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गिरीश मिश्र के लेखन में अज्ञान और उद्दंडता का मिश्रण दिखाई पड़ता है

सदानंद शाही के संपादन में निकलने वाली पत्रिका साखी के 20वें अंक में छपे अपने (मूलतः अंगरेजी में लिखे) पत्र में, अर्थशास्त्र के प्राध्यापक और आर्थिक इतिहासकार गिरीश मिश्र ने रामविलास शर्मा और मैनेजर पांडेय के कार्यों पर गंभीर टिप्पणियां की थीं. इस पर
 
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परमाणु जवाबदेही विधेयक में छिपे सवाल

प्रफुल्ल बिदवई क्या हमने भोपाल गैस त्रासदी से कोई सबक लिया है? क्या चौथाई सदी लंबी चोट, बदनामी और अपमान की उस स्थायी पीड़ा से हमने कुछ सीखा है जो दुनिया की सबसे भयावह रासायनिक दुर्घटना के पीड़ितों को भुगतनी पड़ी है? परमाणु दुर्घटना होने पर मुआवजा देने
 
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यह जश्न, यह गीत किसी को बहुत हैं…

जो कल तक हमारे लहू की खामोश नदी में तैरने का अभ्यास करते थे.आपने पोस्कोविरोधी आंदोलन पर क्रूरतम पुलिसिया कार्रवाई की निंदा करती हुई एक अपील हाशिया पर पढ़ी. नीचे हम इस कार्रवाई की एक और भर्त्सना पेश कर रहे हैं.यह टिप्पणी फेलिक्स पाडेल की है. फेलिक्स
 
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उड़ीसा में शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन कर रहे लोगों पर पुलिस हमला बंद करो

15 मई को उड़ीसा में प्रस्तावित पोस्को स्टील परियोजना का विरोध कर रहे किसानों के शांतिपूर्ण धरना पर पुलिस की 40 डिवीजनों ने हमला किया, ताकि किसानों को जमीन से हटा कर उसे पोस्को को सौंपा जा सके. पुलिस फायरिंग से सौ से अधिक लोग घायल हुए और कम से कम एक
 
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आदिवासियों का शिकार बंद करे सरकार

भारत के किसी अखबार का शायद यह पहला संपादकीय है, जिसमें साफ-साफ शब्दों में सरकार से ऑपरेशन ग्रीन हंट को रोके जाने की मांग की गई है और माओवादियों से एक ईमानदार बातचीत शुरू करने का आह्वान किया गया है. डेक्कन हेराल्ड के इस संपादकीय को पढ़वाने के लिए भाई
 
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प्रोपेगेंडा, बिकी हुई खबरें, मीडियाः एक अदृश्य सत्ता

हमारे समय में चेतना की धार को कुंद करने वाले शब्दों को उसके सही और वास्तविक मायनों में व्याख्यायित करने वाले प्रख्यात पत्रकार जॉन पिल्गर ने यह व्याख्यान (यहां एक वीडियो भी है) शिकागो में पिछली जुलाई में दिया था। इस व्याख्यान में वे विस्तार से बताते हैं
 
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भारतीय गणतंत्र और युवा

प्रत्युष प्रशांतकोपेनहेगन में पर्यावरण पर चिंता, देश में मंहगाई पर चिंता , थ्री इडियट के मनोरंजन और ज्योति बसु के निधन से अचानक हम देश के 61वें गणतंत्र दिवस पर चले आये हैं। यदि नजर दौड़ायें, तो साफ हो जाता है कि खनिज संपदा से भरपूर इस देश में गणतंत्र के
 
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किसे इडियट बना रहे हैं आमिर खान!

 पुण्य प्रसून वाजपेयीहैलो, जी आमिर खान आपको इन्वाइट कर रहे हैं। इंटरव्यू देने के लिए। आप तो जानते हैं कि आमिर खान देश भ्रमण कर रहे हैं। जी.... '3 इडियट्स' को लेकर। हाँ, रविवार को वह चेन्नई में होंगे....तो आपको चेन्नई आना होगा। आप बीस दिसंबर यानी
 
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नेपाल किधर जा रहा है

कुछ दिनों पहले खबर आई की नेपाल में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने अपने किशोर सैनिकों के पुनर्वास के लिए उन्हें यूएन के साथ हुए एक समझौते के तहत छोड़ दिया है. इसके साथ ही नेपाल के दूसरे घटनाक्रमों ने भी नेपाल में जनवाद और जनता के संघर्षों को लेकर बहुत सरे सवाल
 
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जनता को गुमराह करना शर्मनाक है : साईनाथ

