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नदिया डूबी जाए

नदिया डूबी जाए -आचार्य परशुराम राय   किस अचेतन की तली से चेतना ने बाँग दी कि काल का घेरा कहीं से टूटने को आ गया है। नियति को देती चुनौती विद्रोह करती वेदना, आदिम इच्छा के मात्र एक फल चख लेने की काट रही सजा, सृजन के कारागार से अब बाहर निकल कर आ गई
 
मनोज कुमार
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मनोज

हे देश, तुम्हारे तर्पण में-आचार्य परशुराम राय हे देश, तुम्हारे तर्पण मेंसूख गयीं सारी नदियाँसंविधान के काम वृक्ष कीकाट-काट कर सारी डालेंमैं तो समिधा बना दिया।हे देश तुम्हारे तर्पण मेंकितनी भर दी इनमें प्यासकि सारे सागर भी खाली हो गएउनकी सबकी प्यास बुझाने
 
करण समस्तीपुरी
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मनोज

ब्लोगर बन्धु गण,नमस्कार,आपके सस्नेह आग्रह पर आज हम एक बार फिर प्रस्तुत कर रहे हैं बेंगलूर के प्रसिद्द कवि एवं गीतकार ज्ञानचंद मर्मज्ञ की देशभक्ति पूर्ण एक अद्वितीय रचना ! वन्दे मातरम् , वन्दे मातरम्। वन्दे मातरम् , वन्दे मातरम्। सत्य-सुधा बरसाने वाली,
 
करण समस्तीपुरी
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हरीश प्रकाश गुप्त के हाइकू

हाइकू-- हरीश प्रकाश गुप्तभरा उदधिहुआ मधु विस्‍फोटफूटी कविता । उतर गईअन्‍तस में, नैननपढ़ कविता । मेरी कवितामेरे मन का गीतसुर संगीत रात निठल्‍लीसोई, दिन ने थकबेबस ढोई । अचल बिंदुके इर्द-गिर्द घूमरहा बेसूध । गली-गली मेंघूमा, ठहरा, सोचालेकिन कहॉं? कुत्ता ले
 
करण समस्तीपुरी
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खाना हो आम तो बोएं बबूल

खाना हो आम तो बोएं बबूल -- परशुराम राय आम के फलों सेये लद गए बबूल अबभ्रम में पड़ी कोयलेंनिहारती आवास निजकंटीले आम्रकुंज ।सोचती-“आम में ये काँटे बबूल के ?या ईमान ही बदला धरा काया बदला है स्‍वादजल का ही जलद से कुछ?या बदला है तेवर हीसूरज की दृष्टि का?या
 
करण समस्तीपुरी