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दो बूंद तेल

एक व्यापारी ने अपने पुत्र को प्रसन्नता का रहस्य जानने के लिए एक बुद्धिमान वृद्ध के पास भेजा. चालीस दिन और चालीस रातों तक रेगिस्तान में चलता हुआ वह युवक अंततः एक पर्वत के शिखर पर बने हुए सुन्दर किले के पास पहुँच गया. वह बुद्दिमान वृद्ध वहीं रहता था. उस
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एक राजनेता की मौत

महामहिम के देहांत का समाचार मिलने पर बहुत लोगों को शॉक (झटका) लगा था। वे अभी तीन माह पहले ही तो राज्य की राज्यपाल बनाए गए थे। उस समय किसी ने यह थोड़े ही सोचा था कि वे इतनी जल्दी विदा ले जाएँगे, और वे भी इस तरह पद पर बने रहते हुए। पर यह तो होता ही है, जो
 
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
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राजकीय शोक और अचानक अवकाश की प्रसन्नता

आज डायरी में मुकदमे अधिक न थे, लेकिन जितने थे वे सभी समय खपाऊ थे। चार मुकदमों में अंतिम बहस थी और चारों अलग अलग अदालतों में थे। एक मकान मालिक की ओर से किराएदार से मकान खाली कराने का था। दूसरा एक डाक्टर द्वारा बिना मरीज की अनुमति प्राप्त किए और उसे
 
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
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हुसैन की मानसिक विकृति से मुक्त हुआ देश और देवी-देवता

चलो, अब देश के हिन्दू देवी-देवताओं को राहत मिलने की उम्मीद होगी? भले ही राहत पूरी तौर पर न हो किन्तु इस बात पर तो राहत है कि अब भारतीय नागरिकता लिए हुए कोई भारतीय उनके अश्लील चित्र नहीं बनायेगा। अब यदि वह इस तरह के चित्र बनाएगा तो हम उसे विदेशी कहेंगे।
 
डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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चलो आज कविता के फिर से कान मरोडें..

चलो आज कविता के फिर से कान मरोडें शीशा नहीं तो न सही कोई खिड़की ही तोडें नेताओं से कहो अब और भाषण न दें श्रोताओं के पास जूते बचे हैं थोड़े अजी बैट-बाल घुमाने से क्या धन उगता है जबतक साख है बाकी विज्ञापन से धन जोडें अभिनेत्रियों से कह दो अभिनय की फीस
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कुछ भी ज़रूरी नहीं..

आज मैं बहुत खुश हूँ हर खुशी की कोई वजह हो ये ज़रूरी तो नहीं हर जश्न में एक भीड़ हो ये ज़रूरी तो नहीं हर बार तन्हाई में इंसान तन्हा हो ये ज़रूरी तो नहीं हर आंसू के पीछे छिपा कोई दर्द हो ये ज़रूरी तो नहीं तेरी याद में आंसू बहाना मेरा फ़र्ज़ हो ये ज़रूरी
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खुशियों की नाव..

चलो आज खुशियों की नाव पर सैर कर आयें हँसी के गुब्बारों को ज़रा हवा में उडाएं चटख-चहकते फूलों का एक गुलदस्ता रख लो मस्त-अल्हड बादलों से कहो वो छतरी बन जायें सोच-सोच के ज़िन्दगी बस गुज़र रही थी बिना सोचे इस ज़िन्दगी का कुछ मज़ा उठाएं दुःख-आंसू-परेशानी स
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एक मुट्ठी आसमान..

इस धरती पर एक मुट्ठी आसमान मेरा भी है इसी धरती पर जहाँ अंधेरे के साथ सवेरा भी है पर अंधेरे से मुझे डर नही लगता अगर लगता तो क्या इतना सफर इक अंधेरे में तय करती मैं अंधेरे की चिंता मुझे होती तो क्या तेरे आंसुओं को रेगिस्तान करती मैं पर मुझे पता था कि य
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अजीब रिश्ता है ये..

