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यक़ीं कीजे, ये मैं ही हूँ, जरा फोटो पुरानी है

छुट्टियाँ कब बीत जाती हैं, पता भी नहीं चलता। ड्युटी पर आये हुये ये चौथा दिन और फिर से वही अहसास कि जैसे यहीं हूँ सदियों से। सतरह सालों बाद इस बार उपस्थित हो पाया था होली पर अपने गाँव में और क्या खूब होली जमी। अबके इधर कश्मीर में खूब-खूब बर्फ गिरी
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देवता बीमार है: कुमार विनोद की मशहूर गज़ल

आस्था का जिस्म घायल रूह तक बेजार हैक्या करे कोई दुआ जब देवता बीमार हैतीरगी अब भी मजे में है यहाँ पर दोस्तोंइस शहर में जुगनुओं की रौशनी दरकार हैभूख से बेहाल बच्चों को सुनाकर चुटकुलेंजो हँसा दे, आज का सबसे बड़ा फनकार हैमैं मिटा के ही रहूँगा मुफ़लिसी के दौर
 
चन्दन
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ख़्वाहिशों को सर उठाना आ गया

आधार प्रकाशन से मंगाने के लिए पर 09417267004 फोन कर सकते हैं और किताब की कीमत है १०० रुपये.(डा कुमार विनोद को अरसे से देश की महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ता रहा। अरसा पहले उन्होंने कथन में छपी मेरी एक कविता पढ़ने के बाद जैसे-तैसे जुगाड़ करके उन्होंने
 
अशोक कुमार पाण्डेय