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रोशन लाल ‘रौशन’ की चंद ग़ज़लें - कोई बुश है कोई ओबामा है… किसने गिरते धुओं को थामा है…

एक अंधी हवस का शिकार आदमी भूल बैठा है आपस का प्यार आदमी खुद से जब तक नहीं आशकार आदमी आदमी में न होगा शुमार आदमी जीतकर भी गया जंग हार आदमी कितना नादान है होशियार आदमी जान किन मौसमों के हवाले हुआ आदमी को नहीं साजगार आदमी अपने साये के पीछे चला जा रहा एक
 
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दामोदर लाल जांगिड़ की ग़ज़ल

कहीं मिला भूखे बच्चों की खातिर हाथ पसारे बाप । कहीं मिला भूखा बेटों के आगे हाथ पसारे बाप।। जल्दी से घर खेत का बंटवारा कर लेते हैं बेटे, आंख मूंद कर के आंगन में ज्यों ही पांव पसारे बाप। कभी भी कुछ भी मांगे बेटे दे दे मीठे लगते हैं, जिस दिन खेंचा हाथ उसी
 
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इन्दिरा 'शबनम' की ग़ज़ल

  चलते-चलते राहे वफा से हट जाते हैं हम भी क्यों आपस में यूँ ही कट जाते हैं कौन से मौसम का पड़ता है वार भला सा बढ़ते बढ़ते रिश्ते क्यों घट जाते हैं कौन सी आग भड़क उठती है नफरत की दिल अपने क्यों दूध की तरह फट जाते हैं जिन राहों पर चलते हैं हम जैसे लोग
 
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राजकुमारी शर्मा ‘राज’ की ग़ज़ल - तमन्ना

सिवा मेरे लुटा कोई नहीं है सुबूत इस बात का कोई नहीं है वहाँ मैं आसरा ढूंढे मुसलसल जहाँ बे आसरा कोई नहीं है मुझे सब जानते पहचानते हैं मगर मेरा पता कोई नहीं है जो नजरों में बसा था हर किसी का उसे अब चाहता कोई नहीं है वो पागल है जमाने की नजर में जो कहता है
 
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आचार्य भगवत दुबे की ग़ज़ल : याद के जुगनू, मेरे हमदर्द हैं – इनमें अंगारे नहीं अभिमान के

हैं यहाँ क़ातिल बहुत इंसान के घोंटिये मत, खुद गले अरमान के   तिश्नगी को क्यों हवाले कर दिया क्रूर संरक्षण में रेगिस्तान के   याद के जुगनू मेरे हमदर्द हैं इनमें अंगारे नहीं अभिमान के   बेवफा अब बंद कर हमदर्दियाँ बोझ ढो न पाऊंगा अहसान के
 
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अनुज नरवाल रोहतकी की ग़ज़ल

मौसम बदला-बदला लगता है लम्हा लम्हा चिड़चिड़ा लगता है जिसे भी देखिए खाने को दौड़ता है आदमी कुछ ज्यादा ही भूखा लगता है देश के बुजुर्गों की हालत देखकर सच में दिल को बड़ा धक्का लगता है बेटी चाहे चांद-तारे तोड़ लाए फिर भी क्यूं हमें निकम्मा बेटा ही अच्छा लगता है
 
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चंद चुनिंदा शेरो – शायरी

  अब भी कुछ नहीं बिगड़ा प्यारे पता करो लोहारों का धार गिराना काम नहीं है लोहे पर सोनारों का - नीरज कुमार ------. अपने मंसूबों को नाकाम नहीं करना है मुझको इस उम्र में आराम नहीं करना है - शाहिद लतीफ़ ------. अपनी चाहत का यूँ पता देना सामना हो तो
 
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श्याम गुप्त की ग़ज़ल की ग़ज़ल

              शेर मतले का न हो तो कुंवारी ग़ज़ल होती है | हो काफिया ही जो नहीं,बेचारी ग़ज़ल होती है। और भी मतले हों, हुश्ने तारी ग़ज़ल होती है । हर शेर मतला हो हुश्ने-हजारी ग़ज़ल होती है। हो
 
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शकील जमाली की ग़ज़ल

  सफ़र से लौट जाना चाहता है परिन्दा आशियाना चाहता है   कोई स्कूल की घंटी बजा दे ये बच्चा मुस्कुराना चाहता है   उसे रिश्ते थमा देती है दुनिया जो दो पैसे कमाना चाहता है   यहाँ साँसों के लाले पड़ रहे हैं वो पागल ज़हर खाना चाहता है  
 
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शम्भु नाथ मिश्र की ग़ज़ल

ग़ज़ल कौन से जुर्म का बदला वतन चुकाता है कफ़न    को  बेचकर रोटी गरीब खाता  है. ठिठुरते ठण्ड में फुटपाथ पर ख़ामोशी से ये दर्द   ओढ़ता   बिछाता       है. ज़रुर ये  कई 
 
