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एक चिड़िया मरी पड़ी थी ~~

हिन्दयुग्म पर मेरी रचना एक चिड़िया मरी पड़ी थी  
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सीमा गुप्ता के काव्य संग्रह – विरह के रंग से कुछ चुनिंदा कविताएँ

सीमा गुप्ता की कविताएँ भले ही विरह की कविताएँ हैं, लेकिन इन कविताओं में पराजय का बोध कहीं नहीं है. इन कविताओं में विरह तो है, लेकिन वो विरह पलायन का रास्ता नहीं पकड़ रहा है. और न दीनता की ओर अग्रसर होता दिख रहा है, यही तो कृष्ण ने कहा था अर्जुन से – न
 
Raviratlami
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कायरों की भीङ में हम सर कटाने आये थे.

जिसने न पायी मोहब्बत उनको पटाने आये थे.कायरों की भीङ में हम सर कटाने आये थे.जानता था जालिमों का जुल्म चलता ही रहेगा.हम शहादत का तमाशा उनको दिखाने आये थे.सोती रही है जिंदगी , ठंढी मिट्टी के कब्र में,हम मुसाफ़िर क्रांति की चंगारी जलाने आये थे.नफ़रतों की
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Iravati अरुंधती

वारिस शाह नूं -- अमृता प्रीतमच्या काव्याचा अनुवाद (पिंजर चित्रपटात ह्या काव्याचा समर्पक उपयोग)(छायाचित्र स्रोत : विकीपीडिया)गेले कितीतरी दिवस तिची ती कविता मनात ठाण मांडून बसली आहे. त्या कवितेवर लिहिण्यासाठी अनेकदा सुरुवात केली.... पण त्या अभिजात
 
iravati अरुंधती kulkarni
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बचपन

याद बहुत आती बचपन की।जब करीब पहुँचा पचपन की।।बरगद, पीपल, छोटा पाखर।जहाँ बैठकर सीखा आखर।।संभव न था बिजली मिलना।बहुत सुखद पत्तों का हिलना।।नहीं बेंच था फर्श भी कच्चा।खुशी खुशी पढ़ता था बच्चा।।खेल कूद और रगड़म रगड़ा।प्यारा जो था उसी से झगड़ा।।बोझ नहीं था सर
 
श्यामल सुमन
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पुन्हा पुन्हा

पुन्हा पुन्हा पडायचे, उठायचे पुन्हा पुन्हा पदोपदी दुभंगुनी जुळायचे पुन्हा पुन्हा कुणी किती करोत घाव, तू नको धरू मनी हृदय विशाल आपले करायचे पुन्हा पुन्हा सरेल खिन्न काळ अन् निवेल दुःख प्रीतिचे फिरून जीवनी वसंत यायचे पुन्हा पुन्हा स्वतःच शुक्र हो, स्वतःच
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क्या हुआ जो ना चढा पोस्ट ब्लोगवाणी पर

क्या हुआ जो ना चढा पोस्ट ब्लोगवाणी परवाह-वाही ना मिली छोटी - बङी नादानी पर.मैने जो कविता कहा तुने वही कहानी लिखीकुछ ने चटका न भरा ब्लोग की दिवानी पर.उनकी झूठी , मामुली बातें चढी जो आसमांअपनी बातें रेत में जो दब गयी वीरानी पर.खुद के शब्दों पे खुदीने खुद
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‘‘आदमी का अब जनाजा, जा रहा संसार से’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

“25 साल पुरानी मेरी एक रचना” आदमी के प्यार को, रोता रहा है आदमी। आदमी के भार को, ढोता रहा है आदमी।। आदमी का विश्व में, बाजार गन्दा हो रहा। आदमी का आदमी के साथ, धन्धा हो रहा।।  आदमी ही आदमी का, भूलता इतिहास है। आदमी को आदमीयत का नही आभास है।।
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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इस बारिश में बूँदें कुछ कम गिरेंगी

दिल के दायरे की हद नहीं होती जज़्बात कोई हो, ग़म या खुशी ना करने की ज़िद नहीं होती
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बन्दिनी वर्षा, बन्दिनी मैं................... घुघूती बासूती

वर्षा तू भी तो मजबूर हैइस शहर में,मुझ सी तू भी कैदी है!जैसे मैं इतनी खिड़कियोंबाल्कनियों के होने पर भी,हूँ सलाखों के पीछेतू भी तो चाहे बरसती है अपने मन सेफिर भी गति न है तेरी तेरे मन की।प्रकृति में क्या है उद्देश्य वर्षा का?बादलों से तकना प्यासी धरती
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गौरव सोलंकी की कविता - चार लड़कियाँ भी हैं अकेली लड़कियाँ

गौरव सोलंकी की यह कविता अद्यतन कविता परिदृश्य को समृद्ध करती है. आई.आई.टी रूड़की से पढ़े लिखे गौरव फिलवक्त पत्रकारिता से जुड़े है. बेहद अच्छा और जरूरी कवि. गौरव की बहुत सारी कविताओं के लिये यहाँ क्लिक करें.यह उजाले की मजबूरी हैकि उसकी आँखें नहीं होतींऔर वह
 
चन्दन
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चिड़िया

चिड़िया पहचानती है अपना दुश्मन चाहे वह बिल्ली हो या काला भुजंग . वह जिस चोंच से बच्चों को चुग्गा चुगाती है और किसी लुभावने मौसम में चिड़े की पीठ गुदगुदाती है उसी चोंच को हथियार बनाना जानती है। आभास होते हुए भी कि घोंसले में दुबके बच्चे पंख उगते ही उड़
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मानवता के दुश्मन

रात का सन्नाटाअचानक चीख पड़ती हैं मौतेंकिसी ने हिन्दुओं को दोषी मानातो किसी ने मुसलमां कोपर किसी ने नहीं सोचा किन तो ये हिंदू थे न मुसलमांबस मानवता के दुश्मन थे।
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शाम की रोटियों की चिंताकविता ~~

थियेटर हाऊसफुल है लोग पागल हो रहे हैं मेरे अभिनय को देखने के लिये मैनें अपने अभिनय का लोहा जो मनवा लिया है, मैं रूदन का सिद्धहस्त हूँ तभी तो दिलों में पैबस्त हूँ, मैं रावण को मात देता हूँ अट्टहास के मामले में, मैं भावनाओं का प्रवाह कर देता हूँ संत्रास के
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क्या यह मेरे आग्रह ही हैं

पिछले दिनों भारत भूषण अग्रवाल सम्मान से सम्मानित कवियों पर वरिष्ठ आलोचक विष्णु खरे जी से असहमति दर्ज करते हुए मैंने अपने आग्रहों का जिक्र करते हुए उस प्रव्रत्ति की ओर ध्यान आक्रष्ट करना चाहा था कि आलोचना कैसे आज शार्ट लिस्टिंग करने की एक युक्ति होती चली
 
विजय गौड़
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आज के कवियों का लेखन निरुद्देश्य है- बोधिसत्व (अंतिम क़िस्त)

(पिछली क़िस्तों में बोधिसत्व ने हिन्दी कविता की परंपरा, उसके कुछ जातीय लक्षणों आदि पर विस्तार से बात की। इस अंतिम क़िस्त में वह इसी रोशनी में पिछले बीस साल की कविता को देखते हैं)(पाँच)तो आज के जो भी कवि लिख रहे हैं उनके लेखन का ऐसा कोई बड़ा उद्देश्य नहीं
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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दीपक चौरसिया ‘मशाल’ के काव्य संग्रह ‘अनुभूतियाँ’ से कुछ कविताएँ

काव्य संग्रह ‘अनुभूतियाँ’ के बारे में मोहम्मद आजम कहते हैं – ‘अनुभूतियाँ’ में दीपक चौरसिया ‘मशाल’ ने अपनी तमाम अनुभूतियों को अक्षरों एवं शब्दों के माध्यम से पेश कर दिया है. इनके यहाँ अगर ग़म, दर्द, विरक्ति, निराशा, मजबूरी, समझौतों के धुंधले और काले शेड
 
Raviratlami
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प्रियतम होते पास अगर

प्रियतम होते पास अगरमिट जाती है प्यास जिगरढ़ूँढ़ रहा हूँ मैं बर्षों सेप्यार भरी वो खास नजरटूटे दिल की तस्वीरों का देता है आभास अधरगिरकर रोज सम्भल जाएं तोबढ़ता है विश्वास मगरतंत्र कैद है शीतल घर मेंजारी है संत्रास इधरलोगों को छुटकारा दे दोबन्द करो बकवास
 
श्यामल सुमन
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अख़बार के बण्डल में देखता हूँ ज़माने का सच ......... ..नीशू तिवारी

भारी बोझल आँखें अधखुली खिड़की से झांकती हैं..........बंद हो जाती है पलकें खुद ब खुद...बंद आँखें होते हुए भी मैं पहुच जाता हूँ बालकनी तकउठाता हूँ अखबार का बण्डलअलसाये बदन में हवा का झोंका सनसनी पैदा करती हैमैं बेमन खोलता हूँ समाज के दर्पण को दौडाता हूँ
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हम बच्चे मज़दूर के

चन्दा मामा दूर के-डॉ० अश्वघोष चन्दा मामा दूर केछिप-छिप कर खाते हैं हमसेलड्डू मोती चूर केलम्बी-मोटी मूँछें ऍंठेसोने की कुर्सी पर बैठेधूल-धूसरित लगते उनकोहम बच्चे मज़दूर केचन्दा मामा दूर के।बातें करते लम्बी-चौड़ीकभी न देते फूटी कौड़ीडाँट पिलाते रहते
 
डॉ.कविता वाचक्नवी Dr.Kavita Vachaknavee
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धुंआ

धुंआ जाने कुछ अजीब सी बात है तुममें बुरी चीजों में भी कुछ अच्छा सोच ही लेते ही अपने लिए तभी तो तुमने धुंए से सीखा ऊपर, ऊपर और ऊपर उठनाफैलना, मिलना, मशहूर होना कभी आँखों में उतरना फिर वो भला आंसू की तरह ही क्यों न हो तुम्हारी रूचि तो जलने, जलाने, धुंए और
 
रचना दीक्षित
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आज इच्छाएं मेरी उड़ रही है तितली बनकर

आज इच्छाएं मेरी उड़ रही है जैसे उडती तितलियाँ हो,वो ठहरती ही नहींकिसी पलकिसी एक फूल  पर और ये मेरा नादाँ मनकर रहा है कोशिश पकड़ने की उन तितली बनी इच्छाओं कोएक अबोध बालक की तरह और फिर चाहता की कैद कर ले उन्हेंजिससे वो न उड़ सके दुबारा,पर हर बार की तरह
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हिन्दी साहित्य में जातियों का दबाव- बोधिसत्व के लेख की तीसरी क़िस्त

इस लेख की पिछली कड़ियों में बोधिसत्व ग़ुलामी के दौर के साहित्य की प्रवृतियों और उनके स्रोतों की तलाश की कोशिश की थी। इस कड़ी में वह जाति की भूमिका पर कुछ सवाल खड़े कर रहे हैं। भारतीय समाज में जाति एक महत्वपूर्ण सच्चाई रही है और इससे कोई इन्कार नहीं करता।
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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फिर उथले किनारों से ही लौट आये हैं !

सोचा था चलेगें सिन्धु की थाह लेने नीली अतल गहराइयों की स्वयं पर एक छाप लेने । था स्वप्न चलेंगे एक बार निरखने विशद अनुभूतियॊं के गहन कानन लता कुंज गह्वर , चुनेगें कुछ पुष्प चेतना की सजावट को संघनित आर्द्र भाव अवगुंठनों के। अजाने मन की हुलसती एक चाहना थी
 
आर्जव
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दु:ख का जायका

मेरे लोगो!दु:ख से समझौता न करनावरना दु:ख भी कड़वाहटों की तरह तुम्हारे $जायके का हिस्सा बन जायेगातुम दु:ख के बारे में $गौर करना...उसकी माहीयत जानना, उसकी तुम ड्राइंग करनाऔर सर जोड़कर उस तस्वीर से बातें करनागली के बाहर मैदानों में, खेतों में, घर की छतों के
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रोहतांग : अपने - अपने हिस्से का हिमालय

यात्रा की थकान व खुमारी के उतरने के बाद स्मृतियों के उतराने और उन्हें उलीचने -समेटने - सहेजने के क्रम में मोबाइल और कैमरे से ली गईं तस्वीरों को एडिट करने की जुगत के बीच आज दोपहर के आलस्य में कुछ लिखा गया है। पता नही ये कवितायें हैं या कवितानुमा ट्रेवेलाग
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अस्तित्व....................(कविता)...................... सुमन 'मीत'

दी मैनें दस्तक जब इस जहाँ मेंकई ख्वाइशें पलती थी मन के गावं मेंसोचा था कुछ करके जाऊंगीजहाँ को कुछ बनकर दिखलाऊंगीबचपन बदला जवानी ने ली अंगड़ाईजिन्दगी ने तब अपनी तस्वीर दिखाईमन पर पड़ने लगी अब बेड़ियांरिश्तों में होने लगी अठखेलियांजुड़ गए कुछ नव बन्धनमन करता
 
हिन्दी साहित्य मंच
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कविता के विरोध में

भाव पंचर हो गये हैं ! मन न जाने क्यों अपना मसौदा कविता को न देना नहीं चाहता है बहुत कुछ पास उसके कहने को , सुनाने को कविता को देने को कविता हो जाने को लेकिन वह दबाये बैठा है सटकाये बैठा है ! ! ! वह नाराज है शायद कविता से कि वह बड़ी डिप्लोमेट हो गयी है !
 
आर्जव
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“जाना अपने घर, कल - परसो!” (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

♥ एक पुरानी रचना ♥नभ में कितने घन-श्याम घिरे, बरसी न अभी जी भर बदली। मुस्कान सघन-घन दे न सके,  मुरझाई आशाओं की कली।------------प्यासा चातक, प्यासी धरती, प्यास लिए, अब फसल चली। प्यासी निशा - दिवस प्यासे, प्यासी हर सुबह-औ-शाम
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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अहल्या-उद्धार--कविता

हमआये है इस शहरमें नये-नये,कितने कूचेगलियों मेंभटकते-भटकते।हमनेछुआ इन दीवारोंको,वो फफक -शिशकके रोने लगी ।पास की गलियोंसे भी आता था सिसकियोंका क्रंदन।पासमन्दिर मेंमहक रहा थाचन्‍दन ।फिर मैनेंछुआ एक जीवितइंसान को,वो बुत बनाबस मुझे देखताही रहा। उसकी
 
मनसा आनंद 'मानस'
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राष्ट्रवादी.................श्यामल सुमन

तनिक बतायें नेताजी, राष्ट्रवादियों के गुण खासा।उत्तर सुनकर दंग हुआ और छायी घोर निराशा।।नारा देकर गाँधीवाद का, सत्य-अहिंसा क झुठलाना।एक है ईश्वर ऐसा कहकर, यथासाध्य दंगा करवाना।जाति प्रांत भाषा की खातिर, नये नये झगड़े लगवाना।बात बनाकर अमन-चैन की, शांति-दूत
 
हिन्दी साहित्य मंच
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नंदलाल भारती का कविता संग्रह – उद्गार : पीडीएफ़ ई-बुक के रूप में डाउनलोड करें या पढ़ें ईपेपर पर

नंदलाल भारती का कविता संग्रह – उद्गार : पीडीएफ़ ई-बुक में डाउनलोड करें या पढ़ें ईपेपर पर यहीं नीचे दिए एम्बेडेड प्लेयर पर. डाउनलोड के लिए डाउनलोड लिंक पर चटका लगाएँ. नए स्क्रिब्ड के एचटीएमएल 5 समर्थित हो जाने से आपको विकल्प टैक्स्ट फ़ाइल में डाउनलोड करने
 
