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कविता-हवा का रुख

पिछले कुछ दिनों से उलझा हुआ सा था। वैशाली में एक मकान खरीदा है, उसे घर का रुप देने की तैयारी में हूं। रंगाई-पुताई सब है।आज मेरे बेहद करीबी मित्र और साथी रचनाकार सारथी ने टोचन दिया कि तुमने लिखना ही छोड़ दिया। तो भान हुआ कि अरे हम अपने मंदिर ब्लॉग पर तो
 
गुस्ताख़ मंजीत
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यह कैसा रिश्ता ?

मै और तारा आसमान में लाखों तारे पर एक ही तारा मुझको भाया |और टूटा वह, एक ही तारा ,जो मेरी किस्मत में आया | चलो मान ही लेता हूँ मै ,यह मेरी किस्मत में लिखा हुआ था |मगर फिर क्या दोष था उसका , जो आसमान में में सजा हुआ था |हम दोनों की एक ही किस्मत
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कुहकनी

कुहकनी सुहासिनी , नवागन्तुका वही मधुर आवाज़ , वही आह्लाद .क्या कहूँ तुम्हे खगी-पारिजात !उड़ान की साधिका !परिचारिका बाल मन की !कोकिल कुहुक -खागी !या बंजारन -आवाज़ घुमक्कड़ प्रभात-वेला की !दिशाओं का पगफेरा ले लौट आती अथ से इति के बीच की दूरी को तय कर जो
 
Aparna Manoj Bhatnagar
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भगीरथ की कविताएं

पानी पहाड़ों की विशालकाय चट्टानों सेरिसता पानी‘ओस’ और फर्न के कोमल पौधों के बीच सेरेंगता पानीपहाड़ी झरनों सेगिरता पानीचट्टानों से टकराताबर्फ सा ठंडा जलपानी रिसता है , रेंगता हैगिरता है , पड़ता हैटकराता हैकिंतु , टूटता नहींअपना वजूदबरकरार रखता हैपानीथोर
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हम अलग हैं

मैं आपका ध्यान हिंदुस्तान की आदिवासी जनजातियों की ओर आकर्षित करना चाहूंगी जो सदियों से उपेक्षित हैं . ओरान, मुंडा , गोंड ,मरिया ,धुरवा, डोरिया , भतरा आदि जनजातियों का जीवन हमने बदलने की कोशिश तो की किन्तु तरीका गलत रहा. उनकी संस्कृति पर हमने कुठाराघात
 
Aparna Manoj Bhatnagar
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सूरज नगर की छत पर

सूरज नगर की छत पर ठिठका खड़ा है -देख रहा है गलियों को चलते दम भरते कुचलते खोते लड़ते उलझते शायद ये मिलेगी किसी सड़क से जहाँ सभ्य-सुसंस्कृत मौलश्री की कनातें अमलतास की पीली गरिमा से गुज़रते कोई मोड़ होगा और मंजिलों का सब्र खुला आकाश होगा !ये गलियाँ ठिठकी देख
 
Aparna Manoj Bhatnagar
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एक परित्यक्ता को सांत्वना

  क्यों सहती हो ?कल कल बहती नदी यहाँ पर मंद पवन भी कुछ कहती है | फिर साँसों के रथ पर सवार हो कर, तुम गुमशुम सी क्यों रहती हो | थोड़ा सा ग़म बाँट लो तू भी तुम इतना ग़म क्यों सहती हो |तुमने उसको अपना माना,पर उसने, उसको अपना जाना जिसने
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दिविक रमेश की दो कविताएँ

२०वीं शताब्दी के आठवें दशक में अपने पहले ही कविता-संग्रह " रास्ते के बीच" से चर्चित हो जाने वाले आज के सुप्रतिष्ठित हिन्दी-कवि दिविक रमेश  बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। ३८ वर्ष की आयु में ही " रास्ते के बीच" और " खुली आंखों में आकाश" जैसी अपनी
 
रवीन्द्र प्रभात
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गवाक्ष – मई 2010

“गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में
 
सुभाष नीरव
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युद्ध और उबासियां

पीछे उबासियां थीं और आगे युद्ध थाहमने नदी पार करने की सोची ताकि युद्ध में उतर सकेंअंतहीन चौड़ी लगती थी नदीचांदनी रात में उसकी लहरें ठोस चांदी की तरह चमकती थींलेकिन हमें रोक पाता ऐसा उनमें कुछ भी नहीं थाजैसे-तैसे हमने नदी पार कीफिर एक नजर डोंगियों पर डाली
 
चंद्रभूषण
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यूं ही तो नहीं हुआ होगा