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शरद तैलंग की दो ग़ज़लें

  १) मेरा साया मुझे हर वक़्त कुछ बदला सा लगता है, मगर ये साथ रहता है तो फिर अपना सा लगता है । सितारे भी तो रातें जाग कर हरदम बिताते हैं, अब अपना दर्द उनके सामने अदना सा लगता है । नदी जब सूख जाती है तो खुश होते किनारे हैं, दख़ल देना किसी का बीच में
 
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मुनव्वर राना की दो ग़ज़लें

(1) जहां तक हो सका हमने तुम्हें परदा कराया है मगर ऐ आंसुओं! तुमने बहुत रुसवा कराया है चमक यूं ही नहीं आती है खुद्दारी के चेहरे पर अना को हमने दो दो वक्त का फाका कराया है बड़ी मुद्दत पे खायी हैं खुशी से गालियाँ हमने बड़ी मुद्दत पे उसने आज मुंह मीठा कराया है
 
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श्रवण कुमार वर्मा की ग़ज़ल

ग़ज़ल हारा सा मिरे साथ पड़ा था वो भी मेरे हमदोश हवाओं से लड़ा था वो भी मैं भी इजहारे तमन्ना पे हुआ था नादिम सर झुकाये हुए कुछ सोच रहा था वो भी जाने क्या बात थी भीगा नहीं दामन उसका रात ख्वाहिश के समंदर में गिरा था वो भी वो मिला था मिरी तकमील की खातिर मुझसे
 
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दीनदयाल शर्मा की ग़ज़ल

ग़जल की शक्ल में एक रचना तकाज़ा वक्त का / दीनदयाल शर्मा चेहरे पर ये झुर्रियां कब आ गई, देखते ही देखते बचपन खा गई. वक्त बेवक्त हम निहारते हैं आईना, सूरत पर कैसी ये मुर्दनी छा गई.  तकाज़ा वक्त का या ख़फ़ा है आईना. सच की आदत इसकी अब भी ना गई. है कहाँ
 
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घनश्याम मौर्य की ग़ज़ल

ग़ज़ल मुझको ज़रा समझा ये माजरा तो दीजिये। इस मौके पर फबता मुहावरा तो दीजिये। तैयार बाज़ीगर है, खड़े हैं तमाशबीन पर खेल दिखाने को दायरा तो दीजिये। महफिल में अभी तक नहीं छाया है वो सुरूर, हर शख्‍स के गिलास में सुरा तो दीजिये। संगीत में तिलिस्‍म अब रहा नहीं
 
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शम्भु नाथ मिश्र की ग़ज़ल

ग़ज़ल बेख़ौफ़ हो उठे मेरे जज्बात अँधेरे में , होती है उनसे रोज मेरी बात अँधेरे में, फरियाद उजाले से कर के थक गया लेकिन , मुझसे हुई फिर मेरी मुलाकात अँधेरे में , उसने न हमें समझा हमने न उसे जाना , वो भी रहा हम भी रहे एक साथ अँधेरे में , हम वक्त के हालात पर
 
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घनश्याम मौर्य की ग़ज़लें

ग़ज़लें -1- तेरा-मेरा रिश्ता बहुत पुराना लगता है। फिर भी हर पल ताजा ये याराना लगता है। ऐसे बेपर्दा होकर तुम निकला करो न घर से, कैसी-कैसी नज़रों से ये जमाना तकता है। शाम सुहानी अपने यारों संग बितानी हो तो, सबसे अच्‍छी जगह मुझे मयखाना लगता है। ऐरे-गैरे को
 
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रामेश्वर शुक्ल अंचल की ग़ज़ल

तुम कैसे नद हो जो टंगे रहे हिम की दीवारों पर, अब तक उतरे नहीं पहाड़ों से भू की जलधारों पर.   मौसम दहका - बंद हवाओं के द्रोही तेवर बदले, तुम रीझे रह गए बादलों के रंगीन इशारों पर.   ऐसी भी क्या बात – न व्यथित निर्झर-खेल-तराई हो, तुम सुध-बुध खो
 
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घनश्याम मौर्य की ग़ज़लें - दिल की पुकार को यूँ ही सुन लेती है ममता, तुम माँ को खबर भेजने क्‍यों तारघर गये?

ग़ज़लें -1- दिल ने माना था तुम खुदा निकले। तुम भी औरों-से बेवफा निकले। कोई धोखा न खाये मेरी तरह, नफ़स-नफ़स से ये दुआ निकले। प्‍यासे ही राह पर हम बढ़ते रहे, आगे शायद कोई कुआँ निकले। शाम का वक्‍त कैसे गुजरेगा, कहीं तो कोई मयकदा निकले। जाल फेंका था मछलियों
 
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उमेश कुमार चौरसिया की रचना - अकेले में घावों को कुरेदो मत यारों, किसी प्रेमगीत का पद गुनगुना लो।

उदासी को छोड़ो जरा मुस्कुरा लो, गुमसुम क्यूं बैठे हो कोई गीत गा लो। अंधेरे इस जीवन में घिर आते कई बार, आस की लौ से तुम जहां जगमगा लो। हार के यूं बैठो ना मायूस होकर, फिर जीतने का विश्वास तुम दोहरा लो। अकेले में घावों को कुरेदो मत यारों, किसी प्रेमगीत का पद
 
