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अंतिम क़िस्त से पहले दो तरही ग़ज़लें और

कल शाम तक अंतिम क़िस्त शाया हो जायेगी लेकिन अंतिम क़िस्त से पहले ये दो ग़ज़लें और मुलाहिज़ा कीजिए-पूर्णिमा वर्मनसब कुछ तेरे पास रे जोगीकाहे आज उदास रे जोगीमुशकिल रहना देस बेगानेअपना पर अभ्यास रे जोगीखाना, पानी, गीत बेगानेअपनी मगर मिठास रे जोगीदूर नगर में
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आठवीं क़िस्त- कौन चला बनवास रे जोगी

इस क़िस्त कि शुरूआत इस ग़ज़ल से कर रहे हैं ,जिसमें जगजीत सिंह ने जोगी शब्द को अलग-अलग अंदाज़ में पेश किया है। ठीक वैसे ही जैसे शायरों ने इस मुशायरे में जोगी को नचाया।नये-पुराने शायरों को हमने एक साथ शाया किया है ताकि प्रयास, अनुभव से सीख सके और अनुभव, नये
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सातवीं क़िस्त- कौन चला बनवास रे जोगी

विलास पंडित "मुसाफ़िर" के इस खूबसूरत शे’र के साथ -उसमें विष का वास भरा हैशब्द है जो विश्वास रे जोगीऔर माहक साहब के इस फ़लसफ़े-बीता जीवन,जी लीं साँसेंबीत गया मधुमास रे जोगी-के साथ हाज़िर हैं सातवीं क़िस्त की तीन ग़ज़लें।डा.अहमद अली बर्क़ी आज़मीप्रीत न आई रास
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पाँचवीं क़िस्त - कौन चला बनवास रे जोगी

पाँचवीं क़िस्त की ये तीन ग़ज़लें मुलाहिज़ा कीजिए-बाबा कानपुरीरहता नित उपवास रे जोगीमन में अति उल्लास रे जोगीकुछ तो है जो कसक रहा हैक्या मन में संत्रास रे जोगीझर-झर बहते नैना जैसेबारिश बारह मास रे जोगीसूनी-सूनी दसों दिशाएंकौन चला बनवास रे जोगीव्यसनों की चादर
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कौन चला बनवास रे जोगी-चौथी क़िस्त

नवनीत जी की इस अरदास-सांझ ढले सब घर को लौटेंअपनी ये अरदास रे जोगीके साथ और राजेन्द्र स्वर्णकार के इस अनूठे और सुंदर शे’र-प्रणय विनोद नहीं रे !तप हैऔर सिद्धि संत्रास रे जोगीके साथ हाज़िर है ये चौथी कि़स्त- नवनीत शर्माखुशियों को बनवास रे जोगीपीड़ा का मधुमास