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अपने ही गर्भ में छिपा लो…सिखा दो…अभेद्य मंत्र

अनजाने चेहरों वाली / सीमाओं से पार / भाषाओं से इतर / कई तस्वीरें / देखीं / सुनीं / पहली-पहली बार / तुम्हारे ही संग / उनमें बसा प्रेम / उभरा तब तुम्हारी आंख से / छलका हमारे होंठों तक / आज फिर / गया उसी दौर में / पर अबूझ रह गए / वो चित्र / जड़ हैं नायक /
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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हमारे प्रेम के विरुद्ध…हम…फिर भी ज़िंदा चाहत-संगीत

हर बार उभर आते हैंमेरे चेहरे परतुम्हारे प्रेम के निशानतबजब हम मिलते हैंसूरज मुस्कराता हैऔर, और तेज़ बहने लगती है नदीफर्राटा भर-भर हांफ उठती हैधरतीपर ये उन्माद नहीये सब करते हैंव्यंग्यहम परहम भी लगातार निचोड़ते रहेअपने-अपने हिस्से का
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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सूख गया गुलाब…अब और भी महकता है

तमाम गीत चुनकर मैंने रख लिए हैं/ उस गुलदस्ते में / जिसमें पहली-पहली बार / तुम्हारे जूड़े से निकालकर / लगा लिया था / लाल गुलाब / अब वो सूख गया है / पर महक़ अब तक है / वैसी की वैसी / जैसी थी नए-नकोर फूल में / और देखो / महकता ही जा रहा है / बिना मिलन के
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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पथभ्रष्ट कबूतरों की चोंच में दबे रह गए खत

जीन-बुशर्ट पहने लड़के-लड़कियां / जब-जब खटखटाते की-पैड / स्क्रीन पर उभरते कुछ हर्फ / 160 कैरेक्टर्स से / क्या बुनते थे वो / नहीं समझ पाया / मैं / जब तक नहीं आया था / तुम्हारा / एक औपचारिक लघु-संदेश / सुबह का सलाम पल्लू में बांधकर / अब जानता हूं / तकनीक के
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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ठंडी हथेली में मुस्कान की गुनगुनाहट

कलबहुत अरसे बादजब राह में धुंध गहरी हो रही थीऔर-और ज़्यादातब यकायकगाढ़ी राततब्दील हो गई ताज़ा सुबह में तुम फुसफुसाईंपागल हो?समझते ही नहींमैं तुमसे प्यार करती हूंठहर गई सांसथर्रा गया मैंपूरा का पूराअपने वज़ूद के साथ...तुम्हारी घृणातेज़ाब
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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क्लचर की जगह बांध लो...

पलकें खुलते ही / और सुर्ख हो जाते हैं / आंखों के डोरे / याद आती हैं सुबहें / तुम्हारी चाहतों के लाल रंग में रंगी हुई / पता नहीं, कहां से आती है / तुम्हारे हाथ की पकी रोटियों की सोंधी महक/ हर तरफ गूंजती है तुम्हारी हंसी की खनक / बार-बार / तुमने ही क्यों
 
चण्डीदत्त शुक्ल