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गुलमोहर

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती संगीता स्वरुप जी की कविता 'गुलमोहर'. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा... याद है तुम्हें ? एक दिन अचानक आ कर खड़े हो गए थे मेरे सामने तुम और पूछा था तुमने कि - तुम्हें गुलमोहर के फूल पसंद
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पापा हार गए…

पापा हार गए… रात-ठण्ड की बिस्तर पर पड़ी रजाईयों को अखाडा बनाता मेरा छोटा बेटा पांच बरस का | अक्सर कहता है - पापा ! ढिशुम-ढिशुम खेले ? और उसकी नन्ही मुठ्ठियों के वार से मै गिर पड़ता हूँ … धडाम वह खिलखिला कर खुश हो कर कहता है .. ओ पापा हार
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मेरे भैय्या - ओम व्यास 'ओम'

:: माँ :: माँ, माँ-माँ संवेदना है, भावना है अहसास है माँ, माँ जीवन के फूलों में खुशबू का वास है, माँ, माँ रोते हुए बच्चे का खुशनुमा पलना है, माँ, माँ मरूथल में नदी या मीठा सा झरना है, माँ, माँ लोरी है, गीत है, प्यारी सी थाप है, माँ, माँ पूजा [...]
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'एक शून्य तृप्ति..!!

आजकल भाव सब सूख से गए हैं आँखों से पानी भी गिरता नहीं परछाई भी जैसे जुदा जुदा सी है मन भी अब पाखी बन उड़ता नहीं पंख भी जैसे क़तर गए हैं. पर फिर भी ये दिल धडकता है ज्यादा इत्मीनान से. ख़ुशी भी झलकती है अपने पूरे गुमान से हाँ पर ख़्वाबों को मेरे जंग लग गई
 
shikha varshney
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एक रंग जो ठहरा सा बस लगता है...

बहुत दिनों से इंतजार में हूँ, इंतजार कुछ लंबा ही होता जा रहा है. मज़ा ये भी है कि ये तक पता नहीं कि इंतज़ार किसका है. जुम्मा-जुमा कायदे से 2 पोस्ट भी नहीं लिखीं कि लगा, कि कुछ मज़ा आ जाए ऐसा कुछ समझ में आए तो पोस्ट किया जाए... ब्लॉग शुरू करने के पहले जो
 
विवेक.
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बुद्ध होगा राजप्रासाद का प्रहरी !

बुद्ध होगा राजप्रासाद का प्रहरी !(ज्ञात होगा कुशीनगर बुद्ध की निर्वाण स्थली के रूप में जाना जाता है। पिछडे़पन का दंश झेल रहे भारत के तमाम गावों की तरह ही यह स्थान भी अब विकास के कहर से रूबरू है....पर्यटन विकास के नाम पर यहां बुद्ध की 500 फिट उंची प्रतिमा
 
Pawan Meraj
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तलब लगी है

तलब लगी है, सांस लेनी है ढूँढ रहा हु | भागा नहीं, हाफ्फ़ रहा हु |पसीना भी आने लगा है अब, कोई तिंका ही सही सहारा ढूँढ रहा हु |कहा तक भागू,कोई तो मिले जिसे पकड़ कर रुक सकू, शायद रो सकू |अँधेरा,मेरी सांसे हफ्ते हुए,धड़कने बढ़ते हुए, ये क्या हुआ, तलब बढ़ रही है
 
Tanumoy Bose
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तेरा बसेरा यहां नहीं....!!

