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शैलबाला शतक - २

माँ के काली स्वरूप की अभ्यर्थना के चार कवित्त पुनः प्रस्तुत हैं । इस शतक में शुरुआत के आठ कवित्त काली के रौद्र रूप का साक्षात दृश्य उपस्थित करते हैं ।  रौद्र-रूपा काली के सम्मुख दीन-असहाय बालक पुकार रहा है । माँ इस रूप में भी ममतामयी है..किसी भी
 
हिमांशु । Himanshu
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शैलबाला शतक

जीवन में ऐसे क्षण अपनी आवृत्ति करने में नहीं चूकते जब जीवन का केन्द्रापसारी बल केन्द्राभिगामी होने लगता है । मेरे बाबूजी की ज़िन्दगी की उसी बेला की उपज है ’शैलबाला शतक’! अनेकों झंझावातों में उलझी हुई जीवन की गति को जगदम्बा की ही शरण सूझी ।
 
हिमांशु । Himanshu
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