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फ़त्हे-बर्लिन

9 मई 2010 को नाज़ीवाद-फासीवाद की पराजय की 65 वी बरसी बनायी जा रही है। जर्मनी साम्राज्य के शक्ति कैद्र रैहास्टाग के गुंबद पर लाल झंडा फहराते लाल सैनिक की तस्वीर आज भी फ़त्हे-बर्लिन की गौरवगाथा सुनाती है। फासीवाद-नाजीवाद के खिलाफ लड़ाई में 17 लाख से अधिक
 
परेश टोकेकर 'कबीरा'
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कैफ़ी आज़मी

"आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है... आज की रात न फ़ुटपाथ पर नींद आएगी...सब उठो..मैं भी उठूँ.... तुम भी उठो ...तुम भी उठो ...कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जाएगी..."(कैफ़ी आज़मी)कैफ़ी आज़मी की कुछ खास नज़मों में से एक ...
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दो-पहर

ये जीत-हार तो इस दौर का मुक्द्दर है ये दौर जो के पुराना नही नया भी नहीं ये दौर जो सज़ा भी नही जज़ा भी नहीं ये दौर जिसका बा-जहिर कोइ खुदा भी नहीं [जज़ा = rewards ],[बा-जहिर = evidently ] तुम्हारी जीत अहम है ना मेरी हार अहम के इब्तिदा भी नहीं है ये इन्तेह
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Frantic Words - Emotionally out of control Words

सुना करो मेरी जान इन से उन से अफ़साने [अफ़साने(fiction) = कल्पित कथा] सब अजनबी है यहाँ कौन किसको पहचाने यहाँ से जल्दी गुज़र जाओ काफिले वालों [क़ाफ़िले (caravan )] है मेरी प्यास के फूके हुये ये वीराने मेरी जूनून-ए-परस्तिश से तंग आ गए लोग [जूनून( frenz
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हाँ मगर एक दिया, नाम है जिसका उम्मीद : क़ैफ़ी [कैफ़ी पर आलेख श्रंखला] - अजय यादव

क़ैफ़ी साहब की ज़िंदगी और शायरी को जानने की इस कोशिश के पिछले मुकाम पर हमने उनकी शायरी और संवादों से सजी कुछ चुनिंदा फिल्मों का ज़िक्र किया. आज इस सिलसिले में बात करते हैं, उन्हें मिले विभिन्न पुरस्कारों व सम्मानों की.'पद्म श्री' से अलंकृत कैफ़ी आज़म
 
साहित्य-शिल्पी