तू कहीं और जा,तेरा बसेरा यहां नहीं,खुद की हरकतों से, आज बर्बाद है, कपटी है बना, एक वहसी भी तूझ में तैयार है, चल जा, तू कहीं और जा…….!!
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सारे जहां से अच्छा

सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा,हम बुलबुलें हैं इसकी ये गुलगुला हमारा।बुड्ढे कुंवारियों से नैना लड़ा रहे हैं,मकबूल माधुरी की पेंटिंग बना रहे हैं,ऊपर उगी सफेदी भीतर दबा अंगारा,सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा।सत्ता के सिंह बकरी की घास खा रहे
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प्यारे कृष्ण कन्हैया

कलयुग में अब ना आना रे प्यारे कृष्ण कन्हैयातुम बलदाऊ के भाई यहाँ हैं दाउद के भैया।।दूध दही की जगह पेप्सी, लिम्का कोकाकोलाचक्र सुदर्शन छोड़ के हाथों में लेना हथगोलाकाली नाग नचैया। कलयुग में अब. . .।।गोबर को धन कहने वाले गोबर्धन क्या जानेंरास रचाते पुलिस
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कुछ ताजी कवितायेँ...

हाल में ही लिखीं कुछ ताजी कवितायेँ...अभी बीज बोयें हैं... वयस्क नहीं हुई हैं..ग्रो होने में समय लगेगा...1.कितनी बारऔर मिलोगे...थकते नहीं...कहीं तो रुको...तथ्य अकारण तो नहीं...शून्यता से परे...अनुरोध आपकामुक्त बंधनसाधना, निर्वासनआधूत, निमग्नसाक्षी बनकितनी
 
विजेंद्र एस विज
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मैं और मेरी कविता- आशा बर्मन

मैं और मेरी कविता कभी कभी मुझे ऐसा होता है प्रतीत,कि मेरी कविताओं का भी बन गया है अपना व्यक्तित्व ।वे मुझे बुलाती हैं,हंसाती हैं, रुलाती हैं,बहुत दिनों तक उपेक्षित रहने परमुझसे रूठ भी जाती हैं।करती हुई ठिठोली,एक दिन एक कविता मुझसे बोली,”तुम मुझे कभी नहीं
 
आशा बर्मन
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तीन अलग कवि ..तीन अलग कविताएं ....तीन अलग सोच .......

  कुछ कविताएं ऐसी होती है जब लिखी जाती है तो जाने क्या सोचकर .पर जब सामने आती है तो कई लोगो की बन जाती है ..कभी कभी सोचता हूं ...के पियूष मिश्रा क्या .."तुम्हारी है तुम ही संभालो ये दुनिया "के... पूरा पढ़ें
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होली

हम हँसते हैदौड़ लगाते है सड़कों परअपने चेहरों पर हजारों रंग लगाए .थक जाते है , हांफ जाते हैलेकिन पीछा करते रहते हैदूसरों के चहरो को रंगने के लिएकितना खुश है हमकि जीवन के कितने रंग लगा लिए हैअपने चहरो पर हमने .हम हंसते रहते है अपना पेट पकड़ कर .लगातार
 
मोक्ष
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चक्कर घनचक्कर

. इस चक्कर की शुरुआत होती है इंजीनियरिंग डिग्री के बाद किसी maltinational में जॉब ऑफर से ....नया नया जोश और सजने लगते हैं सपने...Onsite के बहाने विदेश यात्रा के ..तभी एक स्पीड ब्रेकर आता है.." कि बेटा शादी कर के जाओ जहाँ जाना है , .एक बार गए तो क्या
 
shikha varshney
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प्यार बांटते चलो.

प्रेम दिवस ....कहो या valentine day ..कितना खुबसूरत एहसास है ...आज के दौर की इस आपा धापी जिन्दगी में ये एक दिन जैसे ठहराव सा ला देता है ....एक दिन के लिए जैसे फिजा ही बदली हुई सी लगती है ..फूलो की बहार सी आ जाती है...हर चेहरा फूल सा खिला दीखता है..कोई
 
shikha varshney
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प्रवासी की पीड़ा - आशा बर्मन

प्रवासी की पीड़ाएक प्रश्न बादल सा बोझिल,मन में मेरे घिर-घिर आता,प्रवास के इस जीवन में.क्या खोया, क्या मैंने पाया ?त्योहारों पर माता का, प्यार भरा निमंत्रण पाना।और विभिन्न बहानों से,साजन का अपने पास बुलाना॥ऐसे मधुर प्रसंगों से, स्वयं को मैंने वंचित
 
आशा बर्मन
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फिर आया नव वर्ष

पिछले वर्षों के सभी, मुद्दे और विकल्पपूरा करने के लिए, लेंगे फिर संकल्पस्वयं और परिजनों का, करने को उत्कर्ष --------------------- फिर आया नव वर्ष लिप्त रहे निजस्वार्थ में, किया न कोई विकास परहित की बातें सभी, लगती थीं बकवासविवश किया पदमोह ने, करने जन
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मुझे रायना से प्रेम हो गया है

एक दिन रात को निर्मल वर्मा की "वे दिन" पढ़ते हुए... अभी-अभी एक किताब पढ़कर रखी है और अब कुछ लिखने के बारे में सोच रहा हूँ- एक लगातार सोच और तड़प लिखने के बारे में। लिखने के बारे में सोचना या इस प्रोसेस से गुजरना एक यातना भरा काम है। यह एक अभिशप्त जीवन
 
मोक्ष
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बर्फ के फाहे

यहाँ आजकल बर्फ पढ़ रही है तो उसे देखकर कुछ ख्याल आये ज़हन में view from my house window . छोटे छोटे रुई के से टुकड़े गिरते हैं नीले आकाश से और बिछ जाते हैं धरा पर सफ़ेद कोमल चादर की तरह तेरा प्यार भी तो ऐसा ही है, बरसता है बर्फ के फाहों सा और फिर ......
 
shikha varshney
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शायद ...इसीलिए परियां अब इस ज़मीन पर नहीं आती

कल का दिन मुझे व्यथित  कर गया | एक मित्र महोदया ने एक अजन्मी बच्ची की हत्या कर दी क्यूंकि उनको अपनी पहली संतान के रूप में एक बिटिया नहीं चाहिए थी कैसी त्रासदी है जब पढ़े लिखे जागरूक लोग ऐसी मानसिकता रखते हैं तो बाकि लोगो से कोई क्या उम्मीद रहे? य
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मन- आशा बर्मन

मन भटक रहा क्यों बार-बार? यह मन ही सुख का स्रोत सदा यह मन ही दुःख का बने द्वार॥ मन भटक रहा क्यों बार-बार? बहुधा लगता मेरा जीवन निश्चित सी इक परिपाटी पर, बढ़्ता जाता ज्यों अनायास गति लेकर सहज, सरल मन्थर॥ या चली कभी आँधी मन में स्पष्ट न कुछ भी हो पाता,
 
आशा बर्मन
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परी हूं मैं यहाँ, बस यूँ ही रहने दो मुझे मेरे ही ख्यालों में

परी हूँ मैं" हाँ परी ही तो हूँ ,हूँ पर अपने ही कुछ खयालो में घबराई सकुचाई तनहा हूँ ,किस्मत के अनसुलझे सवालों में ! आफताबी रेशम से बुनती हूँ ,लाखों सुनहरी झिलमिल ख्वाब रहती हूँ तारों में बसे आसमानी शहर के चाँद आशियाने में ! पूरा पढ़ने और टिप्‍पणी देने
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बीते ऐसे दिन बहुतेरे - आशा बर्मन

बीते ऐसे दिन बहुतेरे। बीते दिन बीती रातों में, सुधियों के बढ़्ते से घेरे। बीते ऐसे दिन बहुतेरे।। बचपन के सुन्दर सपनों में छिपा हुआ सुखमय संसार। सहजप्राप्य अभिलाषाओं में भरा हुआ सुख चैन अपार॥ सब थे अपने, सुन्दर सपने जागा करते साँझ सवेरे । बीते ऐसे दिन
 
आशा बर्मन
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बीते ऐसे दिन बहुतेरे - आशा बर्मन

