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दौड़ में जीना है और पछताते हुए मरना है

मेरे पास गाडी है, बंगला है, बैंक बैलेंस है... तुम्हारे पास क्या है?बहुत ही मशहूर फिल्मी डायलोग है ये, पर आज के युवाओं का बहुत बड़ा सत्य भी है. आज के युवाओं के पास ये सब कुछ है, गाडी भी है... बंगला भी और बैंक बैलेंस भी... पर अगर नहीं है तो आत्म-संतुष्टि.
 
अभिषेक प्रसाद 'अवि'
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पर फैसला तो लेना है...

एक बार फिर आज खुद को बहुत परेशान महसूस कर रहा हूँ. फिर से सामने दो रास्ते दिखाई देने लगे है. फैसला नहीं कर पा रहा हूँ कि किस राह पर चलूँ... आखिर ऐसा क्यों होता है? हर बार जब जिंदगी आस्सान लगने लगती है, दोराहे सामने क्यों आ जाते है. क्यों मैं हर बार उलझन
 
अभिषेक प्रसाद 'अवि'
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Happy Republic Day....

सबसे पहले तो मेरी तरफ से आप सबों को गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाई.... आज सुबह आँख खुलते ही सबसे पहले मन में कुछ पंक्तियों ने जन्म लिया..."हँसना, मुकुराना, हर बात पर मजाक बनानाये मेरी फितरत नहीं यारों, जीने का अंदाज हैहंस कर ग़मों को गले लगा लेता
 
अभिषेक प्रसाद 'अवि'
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वहम, संयोग या सत्य...

इस वाकये को बताने से पहले मैं ये बता दूँ कि मुझे भगवान, परमात्मा, आत्मा, भुत आदि बातों पर बिलकुल विश्वास नहीं है. दिल्ली में जहाँ मैं रहता हूँ मेरे फ्लैट में एक तस्वीर भी नहीं मिलेगी भगवान (जिसे लोग मानते है) की.रात के लगभग १२ बज रहे थे. जनवरी का महिना,
 
अभिषेक प्रसाद 'अवि'
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मेरी जिंदगी का चौराहा... जहाँ मैं ठहर सा गया हूँ...

कभी कभी जिंदगी में ऐसे चौराहे आते है जहाँ से आगे जाने के रास्ते के चुनाव में हम असफल महसूस करने लगते है. कुछ ऐसा ही मेरे साथ हो रहा है आज कल... जिंदगी के ऐसे चौराहे पर आ कर खड़ा हो गया हूँ जहाँ से आगे का रास्ता नजर नहीं आ रहा. चारों ओर देखकर सिर्फ डर लग
 
अभिषेक प्रसाद 'अवि'
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हाँ मैंने झूठ बोला है...

कभी झूठ बोला है आपने? जरूर बोला होगा... अब इस दुनिया में राजा हरिश्चंद्र तो कोई होता नहीं (अगर है तो ये मेरा कसूर नहीं है). मैंने भी बोला है झूठ.... सबसे... अपने माँ पापा से, अपने भाई-बहनों से, अपने दोस्तों से, अपने रिश्तेदारों से, हर उन लोगों से जो मुझे
 
अभिषेक प्रसाद 'अवि'
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अगर हाँ तो कब?

कभी अकेलेपन को महसूस किया है? जरूर किया होगा... कब कब महसूस होता है अकेलापन... जब कोई आपको छोड़ कर जाता है? या जब आप बहुत परेशान होते है? या जब आप बीमार होते है? नौकरी चली गयी, प्यार छुट गया, कोई दोस्त नहीं रहा, या जब किसी अजीज कि मृत्यु हो गयी? आखिर कब
 
अभिषेक प्रसाद 'अवि'
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जिंदगी की सार्थकता

समय गुजर रहा है. दिन बीत रहे है. मैं बस चला जा रहा हूँ. पर कहाँ? किस रास्ते पर? क्यों चला जा रहा हूँ? कब तक चलूँगा? कोई तो मंजिल होगी, होगी तो लक्ष्य होगा... या बस यूँ ही चलता ही जाऊंगा? न कोई कारण, न कोई वजह, न कुछ सोंचा, न कुछ देखा बस चलता ही जा रहा
 
अभिषेक प्रसाद 'अवि'
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बस आज के लिए इतना ही....

जब से मेरा जूनून ख़तम हुआ है , तब से लोग कुछ ज्यादा ही अपेक्षाएं करने लग गए है. रोज दोस्तों के मेल आते है कि अपनी कोई नयी कविता भेजो. तरह तरह के Request आते है. कोई कहता है इस विषय पर लिखो तो कोई किसी और विषय पर लिखवाना चाहता है. किसी को प्रेम
 
अभिषेक प्रसाद 'अवि'
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जिंदगी का सबसे बड़ा सत्य... दूसरी मुलाकात

२ जून २००८: रात के लगभग दो बज रहे है (मतलब तारीख बदल चूका है... आज ३ जून है). आँखों में नींद का एक कतरा भी नहीं है. पिछले ४ दिनों से कंचन हॉस्पिटल में है. बचपन से उसके दिल में एक छेद था. पर समय पर कभी इलाज नहीं हुआ उसका. माँ-बाप के लिए तो एक बोझ ही
 
अभिषेक प्रसाद 'अवि'
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जिंदगी का सबसे बड़ा सत्य... पहली मुलाकात

30 December 2007: आज रश्मि हॉस्पिटल गयी थी. अपने हाथ का प्लास्टर कटवाने, कुछ दिनों पहले एक छोटे से एक्सीडेंट में उसका हाथ fracture हो गया था. लगभग ११ बज रहे है सुबह के. उसने मुझे फ़ोन किया..."हेल्लो अवि... मैं हॉस्पिटल पहुँच चुकी हूँ. इन्तेजार में
 
अभिषेक प्रसाद 'अवि'
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कल... २२ किलोमीटर

कल बत्रा हॉस्पिटल से अपने घर के लिए जा रहा था। अचानक खानपुर चौराहे के पास मैंने एक लड़की को देखा। चेहरा साफ़-साफ़ नही देखा पर पीछे से वो बिल्कुल मेरी एक मित्र की तरह लग रही थी। बहुत दिनों के बाद उसे देख रहा था, लगभग ३ सालों बाद। जाहिर था उससे मिलने की
 
अभिषेक प्रसाद 'अवि'