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कपिलदेव त्रिपाठी की एक कविता

कविता की किताबकल की सुबह के बारे मेंकल वाले कल के पहले वाले कल ही सोच लिया जाना चाहिएयह सोचते हुए कल सोचा किकल कविता की वह किताब पढ़ूंगादफ़्तर जाने के पहले - किसी लावारिस वक़्त मेंदूबे जी से मिलनाक्या आज ही zaroori हैकल न भी मिलेंतो क्याइस तरह तो कविता
 
शिरीष कुमार मौर्य
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आभा बोधिसत्व की एक कविता

सीता नहीं मैं तुम्हारे साथ वन-वन भटकूँगीकंद मूल खाऊँगीसहूँगी वर्षा आतप सुख-दुखतुम्हारी कहाऊँगीपर सीता नहीं मैंधरती में नहीं समाऊँगी।तुम्हारे सब दुख सुख बाटूँगीअपना बटाऊँगीचलूँगी तेरे साथ परतेरे पदचिन्हों से राह नहीं बनाऊँगीभटकूँगी तो क्या हुआअपनी राह खुद
 
शिरीष कुमार मौर्य
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कुमार अनुपम की दो कविताएँ

7 मई, 1979 को (बलरामपुर, उ.प्र.) में। शिक्षा : बी.एस.सी., एम.ए.(हिन्दी), डी.एम.एल.टी. प्रशिक्षण। युवा कवि, चित्रकार, कला समीक्षक; लोक विधाओं में विशेष रुचि। तद्भव, नया ज्ञानोदय, हंस, कथादेश, वागर्थ, वर्तमान साहित्य, कथन, प्रगतिशील वसुधा, साक्षात्कार,
 
शिरीष कुमार मौर्य
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सुषमा नैथानी की कविताएँ

कवि का आत्म परिचय पता नहीं ये परिचय भी कितना परिचय है, पर कम से कम इसकी तथ्यपरक शिनाख्त हो सकती है। मूलत: उत्तराखंड से. स्नातक (B. Sc.) तक की शिक्षा उत्तराखंड के करीब दर्ज़न भर कस्बो और शहरों में. M. Sc. बायोटेक्नोलोजी, PhD. बाटनी. १९९० में उत्तराखंड से
 
शिरीष कुमार मौर्य
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हरेप्रकाश उपाध्याय की कविता

हरेप्रकाश उपाध्याय युवा पीढी के कवियों में एक चर्चित नाम है। उन्हें २००६ का अंकुर मिश्र कविता पुरस्कार मिला है और इस वर्ष उनका पहला संग्रह " खिलाड़ी दोस्त और अन्य कविताएँ " ज्ञानपीठ प्रकाशन से छप कर आया है। वर्तमान परिदृश्य में यह जो वर्तमान है ताजमह
 
शिरीष कुमार मौर्य
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पंकज चतुर्वेदी की पाँच कविताएँ

गोया कार से टकराते बचा वह आदमी भी कार चलाती स्त्री को देखकर मुस्कराया गोया औरत के हाथों मारा जाना भी कोई सुख हो *** शमीम जाड़े की सर्द रात समय तीन-साढ़े तीन बजे रेलवे स्टेशन पर घर जाने के लिए मुझे ऑटो की तलाश आख़िर जितने पैसे मैं दे सकता था उनमें मुझे
 
शिरीष कुमार मौर्य
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काव्य-कथा : बोरहेस और हिमालयाः टुनाईट आयम नॉट ए मंक / गिरिराज किराड़ू

पिछले दिनों मैंने देखा ऑल जस्टीफाईड छपी हुई, ‘गद्य’ ‘दिखती’ हुई कवितायें वेब पर प्रकाशित होने पर कुछ लोगों को लगा यह कोई ‘नयी’ तरह की कविता या उसकी फैशन है। विश्व कविता में तो यह बहुत पुरानी चीज़ है ही, हिन्दी में भी दशकों पुरानी है। खुद मेरा फॉर्म ए
 
शिरीष कुमार मौर्य
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अनूप सेठी की कविता - रोना

मेरी कविता " मेरे समय में रोना" को पढ़ कर बड़े भाई अनूप सेठी जी ने अपनी यह कविता मेल से भेजी, जिसे मैं कवि के प्रति आभार व्यक्त करते हुए अनुनाद के पाठकों के साथ शेयर कर रहा हूँ। चित्र यहाँ से साभार रोना रोना आंसू बहाने की क्रिया भर नहीं है खुद को उलीच
 
शिरीष कुमार मौर्य
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व्योमेश शुक्ल की एक कविता

दीपावली के अगले दिन और हिंदी में मचे समकालीन हाहाकार के बीच मैं आपको हमारे समय के एक समर्थ युवा कवि व्योमेश शुक्ल की यह कविता पढ़वाना चाहता हूं। व्योमेश ने पिछले चार साल में अपने आगमन के साथ ही हिंदी समाज के बीच वह सम्मान और स्नेह अर्जित किया है, जिसस
 
शिरीष कुमार मौर्य
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काला राक्षस- तुषार धवल की लम्बी कविता और उस पर वीरेन डंगवाल की टिप्पणी

तुषार धवल की कविता 'काला राक्षस ' को पढ़ते हुए मुझे कई बार मुक्तिबोध-- खासकर उनकी 'अँधेरे में' की याद आई -- और कभी बंगला के समादृत समकालीन कवि नाबरुण भट्टाचार्य की प्रख्यात कविता 'यह मृत्यु उपत्यका नहीं है मेरा देश ' की. वैसी ही साफ़, वर्त्तमान से भवि
 
शिरीष कुमार मौर्य
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बोधिसत्व की कविता

बोधिसत्व समकालीन हिंदी कविता के महत्वपूर्ण कवि माने जाते हैं। कविता में अपनी शुरूआत उन्होंने आलोचना में कुछ बेहद प्रभावशाली कविताओं से की थी और उसके कुछ समय बाद उनका पहला संग्रह `सिर्फ़ कवि नहीं´ आया। यहां प्रस्तुत है इसी महत्वपूर्ण संग्रह से उनकी एक
 
शिरीष कुमार मौर्य