बीते ऐसे दिन बहुतेरे। बीते दिन बीती रातों में, सुधियों के बढ़्ते से घेरे। बीते ऐसे दिन बहुतेरे।। बचपन के सुन्दर सपनों में छिपा हुआ सुखमय संसार। सहजप्राप्य अभिलाषाओं में भरा हुआ सुख चैन अपार॥ सब थे अपने, सुन्दर सपने, जागा करते साँझ सवेरे । बीते ऐसे दिन
 
आशा बर्मन
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अभिशप्त- आशा बर्मन

अभिशप्त पृथ्वी को केन्द्र मानकर, चाँद उसके चारों तरफ़ घूमता रहता है। और स्वयं पृथ्वी भी तो विशाल विस्तृत पृथ्वी, शस्य-श्यामला पृथ्वी , रत्नगर्भा पृथ्वी, सूर्य के चारों ओर घूमती रहती है- बाध्य सी, निरीह सी, अभिशप्त सी। फ़िर भी,इस प्रकार घूमते रहने में ए
 
आशा बर्मन
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दो पाटों के बीच में ......

कितना आसान होता था ना जिन्दगी को जीना जब जन्म लेती थी कन्या लक्ष्मी बन कर होता था बस कुछ सजना संवारना सखियों संग खिलखिलाना, कुछ पकवान बनाना और डोली चढ़ ससुराल चले जाना बस सीधी सच्ची सी थी जिन्दगी अब बदल क्या गया परिवेश बोझिल होता जा रहा है जीवन जो था
 
shikha varshney
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कवि और कविता - आशा बर्मन

तू कहां खो गयी कविता रानी ? पहले तो तू बड़ॆ प्यार से भावों की राह चलाती थी। अलंकारों से सुसज्जित हो, नित रूप नये दिलाती थी ॥
 
आशा बर्मन
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मैं खुदा का बंदा नही

मैं खुदा का बंदा नही एक अदद कीड़ा हूँ इंसानी जिस्म में. हर शाम पिघल कर रिस जाता हूँ सड़कों पर. चिपक जाता हूँ कई जूतों और चप्पलों में. कुचल दिया जाता हूँ तितलियों से प्रेम करने के पाप में बागों में विचरण के अपराध में. मैं खुदा का बंदा नहीं पतंग हूँ अट
 
मोक्ष
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प्यार का प्रतिदान - आशा बर्मन

प्यार का प्रतिदान चाहकर भी कर न पायी, प्यार का प्रतिदान मैं । प्यार भी ऐसा मिला, आकंठ मैं डूबी रही, मिल गया मुझको सभीकुछ, चाह ना कोई रही। भाग्य पर निज आजतक विश्वास आता है नहीं कब व कैसे बन गयी हूँ, प्यार का प्रतिमान मैं॥ चाहकर भी कर न पायी, प्यार का
 
आशा बर्मन
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कविता- आशा बर्मन

कविता किसी ने कहा, कविता मन का विलास है, कविता मेरे लिये प्राणों की प्यास है । प्यास है साथ ही तृप्ति का साधन भी, कविता आराध्य है, साथ ही आराधन भी। विलास की वस्तु यह पहले हुआ करती थी, अलंकारों से युक्त हो,राजाओं के मन हरती थी। कविता हमारे लिये विलास
 
आशा बर्मन
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तारीखें और हॉस्पिटल

तारीखें और हॉस्पिटल जिंदगी- मौत के बीच कुछ किलो मीटर आवाजें- सन्नाटा साँस... बे- साँस और इन सब के बीच का अंतर कहीं कुछ था तो बस दीवारों पर गोल घूमता हुआ वक्त वक्त जो चुभता रहा बार-बार कलाइयों में सुइयां बनकर सर पर कांच की सफ़ेद बोतलें झूलती रहीं रात भ
 