पी साईनाथआप सोचते होंगे कि अख़बारों में सिर्फ़ एक पेज 3 होता है? लेकिन महाराष्ट्र के अख़बार ऐसा नहीं मानते। हाल के चुनाव में उनके पास कई पेज 3 थे, जिन्हें वो लगातार कई दिनों तक छापते रहे। उन्होंने सप्लिमेंट के भीतर सप्लिमेंट छापे। इस तरह मुख्य अख़बार में
 
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अदालती निर्णय पर कानूनी मुहर का प्रश्न : एक बहस

अंजलि सिन्हा   अगस्त , 1997 में सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया था जिसे विशाखा जजमेंट के नाम से जाना जाता है। कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न को लेकर इस फैसले ने दिशानिर्देश जारी किए थे। पिछले दिनों न्यायमूर्ति
 
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अफ्स्पा : देश में एक अंधा कानून

मणिपुर और पूर्वोत्तर भारत के अन्य राज्यों के साथ अफ्स्पा देश के अनेक जगहों में घोषित-अघोषित तौर पर लागू है. अभी आपरेशन ग्रीन हंट के नाम पर पञ्च और राज्यों में युद्ध और आपातकाल थोप दिया गया है. ऐसे हालात में जनता किसतरह जि रही है और इसका प्रतिरोध कर र
 
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तेलंगाना : विकेन्द्रीकरण के बदले अर्थों के बीच नये राज्य

तेलंगाना की मांग ने पिछले कुछ समय से भारतीय राजनीति में गरमाहट ला दिया है. लेकिन यह पहला मौका नहीं है, जब तेलंगाना ने पूरे देश का ध्यान खींचा है. 1947 में सत्ता हस्तांतरण के कुछ समय बाद ही तेलंगाना में कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्वा में किसानों ने साम
 
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भूख से मरनेवालों के लिए एक प्रवक्ता, तसवीर सहित

जून 2009 को खंडवा (मध्य प्रदेश) के सलेधना गाँव की 2 माह कि बच्ची रीना किशोर की भूख से मौत हो गयी. इसी साल अक्टूबर के शुरूआती दिनों में अमेठी में एक रिक्शाचालक की मौत भूख से हो गयी. ये नहीं जानते थे कि इनकी भूख के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय प्रवक्ता नियुक्
 
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अन्याय को यहां न्यायिक समर्थन मिला हुआ है

भुखमरी और मानवाधिकार का सवाल : नए सिरे से सोचें और लड़ें सुनीत चोपडा, मानवाधिकार कार्यकर्ता मानवाधिकार अभी अपने सबसे नाजुक दौर से गुजर रही है। बेहद संकट की स्थिति है। मानवाधिकार संरक्षण में सूचना के अधिकार को एक कारगर युक्ति माना गया। सरकार इसमें बदल
 
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देखिए आपने मणिपुर को क्या बना दिया है

प्रभात खबर में हमारे साथ काम करते थे विजेन . हमारे मिजाज के दोस्त थे. अभी दिल्ली में हैं, चौथी दुनिया में. लिखते हैं और बहुत अच्छा. लिखते हैं. आपने देश के बारे में, वहां की पीड़ा और वहां के संघर्ष के बारे में उन्होंने कुछ लिखा है. आप भी पढ़िए. उनके ब्ल
 
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त्रासदियों-बरसियों का वर्ग चरित्र

ऐसा क्यों है कि मुंबई हमले की बरसी एक राष्ट्रीय शोक दिवस में परिणत कर दी जाती है (और यह जायज भी है) लेकिन भोपाल जनसंहार कभी भी त्रासदी और शोक का प्रतीक नहीं बन पाया. इसके पीछे का गणित क्या है? बता रहे हैं प्रभाकर चौबे. पच्चीस साल से भोपाल निवासी
 
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बाबरी मस्जिद की राजनीति

कुलदीप नैयर 'मन्दिर बनने दें'। बाबरी ध्वंस के एक दिन बाद जब मैने अटल बिहारी वाजपेयी से उनकी प्रतिक्रिया पूछी थी तो उन्होंने यह टिप्पणी की थी। उनकी टिप्पणी से मुझे आर्श्चय हुआ था क्योंकि मैं उन्हें भारतीय जनता पार्टी की एक उदारवादी ताकत समझता था। फिर
 
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यह शर्मनाक सौदा लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक है!

