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अधूरी बातें…

- पता है, छोले बना रही हूँ! - हम्म....एक दिन वो तुम्हे बनायेंगे - तुम पागल हो चुके हो... - दुनिया भी यही समझती है - तो क्या मुझे इस दुनिया से परे मानते हो? - कुछ मान ही तो नहीं पाता - तुम्हारी आँखें कुछ ढूंढ रही है...? - हडप्पा… मोहनजोदडो… - वो क्या हैं?
 
Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय)
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क्या लिख दूँ कि तुम लौट आओ

किताबें ही किताबें हैं.. टेबल पर उनका एक ढेर बनता जा रहा है… एक मीनार सी बन गयी है… झुकी हुई… कुछ कुछ पीसा की मीनार के जैसी… बस एक दिन गिरेगी धड़धडाकर और उसमे दबे दबे मैं भी किताबों के कीड़ो की मौत मर जाऊँगा… ये सोंचते हुए घंटो उन किताबो को देखता रहता
 
Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय)
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भर्त्सना हो या जय जयकार, कोई मुझतक नहीं पहुचेगी…

छोड़ जाऊँगा कुछ कविता, कुछ कहानियाँ, कुछ विचार जिनमें होंगे कुछ प्यार के फूल कुछ तुम्हारे उसके दर्द की कथाएं कुछ समय – चिंताएं मेरे जाने के बाद ये मेरे नहीं होंगे मै कहाँ जाऊँगा, किधर जाऊँगा लौटकर आऊँगा कि नहीं कुछ पता नहीं लौटकर आया भी तो न मै इन्हे
 
Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय)
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तुरई पुराण…

४ दिन पहले तुरई/तरोई खाने का बहुत मन कर रहा था… बनाये भी, खाये भी और साथ मे बज़ पर बजबजाये भी… ससुर (अजदक बाबा का फ़ेव शब्द) अब तक कोई न कोई उसपर टुनटुनाये जा रहा है…   आप भी इस तुरई पुराण का लुत्फ़ उठाईये, टुनटुनाईये/बज़बज़ाईये और देखिये की छोटी छोटी
 
Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय)