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“चमचों की तो यहाँ भी भरमार है”

"ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर।जरा-जरा सी बात पर, अपने बनते गैर।।"32 वर्ष पहले की बात है। हमारे पड़ोस में उन दिनों अपने एक स्वजातीय की किराने की दूकान थी। उस समय उनकी दूकान में प्रतिदिन 15 से 20 हजार रुपये तक की बिक्री होती थी। समय बदला और धीरे-धीरे
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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