Raviratlami
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महाराज सिंह परिहार के गीत

  अधूरी आजादी ․․․․․․․․․․․․․․․․․ आजादी है अभी अधूरी पाये न जनता रोटी पूरी तंत्र लोक से दूर हुआ है अवमूल्‍यन भरपूर हुआ है आज देश टुकड़ों में बंटता जीना हुआ हराम अभी देश को लड़ना होगा एक और संग्राम सपनों की लाशें लावारिश बेवश की नहीं हो गुजारिश माली ने
 
Raviratlami
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गुलाम भारत के साहित्य में अंग्रेज़ सरकार का विरोध नहीं दिखता- बोधिसत्व

बोधिसत्व - abodham@gmail.comबोधिसत्व के लंबे आलेख की पहली क़िस्त पर आयी टिप्पणियों में आमतौर पर अगली के इंतज़ार की बात थी। आज प्रस्तुत है उसकी दूसरी क़िस्त जो गुलाम भारत के मुख्यधारा के लेखन की प्रवृतियों की पड़ताल करती है। ख़ासतौर पर उसके सवर्ण
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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लगा माँ की मुझे दुआ सा कुछ

शायरी - ग़ज़लें, नज़्में क्या-क्या कुछलगा माँ की मुझे दुआ सा कुछजाने जुगनू कि हौसले के चराग़यादों-यादों जला बुझा सा कुछफिर से कुछ सोच लिया शाम ढलेहुआ फिर दिल से लापता सा कुछबेरूख़ी भी है, और ख़फ़ा भी नहीं-ज़ुल्म है, पर लगे अदा सा कुछबूढ़े पत्तों की बेबसी कि
 
हिमान्शु मोहन
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मृदु और शान्त हो जाते हैं...........

अपूर्णता ही हैजो अपूर्ण चीज की शिकायत करती है ।हम जितने ज़्यादा पूर्ण होते हैं,उतने ही ज़्यादा हमदूसरों के दोषों के प्रतिमृदु और शान्त हो जाते हैं- फैंकलिन www.albelakhatri.com
 
AlbelaKhatri.com
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मौत

आज मैंने मौत को देखा!अर्द्धविक्षिप्त अवस्था में हवस की शिकारवो सड़क के किनारे पड़ी थी!ठण्डक में ठिठुरते भिखारी केफटे कपड़ों से वह झांक रही थी!किसी के प्रेम की परिणति बनीमासूम के साथ नदी में बह रही थी!नई-नवेली दुल्हन को दहेज की खातिरजलाने को तैयार
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Love is in the air

तनहा रहने की आदत सी हो गयी है हवा का झोका भी मेहमान लगता है मन के विचारो को दबाने की आदत सी हो गयी है बारिश के बूँद भी शोर लगती हैकुछ संजोय हुए लम्हे है अब वो भी पराये लगते है किसी की दस्तक से रूह तक कंप जाती है इतनी व्यस्त जीवन मेरा ख्याल
 
Ritu
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अब चुप रह कर अपनी औकात में रहने लगी है वह और निश्चिन्त भी ...

कल मेरी "अब अपनी औकात में रहने लगी है वह "कविता पर विभिन्न टिप्पणियां प्राप्त हुई ...किसी को पसंद नहीं आया , किसी को ठीक ही लगा , तो कोई ट्रांसलेटर काम नहीं करने का बहाना लगाते हुए टिप्पणी लिखने से बचता रहा ... हर प्रकार से मेरा उत्साहवर्धन ही हुआ
 
वाणी गीत
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जाना सुना मेरा जाना

अर्थ बचा रहे इसके लिए ज़रूरी है कि लिपि में शब्दों के बीच दूरी बनी रहेदोनों पैर एक साथ बढ़ाता हूं तो गिर जाता हूं उछलना पड़ता है इसके लिएचल सकूं अपने पैरों को बारी-बारी आगे बढ़ाता हूंसड़क से मुहब्बत का यह आलम है उसे चोट नहीं देना चाहताफिर क्यों तुमको
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