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आयम स्टिल वेटिंग फॉर यू, शची (लघु उपन्यास) -- 10

(अभिषेक ,एक कस्बे में शची जैसी आवाज़ सुन पुरानी यादों में खो जाता है.शची नयी नयी कॉलेज में आई थी. शुरू में तो शची उसे अपनी विरोधी जान पड़ी थी पर धीरे धीरे वह उसकी तरफ आकर्षित हुआ. पर शची की उपेक्षा ही मिली पर फिर वे करीब आ गए. पर उनका प्यार अभी परवान चढ़ा
 
rashmi ravija
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आयम स्टिल वेटिंग फॉर यू, शची (लघु उपन्यास)-- 8

(अभिषेक, एक पत्रिका में कोई रिपोर्ट लिखने के उद्देश्य से एक कस्बे में आता है.वहाँ उसे शची जैसी ही . आवाज़ सुनायी देती है और वह पुरानी यादों में खो जाता है कि शची नयी नयी कॉलेज में आई थी. शुरू में तो शची उसे अपनी विरोधी जान पड़ी थी पर धीरे धीरे वह उसकी तरफ
 
rashmi ravija
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आयम स्टिल वेटिंग फॉर यू, शची (लघु उपन्यास) ---4

(अभिषेक, एक पत्रिका में कोई रिपोर्ट लिखने के उद्देश्य से एक कस्बे में आता है.वहाँ एक दुकान पर उसे एक नारी कंठ सुनायी देता है.वह चेहरा नहीं देख पाता.उसे शची की आवाज़ लगती है और वह परेशान हो उठता है.अपने गेस्ट हाउस में लौट वह पुरानी यादों में खो जाता है कि
 
rashmi ravija
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आयम स्टिल वेटिंग फॉर यू, शची (लघु उपन्यास) ---3

(अभिषेक, एक पत्रिका में कोई रिपोर्ट लिखने के उद्देश्य से एक कस्बे में आता है. पर वहाँ की धीमी गति से गुजरते जन जीवन से एक दिन में ही बहुत ऊब जाता है. तभी एक दुकान पर उसे एक नारी कंठ सुनायी देता है.वह चेहरा नहीं देख पाता.उसे शची की आवाज़ लगती है और वह
 
rashmi ravija
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धूप ढलने से पहले मैं बड़ा आदमी बन जाउंगा

स्कूल- कॉलेज की परीक्षायें प्रारम्भ हो चुकी हैं । हर घर में अनुशासन पर्व चल रहा है । सब कुछ नियमित समय पर हो रहा है ,बच्चों की पढ़ाई-लिखाई ,खाना-पीना ,सोना-जागना । टी.वी. देखने ,घूमने –फिरने ,गपशप और सोने का का समय घट गया है , पढ़ने का समय बढ़  गया है
 
शरद कोकास
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आयम स्टिल वेटिंग फॉर यू, शची (लघु उपन्यास) ---2

अभिषेक, एक पत्रिका में कोई रिपोर्ट लिखने के उद्देश्य से एक कस्बे में आता है. पर वहाँ की धीमी गति से गुजरते जन जीवन से एक दिन में ही बहुत ऊब जाता है. तभी एक दुकान पर उसे एक नारी कंठ सुनायी देता है.वह चेहरा नहीं देख पाता.उसे शची की आवाज़ लगती है और वह
 
rashmi ravija
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आयम स्टिल वेटिंग फॉर यू, शची (लघु उपन्यास) --1

ओफ्फ़! कल शाम ही तो वह यहाँ आया है.पर ऐसा लग रहा है मानो हफ़्तों से नज़रबंद है यहाँ.कैसे रह पाते हैं लोग,भला इन छोटे कस्बों में? ठीक है पहले यहाँ एक आदिम बस्ती थी.पर अब तो काफी विकास हो चुका है.कहने को कॉलेज हैं,अस्पताल है,बैंक हैं,सरकारी कार्यालय हैं,पर
 
rashmi ravija
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होठों से आँखों तक का सफ़र (कहानी)

मोबाइल पर एक अनजाना नंबर देख,बड़े बेमन से फोन उठाया.पर दूसरी तरफ से छोटी भाभी की आवाज़ सुनते ही ख़ुशी से चीख पड़ी. इतने सारे सवाल कर डाले कि उन्हें सांस लेने का मौका भी नहीं दिया.मेरे सौ सवालों के बीच वो सिर्फ इतना बता पायीं कि इसी शहर में हैं,अपने बेटे के
 
rashmi ravija
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आम्रपाली

उठती हुई जवानी के दिन भी बड़े अजीब होते हैं । वह जानता था कि उसके बदन के बाहर-भीतर एक अजीब-सी हलचल होती है । हर एक लम्हा अजनबी महसूस होता है । शायद कुछ होने वाला था । कुछ ऐसा जिसकी कल्पना छोटी-सी उम्र नहीं कर सकती थी । मगर आँखों की गहराई में बहुत कुछ तैर
 
त्रिपुरारि कुमार शर्मा
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जब आसमान कुछ ज्यादा करीब लगता था !!

पिछली पोस्ट में की पत्रिकाओं,आलेखों और पत्रों के जिक्र ने जैसे मुझे यादों की वादियों में धकेल दिया और अभी तक मैं उनमे ही भटक रही हूँ.कई लोगों ने मेरे छपे आलेखों के बारे में भी पूछा,सोचा आपलोगों को भी उन वादियों की थोड़ी सैर करा दूँ. दसवीं उत्तीर्ण कर
 
rashmi ravija
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परिचय

सबसे पहले अंतरजाल पर सभी चिठाकारों को मेरा प्रणाम । ये ब्लॉग कैसे उपजा, शायद ये बताना बेकार है । बाकियों के मन में जो कीड़ा अक्सर कुलबुलाता रहता है वही आज मेरे मन में भी कुलबुला उठा । वो भी इतने जोर से की ऑफिस के काम से थक जाने के बावजूद इस ब्लॉग का श
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साँझ

कोलकाता आए अभी कुछ ही दिन हुए हैं। २४ जुलाई को यहाँ आया और उसी दिन से नौकरी बजाने में लगा हूँ। कॉलेज छोड़े अभी जियादा दिन नहीं बीते सो वहां की आदतें भी नहीं बदली। कॉलेज में शाम होते ही हम अपने दोस्तों के साथ निकल पड़ते थे। अविनाश, अभिषेक, अजय, अब्दुर,
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