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आज की कविता

आज की कविताकोई रेड, कोई मेड, कविता से करे छेड़कोई भोंपू, कोई सेड नाम धर आये है,कविता के राष्ट्रीय मंच,छाडे दोड़ दोड़जोड़ जोड़ चुटीले से, चुटकुले सुनाये हैथाल अश्लीलता का, मॉल ड़ाल फुड़ता कास्वाद भरे शब्दों के, भूरते बनाये हैजोकर बने है पर, जोक में भी दम
 
किशोर पारीक 'किशोर'
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स्वाभिमान सो गया है, तेज कहीं खो गया है

स्वाभिमान  सो  गया है, तेज कहीं खो गया है सिंह को सियार अब रोज धमकाएंगे  आँख मूँद भीष्म बने, देश को चलने वाले माँ भारती की लाज को, ये कैसे बचा पाएंगे दुश्मनों   की आँख रही, देश के ललाट पर प्रेम के तराने फिर भी गाते चले
 
किशोर पारीक 'किशोर'
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पोथियाँ

जीवित किताबों में है, विद्यापति जयदेव पुस्तकों में अमर, रहीम रसखान है देह निज धर्म से, ही शेष होती एक दिन स्मृति अशेष कृति, लेख पहिचान केकवि कालीदास, व्यास, सूरदास, नाभादासअष्टछाप कवियों  का, पोथियों में गान हैपुस्कें ही असल
 
किशोर पारीक 'किशोर'
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आरक्षण के कवित्त

सदियों  से जातियों में, छोटी थी दरार थी जो वही अब फैल गयी, खाई जैसी हो गयी पिछड़ों में अगड़ों में, तगडों के झगड़ों में देश की छबीली छवि, भाई कैसी हो गयी मंडल कमंडल में,  वोट बैंक बन
 
किशोर पारीक 'किशोर'
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साजन शराबी हो तो बोतल के बदले में ....

भाई जो शराबी हो तोबोतल के बदले मेंगैरों बीच घर की कहानी बिक जाती हैसाजन शराबी हो तोबोतल के बदले मेंसजनी के गले की निशानी बिक जाती हैबाप जो पीया करे है मदिरा तो उस घरफूल जैसी बेटी की जवानी बिक जाती हैमदिरा के नशे मेंईमान बिके देखे बन्धुबिना किसी दाम
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देश किसी कोठे पे बदन हुआ जाता है

देखना तो एक ओरसोचता भी कौन है किदेश के जवानों का पतन हुआ जाता हैऐसे बिकता है इननेताओं के राज में किदेश किसी कोठे पे बदन हुआ जाता हैगिद्धों और चीलों कोमिलते हैं सिंहासनआदमी ज़मीन में दफ़न हुआ जाता हैआदमी की लाश है तोनंगी ही जलादो क्योंकिआदमी से महंगा कफ़न
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कभी न कलम मिटे देवी माता शारदे !

सुरों की सरिता आप,शब्दों की संहिता आपकवि की कविता आप देवी माता शारदे !हंस पे सवार नित,वीणा की झंकार नितसुनती पुकार नित देवी माता शारदे !थोड़ा सा मैं ज्ञान माँगूं,विद्याधन दान माँगूंइक वरदान माँगूं देवी माता शारदे !जन पे ज़ुलम मिटे,भारत से तम मिटे,कभी न कलम
 
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माता शारदा बजायेगी सितार मेरे मेरे देश में.......

कुछ ही दिनों कामेहमान है ये पतझड़,देखो आने वाली है बहार मेरे देश मेंशीतल हवायें औरमादक फिजायें बन्धुझूम-झूम गायेंगी मल्हार मेरे देश मेंकितना सुकून, कितनाआनन्द होगा जबखुशियों के फूटेंगे अनार मेरे देश मेंसुख की सरिता मेंकमल पे सवार माताशारदा बजायेगी सितार
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जीने की जो चाह है तो मौत से भी नेह कर

रात न ढले तो कभी भोर नहीं होती बन्धुसांझ न ढले तो कभी तम नहीं होता है लोहू तो निकाल सकता तेरे पाँव में से कांच से मगर घाव कम नहीं होता है जीने की जो चाह है तो मौत से भी नेह कर डरते हैं वो ही जिनमें दम नहीं होता है सच मानो जब तक पीर का काग़ज़ न हो कवि की
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अमृत पी ज़हर उगलता है आदमी

शूलों से जो डर-डर चलता है आदमी तो पांव नीचे फूलों को मसलता है आदमी अन्न जैसे कंचन को कूड़ा कर फैंकता है अमृत पी ज़हर उगलता है आदमी जाने किस बात की अकड़ है जो ऐंठ -ऐंठ दो-दो फीट ज़मीं से उछलता है आदमी गौर से जो देखा बन्धु मुझे ऐसा लगा जैसे अपनी ही आग में