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उस मोड़ से शुरु करें ये ज़िंदगी- जगजीत सिंह

तुम्हें भूल जाऊँ? तुमसे इजाज़त लेकर भूलने की कोशिश करती हूँ, रोज़ और फिर सच भूल जाती हूँ, यह सोच कर कि तुम्हें भूल गई। देखो! भूल ही तो गई हूँ तुम्हें। बस मेरे साथ आना छोड़ दो, जहाँ कहीं भी जाती हूँ।  ये मेरी उँगली पकड़े कहाँ-कहाँ घूमते हो तुम? फिर एक
 
मानसी
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एहसास (कुछ यूँ ही )

सर्दी का ...घना कोहरा..उसमें..डूबा हुआ मन..एक अनदेखी सीचादर में लिपटा हुआऔर तेरी याद उस मेंआहिस्ता से ,धीरे सेउस कोहरे को चीरतीयूँ मन पर छा रही हैजैसे कोई कंवलखिलने लगा है धीरे धीरेऔर आँखों में एक चाँद...मुस्कराने लगा है ...रंजना (रंजू )भाटिया"सन्डे
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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मैं छोटे, बड़े सभी को सही सम्मान दूँगा

वो स्कूल के आफ़िस के सामने, अन्य बच्चों के साथ, फ़र्श पर बैठा अपनी मां के आ कर उसे ले जाने का इंतज़ार कर रहा था। मुझे उसकी आँखों से दो बूँद आँसू ढुलकते दिखाई दिये। मैं उसे उसकी कक्षा में नहीं पढ़ाती पर, उसे स्कूल में देखती हूँ। सो , मैं उसके पास जाती हूँ
 
मानसी
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यादें- क्या बात थी कि जो भी सुना अनसुना हुआ

पुरानी कई यादों को संजो कर ले आई हूँ इस बार भारत से। १८-१९ साल की उम्र में आकाशवाणी रायपुर से प्रसारित मेरी गाई ग़ज़लें पापा के पुराने टेप-रिकार्डर में मिली। साथ ही मिला एक पुराना पीला अख़बार। पापा ने कितने जतन से ये सब संभाल के रखा है।उन ग़ज़लों में से एक
 
मानसी
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कुछ यूँ ही

पूरी छाँव किसे मिलती थी। आधी-आधी बाँट कर, कभी उँगली के सिरे से बाँध कर, कभी उछाल कर, लपक कर, खेलते थे उस छाँव से हम तीनों। कभी तो किसी के हिस्से आती ही थी धूप और कभी जो भूले से भी मुझे मिल जाती धूप, तो बढ़ आते थे उनके हिस्से के टुकड़े-टुकड़े छाँव, मेरे
 
मानसी
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बदलाव -बस यूँ ही

बदलाव ज़िंदगी का एक तरीका है। तरीका खुद ब खुद उलझ जाने का और उलझ कर फिर खूबसूरती से सुलझ जाने का। हर उलझाव के साथ खुलते हैं कुछ गिरह और हर सुलझाव ले आता है एक सवाल। जवाब के इंतज़ार में एक लंब खामोश पल के बाद पीछे दरवाज़ा बंद होता है। और फिर खुलता है एक
 
मानसी
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ठंड की एक सुबह

धुँआ-धुँआ सी सुबह... ठिठुरता आसमां... बर्फ़ की शाल ओढ़ कर इधर से उधर भाग रही थी हवा। उस शाल का एक कोना किसी सांस को छू कर निकल जाता और एक लड़ाई छिड़ जाती। गीली धूप को अपनी पीठ पर लादे हुए, उसे सुखाने की कोशिश करता बड़ा सा दिन। मगर सिहर उठता बदन उसका हर सा
 
Manoshi