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क्षणिकाए (दर्द)

वो लड़की झांकती  झरोखे से शायद कही धोखे सेउसकी झलक दिख जाए सारी तृष्णा मिट जाए वो लड़का कुछ बेखयाल साबिगड़े सुरत-ए-हाल सा रस्सी सा एठा है सबसे खफा बैठा है चार आँखे दो पथ निहारती दो सबकुछ वारती शायद एक हो जाए एक दूजे में खो जाए दो अर्थियां
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कुछ क्षणिकाएं..........मनोशी जी

दो अश्रुएक अश्रु मेराएक तुम्हाराठहर कर कोरों परकर रहे प्रतीक्षाबहने कीएक साथरातपिघलती जाती हैक़तरा क़तरासोना बन कर निखरने को,कसमसाती हैज़र्रा ज़र्राफूल बन कर खिलने को,हर रोज़रातदो बातेंदो बातें,एक चुपएक मौनकर रहे इंतज़ारएक कहानी बनने कीअजनबीचलो फिर बन जायें
 
हिन्दी साहित्य मंच
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सिर्फ़ प्यार कर

मैंने तो दिल की गहराइयों से चाहा तुमको, और तुमने मेरी चाहत को सस्ता समझा मेरी भावनाओं से खेल कर क्या मिला तुमको? प्यार को तुमने क्यों खिलवाड़ समझा? तुमने अभी तक मेरे प्यार की नम्रता देखी है, अब तुम उसकी कठोरता भी देखोगे, नारी प्यार में मिट [...]
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इश्क का रंग

इश्क का  रंग कितने आये गए इश्क करांग पक्का है !था कभी अंगूर अब मुनक्का   हैअज्ञात 
 
किशोर पारीक 'किशोर'
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प्यास इतनी बढ़ी ---- क्षणिकाएँ

प्यास इतनी बढ़ी कि वह जीवन से ऊब गया अंततोगत्वा, खबर मिली कि वह दरिया में डूब गया. ***** उसने सुना ज़मीर बेच कर लोग सुकून से रहते हैं, उसने भी ज़मीर बेचने को सोचा पर उसके ज़मीर को यह गंवारा न था.