अजीब सा रिश्ता है ये तुमसे हमारा पहले बेसहारा छोड़ा और अब तुम्हीं दे रहे हो सहारा हालत के मझधार में मैं खुशी से डूबने को तैयार थी के फिर पास आकर दिखा गए तुम किनारा तंग आ गई मैं अब इस मिलने-बिछड़ने के खेल से चाहती हूँ के अब बस ख़्वाबों में ही हो ज़िक्र
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नया साल आया है...

अपने नए अंदाज में नया साल आया है. कुछ पुराने गमों को छोड़कर नई खुशियां लाया है. पुरानी दुश्मनी तोड़कर, नई दोस्ती जोड़कर. पुराने लम्हे छोड़कर, नई नवेली दुनिया लाया है. हर याद नई होगी, हर फरियाद नई होगी. पुराने चेहरे खोजकर नई परियां लाया है. जो पहले सफ
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आज के दिन ---डॉ श्याम गुप्त की कविता ..

आज के दिन तुमने कहा था- आज के दिन , कितने खुश थे हम सब सजल नयनों से | मैंने भी सजाये थे , स्वप्न रंगीले ; पिछले वर्ष - जब आया था तुम्हारा सन्देश | तुमने कहा था , आज के दिन कितनी भीड़ थी घर में ; सारा घर था गया सजाया , एक हुए थे हम-तुम, थी सब ओर, हर्ष
 
Dr. shyam gupta
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दिवाली या सिर्फ सजी हुई इमारतें .....

अध्यात्मिकता का सम्बन्ध स्वतंत्रता से है और जब व्यक्ति पूर्ण रूप से स्वतंत्र होता है तो उसे खुश होने के लिए त्यौहार की जरुररत नहीं होती,हमारे देश में व्यक्तिगत जीवन को सामाजिक दायरे में इस तरह से बाँधा गया है ,की वह परतंत्रता को ही अपना जीवन लक्ष्य स
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“शिवा”

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PREETI BARTHWAL
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चीजें जो कभी करती है खुश और कभी उदास !

इस कायनात के बहुत सारी चीजों में से कुछ चीजें ऐसी हैं जो कभी कर देती है खुश और कभी उदास, वही चीजें वे चीजें करीब होती हैं दिल के इतने करीब कि निकलती हैं साँसों को छूते हुए मोहल्ले के चौराहे से निकलती थी जो राह तुम्हारे घर के लिए उन पर अक्सर अपने ख्वा
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बेटी..

बेटी बनकर माँ बाप की ख़्वाहिश को अधूरा किया मैंने सबने मुझे कांच का पुतला समझा, पर ख़ुद को टूटने नहीं दिया मैंने सफ़ेद कागज़ का टुकडा कहा, पर धूल न जमने दी मैंने किसीने भी मुझे कुल का चिराग नहीं कहा फिर भी अपने कुल का नाम रोशन किया मैंने....
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मुस्कुराहट अभियान जारी हो!

कहते हैं कि मुस्कुराहट बुरी से बुरी स्थिति को अच्छा बनाने की ताकत रखती है। इस गुर को मैं कई विकट परिस्थितियों में आजमा चुका हूँ। जहाँ लड़ने से भी काम नहीं चलता वहाँ एक छोटी सी मुस्कुराहट काम कर जाती है। मुस्कुराते हुये लोग न सिर्फ खुश, अपितु सुंदर भी
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आप प्रसन्न हैं तो मालामाल हैं

जीवन की भागम-भाग और अवमूल्यन से भरे समय में प्रसन्नता दुर्लभ होती जा रही है।ज़िन्दगी में सारे तामझाम की उपलब्धता के बावजूद ख़ुशी पाना मुश्किल होता जा रहा है. वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी श्री नरहरि पटेल का यह निबंध बता रहा है कि प्रसन्नता किस तरह से आपके मन के
 
शब्द-सृष्टि
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