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कुछ साँझा करना चाहती हूँ

मित्रो, कुछ साँझा करना चाहती हूँ.. आप से..  ''धूप से रूठी चाँदनी'' मेरे काव्य- संग्रह पर रवि कान्त पांडये की समीक्षा सृजन गाथा में पढ़ें.  लिंक है --http://www.srijangatha.com/pustkayn_30May2k10और 'गर्भनाल' में डॉ. आज़म द्वारा लिखित
 
Shabdsudha
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सोच और उसके होने के बीच के लोचे

पता नईं क्यों अक्सर ऐसा होता है कि हम जो पहले से तय करते हैं, उसमें लोचे आ ही जाते हैं। दरअसल सोमवार से यह तय कर के बैठा था कि इस शुक्रवार यानी कि आज अपन अपना साप्ताहिक अवकाश होने की वजह से आराम से बैठेंगे और शब्दों का सफर में चंदू भाई के आत्मकथ्य को
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कहीं न जाने के बाद भी लौटना

कहीं न जाने के बाद भी लौटनाएक लंबे अरसे के बाद ब्लॉग पर लिखना, पता नहीं इसे लंबा अरसा कहना चाहिए या नहीं क्योंकि मेरे ब्लॉग पर पिछली पोस्ट 2009 के अगस्त माह की 27वीं तारीख की है लेकिन वह भी मेरी लिखी हुई नहीं। इसी तरह 26 अगस्त की भी पोस्ट मेरी नहीं। मैने
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खदबदाहट के बीच जैसे पकना

भीतर की खदबदाहट जैसे उकसाती है………वही खदबदाहट जो चूल्हे पर चढ़े भात के बर्तन में होती है………………पर जब इसमें उफान आता है तो फिर क्या होता है………कारण मालूम नहीं इस खदबदाहट का……लेकिन इक बेचैनी सी तारी रहती है……… हावी नहीं होता खुमार किसी चीज का……………लेकिन भरी