प्रीत की लगन या मुक्ति मार्ग
आगोश में निशा के करवटें बदलता रहता है सवेरा लिपटकर उसकी संचेतना में बिखेरता है वह प्रांजल प्रभा… संभोग समाधि का है यह या अवसर गहण घृणा का फिर-भी तरल रुप व्यक्त श्रृंगार, उद्भव है यह अमृत का… उत्साह मदिले प्रेम का… जागते सवेरे में समाधि… अवशेष मुखरित
Dec 29 2009 11:46 AM



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