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काल रात्रि

कब हटेगी कालिमा इस रात की । कब दिखेगी लालिमा अब प्रात की ॥ आज सूरज क्यों उदित होता नही । अरुण प्राची आज मुसकाता नही ॥ रात्रि से भयभीत है मानव धरा । काल के आगोश से कितना डरा ॥ इस निशा का अंत कब होगा भला । क्रूर निशि ने यूँ लगे पकड़ा गला ॥ बन भुजंग है ड