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राजेश चड्ढा की चार ग़जलें

१. कश्ती का मुसाफिर हूँ , उस पार उतरना है, मल्लाह के हाथों में , जीना और मरना है. जीना है समंदर के, सीने से लिपट जाना, साहिल की तरफ बढ़ना, जीना नहीं मरना है. घर छोड़ के जाना तुम, ग़र छोड़ दे घर तुमको, तारों का निकलना ही, रातों का संवारना है. घर दुनिया
 
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दीनदयाल शर्मा की ग़जल : कटती रहेगी ज़िंदगी - श्याम गुप्त की गजल : कुछ तुम झुको कुछ हम झुकें ...पर प्रतिक्रिया में

श्याम गुप्त की मूल ग़ज़ल यहाँ पढ़ें   ना तुम रुके ना मैं रुका, कैसे मिलेगी ज़िन्दगी. ना बोले तुम, ना बोला मैं , कैसे सुनेगी ज़िन्दगी.   ना तुम सुनो, ना मैं सुनूँ , ना तुम झुके, ना मैं झुका, टूट टूट कर ऐसे में, कैसे ढलेगी जिन्दगी .   हर गम
 
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श्याम गुप्त की ग़ज़ल : कुछ तुम झुको कुछ हम झुकें .......

      कुछ तुम रुको  कुछ हम रुकें मिलती रहे ये ज़िंदगी | कुछ तुम कहो कुछ हम कहें सुनती रहे ये ज़िंदगी  | कुछ तुम सुनो कुछ हम सुनें कहती रहे ये ज़िंदगी, कुछ तुम झुको कुछ हम झुकें ढलती रहे ये ज़िंदगी | बहकें जो साथ साथ तो महकी
 
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अनुज नरवाल रोहतकी की गणतंत्रिया ग़ज़लें

1 हाय! गुन्‍डे-मवाली लोग सियादत1 कर रहे हैं कैसे-कैसे लोग यहां सियासत कर रहे हैं   बिठाकर इनको अपनी सर-आँखों पर हम क्‍यों खराब इनकी आदत कर रहे हैं   ये सियादत की कमी नहीं है तो क्‍या है समझाओ,लोग क्‍यों बगावत कर रहे हैं   कैसे हो यकीं उनकी
 
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अनिल चड्डा की ग़ज़ल - उन्होंने चुपके से ज़हर पिला दिया

" उन्होंने चुपके से ज़हर पिला दिया " गरज़ पड़ी न थी कि फिर से बुला लिया, इस्तेमाल किया और भुला दिया । दवा-दारू से काम चला नहीं जब, उन्होंने चुपके से ज़हर पिला दिया । वक्त आया था जिंदगी जीने का जब, खुदा ने चैन की नींद सुला दिया । हमारी हस्ती ही क्या
 
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प्रकाश बादल की दो ग़ज़लें

शिमला में युवा पत्रकार एवं चर्चित गजलकार श्री प्रकाश बादल की चंद गजलों से रू-ब-रू होने का सुअवसर मिला। ब्लाग की दुनिया में इनकी सक्रियता प्रेरित करती हैं। पेश है श्री बादल की दो गजलें- 1. शिवालों मस्जिदों को छोड़ता क्यों नहीं। खुदा है तो रगों में दौड़त
 
रंजन राजन
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समीर लाल ‘समीर’ की ग़ज़लें

सुविख्यात चिट्ठाकार समीर लाल ‘समीर’ के काव्य संग्रह – बिखरे मोती की पांच प्रतियाँ रचनाकार के हिन्दी व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन में पुरस्कार स्वरूप प्रदान की जाएंगी. प्रस्तुत है उक्त संग्रह की 3 चुनिंदा ग़ज़लें ) (ग़ज़ल 1) मौत से दिल्लगी हो गई जिन्दग
 
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राकेश भ्रमर की चंद ग़ज़लें

ग़ज़ल 1 आदमी नकली मुखौटों में सदा जीता रहा. जन्दगी के घूंट कड़वे वो सदा पीता रहा. वह परिन्दों की तरह उड़ने की ख्वाहिश में गिरा, दूर अपने हमदमों से वो सदा उड़ता रहा. राह में कांटे बिछाकर फूल की चाहत लिए, आदमी पतझड़ के साए में सदा चलता रहा. लुट गए जो इ
 
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राजेश देशमुख की तीन ग़ज़लें

ग़ज़लें   -डॉ.राजेश देशमुख   1. आज ख़ुद को आजमा  के आए हैं ! हम उसकी शादी में जाके आए हैं !! कहीं भी जाते मरते एक बार .! वहां जाकर सौ बार मरके आए हैं .!! जिंदगी को बिदा कर जिन्दगी से ! आज हम खुदखुशी करके आए हैं !! 2. कभी इसके कभी उसके
 
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