किस्सा उस कम्बख्त औरत का
सिलसिला शुरू तो खैर दया से ही हुआ थाउस उदास सी सुबह जब पहली बार झिझकते कदमो से आयी वह नम आंखे गड़ाये जमीन पर और सूनी उंगलियों में फंसी दुख सी नीली कलम खोलते-खोलते फूट ही पडी आखिरकार तो जैसे उसका दुख कोलतार सा पसर गया सबके भीतर कुछ पल के लिए ढीले हो गये
Jan 13 2010 09:42 AM



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