मोक्ष
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दीवाली- आशा बर्मन

दीवाली आयी, जगमग दीप जलाओ । भारत से दूर प्रवासी हैं हम, विदेश भूमि के वासी हैं हम, दीवाली के अवसर पर शुभकामनायें बरसाओ । दीवाली आयी, जगमग दीप जलाओ । लक्ष्मीपूजन हो घर-घर में, आरती हो मंगलमय स्वर में, निज भावों के दीपदान पर, स्नेह-प्रदीप जलाओ । दीवाली
 
आशा बर्मन
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Tanu'z Kriativity

अन्जाम साले हम ही छूट गए पीछे, बाकि सब आँखे मीचे, ऐश में; मेरे नज़रो के नीचे , नर्म गोश्त के मज़े लूटते, नदीम बनके हमसे आदिल पूछते ( नदीम: दोस्त, आदिल : सही-ग़लत ) हम भी जान के नामालूम बने है बैठे रुतबे के गरम जोश में, चढी हुई डगमगाती होश में, आधी आधूरी
 
Tanumoy Bose
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समय का वरदान- आशा बर्मन

समय का वरदान!बदल जाता समय-संग ही प्यार का प्रतिमान ।समय का वरदान!साथ था उनका अजाना, वह समय कितना सुहाना।एक अनजाने से पथ पर, युव पगों का संग उठ्ना।।कुछ झिझक, कुछ पुलक थी, एक सिहरन हृदयगत थी,जागती आँखों में सपने, मन का हर पल गुनगुनाना।प्यार की लम्बी डगर
 
आशा बर्मन
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देश की मिट्टी

देश की मिट्टी ऐसी छूटी, भाग्य मुझे लाया परदेश घर, रिश्तों से बढीं दूरियाँ, छूटा मेल-जोल, संदेश बहन और माँ-बाबा की, सारी खुशियों की खातिर सात समुंदर पार बसाया, धन की चाहत ने आख़िर प्यारी बहना की शादी कर, ऊँचे घर पहुँचाना है परियों सी सुंदर दुल्हन को,
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जागृति

जागृति जितना मैं झुकती हूं, उतना झुकाते हो। जितना चुप रहती हूं, उतना ही सुनाते हो ।। लचीली कोमल टहनी सी झुकना मुझे आता है। चंचल, गतिशील, पर रुकना मुझे आता है।। दबाव का प्रभाव, यदि जरुरत से ज्यादा हुआ, सूखी टहनी सी मैं टूट बिखर जाऊंगी । आत्मबल और विश्
 
आशा बर्मन
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गांधी जयन्ती के अवसर पर - आशा बर्मन

बापू : एक उद्‍गार आशा बर्मनहे गत शताब्दी के युग पुरुष, बापू!मुझे यह सौभाग्य तो नहीं मिलाकि में तुम्हारे दर्शन कर सकूँ,पर यह सौभाग्य तो मिला ही किमें उसी देश में, उसी युग में जन्मीजहाँ तुम्हारा जन्म हुआ था।देखने का सौभाग्य तो नहीं,पर सुनने का सौभाग्य तो
 
आशा बर्मन
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तुम्हारा प्यार - आशा बर्मन

गगन सा निस्सीम,धरा सा विस्तीर्ण.अनल सा दाहक,अनिल सा वाहक,सागर सा विस्तार,तुम्हारा प्यार! विश्व में देश,देश में नगर.नगर का कोई परिवेश,उसमें, मैं अकिंचन!अपनी लघुता से विश्वस्त,तुम्हारी महत्ता से आश्वस्त,निज सीमाओं में आबद्धमैं हूँ प्रसन्नवदन!परस्पर हम
 
आशा बर्मन
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आदमी

मै रोज इस कुएँ मै झांकतापानी पर अपनी परछाई देखताआवाज भी लगाता हूँकि कोई सदा लौटकर आएगीऔर मुझे अपना पता बताएगीमगर सड़क परदौड़ती , हांफतीइन मशीनो नेमुझे बहरा बना दियाऔर अंधा भी.बादलों की उंचाईया नापतीइन इमारतों ने मुझे छोटा कर दियाइतना छोटाकि बच्चों के
 
मोक्ष