हाल ही में संपन्न हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में पार्टियों और उम्मीदवारों के द्वारा अपने प्रचार के लिए मीडिया में धन का जम कर इस्तेमाल हुआ। अपने किसी भी चुनावी कवरेज के लिए एक उम्मीदवार को धन के इस संगठित खेल का हिस्सा होना पड़ा या कहें तो जबरन मज
 
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युद्ध और शांति के हिंसक समय में नोबेल पुरस्कार

विख्यात इतिहासकार हॉवर्ड ज़िन अमेरिकी सरकारों की साम्राज्यवादी नीतियों के प्रखर आलोचक रहे हैं. ज़िन नागरी अधिकारों के लिए और युद्ध-विरोधी अनेक आन्दोलनों में भी सक्रिय रहे हैं. उनकी पुस्तक 'पीपुल्स हिस्ट्री ऑफ़ यूनाइटेड स्टेट्स' मॉडर्न क्लासिक का दर्ज
 
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भोपाल गैस कांड : देश की सरकार हत्यारों के साथ खड़ी है

जब देश की सरकार देशी-विदेशी निगमों के हित में जनता के खिलाफ सेना और वायुसेना उतार रही है, एक कार्पोरेट की लापरवाही, मनमानी और हमारी व्यवस्था के जन विरोधी चरित्र से जुडी जनता की त्रासदी की बरसी को याद करना प्रासंगिक है. इस घटना से जुड़ा हर तथ्य भयावह
 
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शांति के लिए पहल का सच और न्याय के लिए पहल की ज़रुरत

नंदिता हक्सर शांति के लिए नागरिकों की पहल द्वरा तैयार किए गए प्रस्तावों ( मेनस्ट्रीम में प्रकाशित , ” आक्रमण बंद कर निःशर्त बातचीत की शुरूआत करो ” शीर्षक से प्रकाशित ) को बहुत ध्यान से पढ़ा। ” नक्सल समस्या ” से क्रूर सैन्य बल द्वारा निपटने की भारतीय र
 
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बिहार को जरा गौर से देखिए, और इस तसवीर को भी

नीतिश कुमार के सत्ता में आने के बाद पूरे देश में यह हवा बनाई गई है की बिहार अब जातिवाद , परिवारवाद , गुंडाराज से मुक्त हो रहा है , क्रमशः । इन प्रचारक पत्रकारों ने बिहार में सामाजिक न्याय और विकास के झंडे गडे जाने के बारे में कितना कुछ लिखा है । आईये
 
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जब लोग क़त्ल किए जा रहे हों तो लड़ने से 'बेहतर' क्या कुछ हो सकता है?

सरकार का फरमान है कि देश में असहमति की कोई भी आवाज़ उठने नहीं दी जायेगी। साम्राज्यवाद की दलाल सरकार ने कार्पोरेशनों के हित में लोकतंत्र के खिलाफ , जनता के प्रतिरोधों के खिलाफ और ख़ुद देश की व्यापक जनता के खिलाफ अपनी सेना उतार दी है। यह युद्ध भी दो दे
 
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गोरखपुर से कात्यायनी की आपात अपील

प्रिय साथी , आज कात्‍यायनी ने गोरखपुर पहुंचकर मज़दूर आंदोलन के समर्थन में प्रेस कांफ्रेंस की और जिलाधिकारी कार्यालय पर चल रहे मजदूरों के धरने में शामिल हुईं। वहां के हालात को देखकर उन्‍होंने देश भर के साथी लेखकों , एक्टिविस्‍टों के नाम एक आपात अपील ज
 
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कॉरपोरेट जगत के हित में देश की आम जनता के संहार की योजना रोकें

प्रधानमंत्री के नाम एक खुला खत कॉरपोरेट जगत के हित में देश की आम जनता के संहार की योजना रोकें अरुंधति रॉय , नोम चोम्स्की , आनंद पटवर्धन , मीरा नायर , सुमित सरकार , डीएन झा , सुभाष गाताडे , प्रशांत भूषण , गौतम नवलखा , हावर्ड जिन व अन्य प्रति डॉ मनमोहन
 
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चांद पर पहुंचने का झूठ और चालीस साल पहले का सच

आज जब दुनिया मनुष्य के चांद पर पहुँचने के चार दशक पूरे होने के उलास में डूब-उतरा रही है, हमें एक बार उन वास्तविक तथ्यों और सवालों पर नज़र डालने की ज़रूरत है, जो इस अभियान से जुड़े हुए हैं और उल्लास में डूब जाने से पहले अपने को यह यकीन दिलाने की ज़रूरत ह
 
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क्यों, कोई कुछ भी बोल जाता है?

वरुण गाँधी इसी संसदीय व्यवस्था की उपज हैं-हम इस मुद्दे को इसी तरह देखते हैं. यहाँ पार्टियों के बीच कोई अन्तर नहीं है। सज्जन, टाइटलर, बुद्धदेव, मोदी, संजय गांधी, आडवाणी...इनमें पार्टियों का भेद कहाँ है? सब एक से हैं और उन्हें यह तंत्र स्पेस देता है। ह
 
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