८ मई, २०१० को सीहोर, मध्य प्रदेश में जनाब डा. बशीर बद्र , जनाब बेकल उत्साही, हर दिल अज़ीज़ राहत इन्दौरी और नुसरत मेहंदी साहिबा के कर कमलों द्वारा मोनिका हठीला (भोजक) दीदी के काव्य संग्रह "एक खुशबू टहलती रही" का विमोचन हुआ.माँ सरस्वती की वीणा से निकले शब्द
११ मार्च को आखिरी दफ़े कुछ लिखा था यहाँ.. १५ दिन से ऊपर गुजर गए हैं यहाँ कुछ भी लिखे हुए.. मैं कभी भी इस मुगालते में नहीं रहा कि लोग मुझे पढ़ने को बेचैन हैं और मुझे अपने पाठकों के लिए कुछ लिखना चाहिए.. मुझे पता है कि लोगों कि यादाश्त बहुत कमजोर होती है
कला और समाजिक जीवन के बीच की बुनियादी बहस से और भिड़ंत से बनता है बोद्धिक जीवन। एक ऐसा जीवन जो "जीवन" को महज़ अनुभव और कहानियों से नहीं बयाँ करता बल्कि उन तरल और ठोस सवालों की उपज़ से फैलता है जिनको जीवन के हर मोड़ का स्वाद नसीब होता है। जिससे रची है -
किताब को जीवन के सत्य के आधार पर परखा गया। लेखकों,बुध्दिजीवियों और दार्शनिकों में सत्य को जानने की प्रवृत्ति का तेजी से विकास हुआ। सत्य क्या है ? सत्य वह है जिसे नहीं जानते। किताब का यही मूल काम था,किताब हमें वह चीज बताती है जिसे हम नहीं जानते। इसके बाद
पंकज बिष्ट, महेश कटारे, शिल्पायन वाले ललित जी और अपन शिल्पायन के स्टाल पर चार दिन ऐसे बीते कि जैसे चार घण्टे रहे हों।चारों तरफ़ किताबें, किताबों के शौक़ीन, किताबों की ही बातें…प्रोफ़ेसर शमसुल इस्लाम, नीलिमा जी,सत्येन्द्र, शिल्पी, पवन मेराज, लाल बहादुर वर्मा
चिट्ठाकारी की सबसे बड़ी आवश्यकता निरंतरता है ….जो हम जैसे नौसिखियों के लिए बड़ी भारी पडती है सो कुछ ना कुछ छापने की अपनी इन्स्टैंट छपास के क्रम में आज पेश है ….अपने कलाम साहब की पुस्तकों के बारे में चंद लाइने ! आधी सदी से अधिक का वक्त मैंने
पिछले दिनों परिकल्पना प्रकाशन लखनऊ से प्रकाशित बेर्टोल्ट बे्रष्ट की कृति तीन टके का उपन्यास पढ़ रहा था। इस रचना में लेखक ने व्यापारिक पंूजीपति वर्ग की अनैतिकता, लालच और उसके कथित राष्ट ्रवाद की असलियत को नंगा कर दिया है। पंूजीपति वर्ग की जिस तरह से ल
कल एक पुराने दोस्त ने यह किताब पढ़ने को दी. पढ़ने बैठा, अंत तक इस किताब से बंधा रहा. एक मानसिक रोगी की व्यथा को लेखक ने कागज पर उतार दिया है. कथा में एक मानसिक रोगी है जो स्किजोफ्रेनिया से ग्रसित है. एक ऐसी मानसिक बीमारी जिसमे इंसान विखंडित व्यक्तित्व का
पिछले दिनों यूं ही एक और काम कर डाला --- प्रेम पर कोई ढाई-तीन सौ कोटेशन्स का अनुवाद। और अब ये एक साथ किताब के रूप में आ रहे हैं। कवर पेज़ यहां लगा रहा हूं और कुछ मज़ेदार कोटेशन भी । ऊपर शीर्षक के रूप में दिया गया कोट प्लेटो का है ) प्रेम दीवानावार चाहे
ऑरहे लुइस बोर्ग़्हेस * का रचना संसार एक ऐसा विद्वतापूर्ण जटिल और सघन दलदल जिसमें आप उतरने से क़तरा सकते हैं। पहले वाक्य से ही वो आप को डरा सकता हैं आतंकित कर सकता है अनजाने नामों, सन्दर्भों और लोकों से। लेकिन उस साहसी पाठक के लिए जो न घबराया- न डरा, ये
जसवंत सिंह किताब से गुजरात में पाबंदी हटा दी गई है। कोर्ट की दखलअंदाजी से ही यह संभव हुआ। नहीं तो फासीवादियों से तो यह उम्मीद नहीं की जा सकती थी। फिर भी, बधाई। उन सभी को, जो लोकशाही में भरोसा रखते हैं। आजादी में भरोसा रखते हैं। लेकिन फासीवाद का विरोध
एक दिन एक पत्रकारिता के विद्यार्थी ने सवाल किया था किताबों को पढऩे के सलीके को लेकर. उसे जवाब देने के बाद कुछ लिखा भी था. इन दिनों रवीन्द्र व्यास जी के ब्लॉग पर किताबों पर सीरीज चल रही है। किताबों के बारे में एक छोटा सा नोट मेरा भी बिना किसी लाक्षणिक