यहां तक मेरा आनाइतने सरंजाम सजानायूं ही तो नहीं हुआ होगाकिसी शाम नाकारा जानकरछोड़ दिया गया होऊंगाइतने बड़े सिर वाला बानर का बच्चाजो मां के पेट से चिपक भी नहीं पाताओह, तब भी इतना ही बड़ा था यह सिरजब शेयर बाजार नहीं बने थेलाला लोग मीडिया नहीं चलाते थेऔर
 
चंद्रभूषण
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नफरत का नाश्ता

लगता है गलत चुनापर चुनने को कुछ था नहींहोता तो प्यार चुनतानफरत क्यों चुनताजो कोलतार की तरहसदा चिपटी ही रह जाती हैकोई चांस नहीं थाजहां तक दिखा नफरत ही देखीउसी का कुनबा उसी का गांव उसी का देश और उसी की दुनियाजहां वह कम दिखती थीलोग उसे प्यार कहते थेफिर खाली
 
चंद्रभूषण
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सम्भावना डाट काम से तीन कविताएं

यहां दांईं ओर कमेन्ट बौक्स में एक मैसेज मुस्कुरा रहा है जिसमें हिन्दयुग्म के हालिया प्रकाशित काव्यसंग्रह सम्भावना डाट काम में प्रकाशित मेरी कुछ कविताओं को छापने का जिक्र है। रोहित की इस दोस्ताना गुजारिश पर उनकी कुछ कलाकृतियों के साथ उनके कुछ चित्रों और
 
उमेश पंत
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ज़ोर-जुलम है, जेल-सेल है। वाह खूब आज़ादी है!

सीमा आजाद और विनायक सेन जैसी नजीरों के इस दौर में बाबा नागार्जुन की यह कविता उनके नाम जो चुप्पियों और चाटुकारिता को सीने से लगाए घूम रहे हैं.सच न बोलना नागार्जुनमलाबार के खेतिहरों को अन्न चाहिए खाने को,डंडपाणि को लठ्ठ चाहिए बिगड़ी बात बनाने को!जंगल में
 
Reyaz-ul-haque
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रंग – कविता – रवि कुमार

रंग (a poem by ravi kumar, rawatabhata) रंग बहुत महत्वपूर्ण होते हैं इसलिए भी कि हम उनमें ज़्यादा फ़र्क कर पाते हैं कहते हैं पशुओं को रंग महसूस नहीं हो पाते गोया रंगों से सरोबार होना शायद ज़्यादा आदमी होना है यह समझ गहरे से पैबस्त है दिमाग़ों में तभी तो यह
 
रवि कुमार, रावतभाटा
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गवाक्ष – फरवरी 2010

“गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में
 
सुभाष नीरव
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सुन्न शिखर का मुसाफिर

वहां अब शब्द नहीं हैंध्वनियां हैं फकत...और भागती हुई तस्वीरेंकुछ धुंधले अर्थों के गिर्द मंडराती हुईखिंचे चेहरे और ऐंठी जीभ से निकलाएक सवाल मुझ तक पहुंचता हैआप क्या वीर है?वीर? कौन? अजी मैं कहां?एक मुस्कान धूमिल जर्द चेहरे पर दिखती हैनिराशा से भरी हुई,
 
चंद्रभूषण
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शादी का घर

यह एक सुंदर वैवाहिक दृश्य हैदो शिक्षित, सुरुचि संपन्न ब्राह्मण परिवारएक आरआई और दूसरा एनआरआईस्नेह बंधन में बंध रहे हैं।मोहल्ले के झगड़े की तरह मंत्र धांसताबनारस का एक चतुर चिबिल्ला पंडितदोनों तरफ से हजार-हजार के नोटझींटते हुए ठग मुद्रा में हंस रहा है।एक
 
चंद्रभूषण
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कब आओगे – कविता – रवि कुमार

कब आओगे ( a poem by ravi kumar, rawatbhata ) खुलता है ख़त और शब्द टपक पड़ते हैं कब आओगे पंछी चहचहाते हैं वृक्ष झूमते हैं गीत गाती है हवा कब आओगे मशीनों का थका देने वाला शोर लगने लगता है मधुर संगीत बोल फूट पड़ते हैं उसी ताल में कब आओगे वह सोचता है हथेलियों
 
रवि कुमार, रावतभाटा
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बच्चे और फूल – कविता

