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पीएम, प्रेस-कांफ्रेंस और पत्रकारिता

सोमवार को हुई प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की प्रेस कांफ्रेंस से कुछ निकला हो या नहीं, इसने पत्रकारों और पत्रकारिता के तेजी से बदलते सरोकारों को बेपर्दा जरूर कर दिया। ये संयोग नहीं कि प्रधानमंत्री के लिखित वक्तव्य में तो सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा से जुड़े
 
pankaj srivastava
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भूमण्डलीय गांव में भूख का सवाल

एक आर्थिक सर्वसत्ता वाद गोलियों से नहीं वरन अकालों से हत्या करता
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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भूमण्डलीय ग्राम से बहिष्कृत शहरी ग़रीब

ग़रीबी की बहस हमारे देश में बहुत पुरानी है। औपनिवेशिक ग़ुलामी से मुक्ति के बाद से ही हमारे विकास की तमाम योजनाओं में ग़रीबी हटाने और देश के भीतर व्याप्त सामाजार्थिक विषमता को दूर करने की बातें की जाती रहीं। लोकतांत्रिक प्रणाली और शायद गांधी के ग्राम स्वराज
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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दोषी कौन : संविधान या संसद

भारत अपने गंणतंत्र दिवस की 60वीं वर्षगांठ मना रहा है। यह दिन वास्तव में किसी भी लोकतंत्र के लिए पर्व होता है। हमारे लिए आज के दिन यह समीक्षा करना आवश्यक है कि क्या 60 वर्ष पूर्व हम जिस लक्ष्य को लेकर निकले थे उसे पाने में हम कितने सफल हुए? पिछले 6 दशकों
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यह रेखा ग़रीबों की गर्दन से गुज़रती है...

आजकल दिल्ली में है जे़रे बहस ये मुद्दुआ उन्नीसवीं सदी के प्रसिद्ध समाजशास्त्री हरबर्ट स्पेंसर ने शायद सबसे पहली बार आधिकारिक तौर पर सामाजिक परिक्षेत्र में योग्यतम की उत्तरजीविता के मुहावरे का प्रयोग किया था। उनका मानना था कि ‘‘गरीब लोग आलसी होते हैं,काम
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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हौसलों का बादशाह -लुल्हवा

आसपास के गांव के लोगों ने लुल्हवा की हिम्मत को देखते हुए नेहरा चौक का नाम बदलकर 'लुल्हवा चौक' कर दिया। इस घटनाक्रम ने लुल्हवा के दिल को सुकून से भर दिया। वह अब अपने आप को गौरवान्वित महसूस करता है।
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क्या आपको भी मथते हैं ये सवाल .............!!

कल सुबह घर के बाहर बने छोटे से बागीचे में पानी डाल रही थी की दो छोटी लड़कियां आ पहुँची ... पिछले एक महीन से कई बार आ जाती है ... वही घर घर खाना मांगने वाली .... क्या भिखारन कहूँ उन्हें ... मन नही मानता ... ये छोटी बच्चियां भिखारन कैसे हो सकती हैं ...
 
वाणी गीत
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क्या आपको भी मथते हैं ये सवाल ....!!

कल सुबह घर के बाहर बने छोटे से बागीचे में पानी डाल रही थी की दो छोटी लड़कियां आ पहुँची ...पिछले एक महीन से कई बार आ जाती है ...वही घर घर खाना मांगने वाली .... क्या भिखारन कहूँ उन्हें ...मन नही मानता ...ये छोटी बच्चियां भिखारन कैसे हो सकती हैं ...जो ये
 
वाणी गीत
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कश्मीर में बालश्रम का बोलबाला

बालश्रम की जड़ों को कश्मीर के ग्रामीण और शहरी, दोनों ही इलाकों में देखा जा सकता है। ग्रामीण इलाकों में बहुत ही कम उम्र के बच्चों का इस्तेमाल बहुत ही कम पैसों या थोड़े से चावल या अनाज के एवज में पशुपालन या घरेलू सेवाओं के लिए किया जाता है।
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कविता : विशेष रिपोर्ट

बाल मजदूरी पर हमारी विशेष रिपोर्ट जारी रहेगी लेकिन पहले एक कर्मशियल ब्रेक देखते रहिये चैनल न्यूज वर्ल्ड
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सुरक्षा के लिए शर्त - देवर से शादी कर लो

पति की मौत के बाद एक महिला को कई मुश्किल हालात से गुजरना पड़ता है। पूर्व आईपीएस अधिकारी किरन बेदी के पास पहुंची एक ऐसी ही महिला बता रही हैं कि उनके सास-ससुर किस तरह उन पर देवर से शादी के लिए दबाव डालने लगे... मेरा नाम रेखा (बदला हुआ) है। उम्र 40 साल।
 
किरन बेदी
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व्यंग्य : गरीबी की मियाद

टेलीविजन वाले प्रधानमत्री के बयान से बेहद प्रसन्न हैं। बीस सालों तक ब्रेकिंग न्यूज का झंझट ही खत्म हो गया। बड़े अक्षरों में दिखलाया जाएगा-'बीस सालों में गरीबी दूर हो जाएगी।'
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गरीबी नहीं, अमीरी की रेखा हो – सुनील -

भारत सरकार के प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा विधेयक ने देश में एक बहस छेड़ दी है। सरकार ने इस खाद्य सुरक्षा का मतलब सस्ती दरों पर खाद्यान्नों की सार्वजनिक वितरण प्रणाली से माना है और इसे वह गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों तक सीमित करना चाहती है। राज्य सरकारो
 
अफ़लातून
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कम करो खर्चे!

इन दिनों केंद्र सरकार का परिवार गरीबी से जूझ रहा है। देश में गरीबी छा रही है। कहिए, कि गरीबी आ रही है। तभी तो परिवार के वरिष्ठ सदस्य और उनसे जरा से कनिष्ठ सदस्यों ने फाइव स्टार होटल छोड़कर राज्य के भवन में निवास बनाने की पहल की, या अपने दूसरे स्तर से खर्च
 
राजन अग्रवाल
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विकास का आतंक

औद्योगीकरण के नाम पर जीविका का विनाश, गरीबों का विस्थापन, सिंचाई और बिजली उत्पाद के लिए बड़े-बड़े बांध, किसानों द्वारा आत्महत्याएं किए जाने के बावजूद भी खेती का निगमीकरण और बस्तियों को समाप्त कर शहरों के सुंदरीकरण तथा आधुनिकीकरण में प्रतिकूल विकास की
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दल और गठबंधन

यह लोकतंत्र की ही महिमा है कि देश में राजनीतिक दलों की भरमार हो गई है और शायद यही इसकी ताकत भी है। हर दल अपनी अपनी ताकत के सहारे यह साबित करने में जुटा है कि उसका दल ही इस देश को आगे ले जा सकता है, लोकतंत्र को मजबूत बना सकता है। उनका सोचना भी सही है।
 
Shyam N P
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