता होगा मैं अपने इज़्तिराब-ए-दिल को समझाता हूँ रह रह कर कि जितना चाहता हूँ वो भी उतना चाहता होगा हमें मालूम है नाकामी-ए-दिल, हसरत-ए-उल्फ़त हमें तो आख़िरी दम तक वफ़ा से वास्ता
 
आनन्द पाठक
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न जुबां है मेरे पास हीं, न बोलती हैं आबादियां: कनिष्क कश्यप

खुशी आंखे है भूल गयीं, यूं देखी हमने उदासियां कुछ और ना तमन्ना रही, मेरी हसरतें धुआं-धुआं सहर हुए अर्से बिते, न चांदनी ही होती है न जुबां है मेरे पास हीं, न बोलती हैं आबादियां
 
kanishka kashyap
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जौन एलिआ की याद में उन्ही की एक गज़ल

जौन एलिआ को सुन कर एहसास हुआ, जो मीर और मिर्ज़ा से ले कर तमाम नाकाबिले-इंदिराज़ कह गए वो नासिर्फ़ नाकाफ़ी था बल्कि कई बरसों ऐसा कितना कुछ वो सुन कर हम वाह-वाह किया किये जो दर-अस्ल नाकाबिले-दाद था!
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नई ग़ज़ल/ आंकड़ों में मुल्क ये खुशहाल लगता है

आंकड़ों में मुल्क ये खुशहाल लगता है   पर हकीकत में बहुत कंगाल लगता है अब यहाँ आलोचनाएँ कौन सुनता हैसच तनिक-सा बोलिए मुंह लाल लगता है  झूठ की बुनियाद पर हैं कुरसियों के घर सत्य बेचारा बड़ा बदहाल लगता हैप्यार से जो बोलता है वह बड़ा
 
girish pankaj
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gazal

आज हमारे बीच ये हालात कैसे हैंसमझना ही ना चाहो सवालात कैसे हैंआईने  में तुम ही हो तुम में आईना भी है बहार निकल आने के खयालात कैसे हैंहो गयी है जिंदगी चीजों के ऊंचे दाम सी बचे हुए अब अपने दिन रात कैसे हैंचहरे की झुलसी खाल में धंसी हुई
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अशोक जमनानी की ग़ज़ल- परिंदों लौट आना

Share परिंदों शाम को लौट आना घर ज़रा ज़ल्दी हम दीवारें इस ख़ामोशी से ऊब जातीं हैंउतने ही दानें चुनो जितनी ज़रूरत है हमें यहां कितनी चोंचें घोंसलों  में रीती आतीं हैंजुगनुओं से कह दो ना रात में चमका करें वो रोशनी महलों की इससे खीज जाती हैउनसे ना मिलना
 
माणिक
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तुम्हारी खामोशियाँ .......(गजल)................अनामिका (सुनीता)

आज ये खामोशियाँ सिमटती क्यों नहींहाल-ऐ-दिल आपके लब सुनते क्यों नहीं..कभी तो फैला दो अपनी बाहों का फलकमेरी आँखों की दुआ तुम तक जाती क्यों नहीं..दर्द-ऐ-दिल बार-बार पलकों को भिगो जाता है ...आपका खामोश रहना मुझे भीतर तक तोड़ जाता है..मुहोब्बत मेरी जिंदगी की
 
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