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बेटी का जन्म

क्या कहूँ की जो शुरुआत हुई जैसे तपते दिन में रात हुईसूरज ने ली सब किरणें समेट मातम ने घर को लिया चपेट सबकी शक्लें मुरझाई हैं हाय ! लड़की घर में आई है न थाली बजी, न पेड़े बटें न मिली दुआ , न उतरी बलाछाई आफत की परछाई हैं पर माँ तो "माँ "है क्या करती कैसे देख