बच्चे और फूल ( a poem by ravi kumar, rawatbhata ) बच्चे और फूल – पूर्वार्ध बच्चों को फूल बहुत पसंद हैं वे उन्हें छू लेना चाहते हैं वे उनकी ख़ुशबू के आसपास तैरना चाहते हैं उन्हें तितलियां भी बहुत पसंद हैं बच्चों को उनके नाम-वाम में कोई ख़ास दिलचस्पी
 
रवि कुमार, रावतभाटा
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हौसला

ताज से उठती आतंकी लपटों में तिनकों से बना वो आशियाना जलते देखा है पतंगों की तो बात दीगर उस वक्त, परिंदों को परवाना बनते देखा है झुलस उठे थे पर उनके गुम्बदों, मीनारों पे वो फिर-फिर लौटे यकीन करो, उनकी इस हरकत से तबाही के हसरत की पेशानी पर मैने भी पसीन
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क्या यह प्रेम कविता है....

जब भी बदन में सिहरन हुई मेरे जिस्म पर धूप के टुकड़े टांककर वो पूछती रिश्तों की गुनगुनाहट तुम्हें कैसी लगी.... उम्मीदों, ख्वाहिशों के बोझ से दुहरा हुआ, तो उसने खुद ही मुट्ठी में कसी रेत हवाओं के हवाले कर पूछा क्या अब भी तुम्हें मुझ पर भरोसा नहीं.... ह
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मौन

वेदना का वो अस्फुट स्वर जो भाखा नहीं जाता फूलती-पिचकती पेशानी की शिराओं के साथ मथता रहता है भीतर ही भीतर। मौन... अहंकार ओढ़े अवसाद का ढूहा जो अव्यक्त रहने की चुप्पी थामें बस धसकता रहता चीख में तब्दील होने तक।
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हाशिया...

खींच दी है एक लकीर, दरमियां अजीज़ के हाशिए में होता रहे हिसाब हासिल का साबुत बचा रहे रिश्ता ऐतबार का....... फोटो सौजन्य- shlom schultz
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हम क्रांतिकारी नहीं थे

आर चेतनक्रांति चेतन हमारे दोस्त हैं और हिंदी की युवा पीढ़ी के सबसे ऊर्जावान कवियों में से एक हैं. उनकी कविता विचार के क्लीशे को पार करते हुए हर तरह की जड़ता का विरोध करती है. वो गलत समझ लिए जाने की हद तक जाते हुए साहस का परिचय देते हैं. हड़बड़ी में फ
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उम्र से डरती लड़की

नारियल रखा था लेकिन उसके पैदा होते ही माता-पिता ने फोड़ना चाहा अपना माथा बचपन की त्वचा पर घिसा किसी रिश्तेदार का तनाव कैशोर्य में हर महीने फूटने वाले ख़ून के सोतों को माना गया अपवित्र उनकी अंदरूनी हलचल में डोलती रही एक दुनिया हक़ीकत से जूझने में काम
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रिश्ता

तुम मुझे अच्छी लगी मैंने चाहा कि तुम्हारी सद्इच्छाएं मुझे मिलें तुम मुझे बहन की तरह लगी. तुम मुझे अच्छी लगी मैंने चाहा कि तुम्हारे कांपते ओठों को चूम लूं तुम मुझे प्रेमिका की तरह लगी तुम मुझे बहुत अच्छी लगी मैंने तुम्हें ना कभी बहन कहा, ना कहा प्रेमि
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एक शाम मंगलेश डबराल की कविताओं के नाम

भारत रंग महोत्सव के दौरान एक शाम मंगलेश डबराल की कविताओं के नाम रही. राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ने उन्हें ख़ास तौर पर कविता पाठ के लिए बुलाया था. कुछ कविताएं मंगलेश जी ने ख़ुद पढ़ीं और कुछ एनएसडी पास-आउट अभिनेता रामजी बाली ने. उनमें से दो कविताएं पेश ह
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वक़्त

बैठे-बैठे सोचते रहे कि अब वक़्त को यूं ही नहीं जाने देंगे जब हम कुछ करने के लिए खड़े हुए तो वक़्त जा चुका था
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वो जाने वाले हो सके तो...

सवा तीन महीने। काफी लंबा वक्त होता है सवा तीन महीने। इतने वक्त में बहुत कुछ बदल जाता है। इतने वक्त में सिर्फ किसी व्यक्ति ही नहीं बल्कि पूरे के पूरे देश की तकदीर बदल सकती है। इस दौरान देश में चुनावी बिगुल बज गया। पहले चरण का वोट भी कल पड़ना है। जुबान
 
Satyendra Prasad Srivastava
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कवि हरिभजन सिंह की कविताएं

-अनुवाद: गगन गिल अँधेरी रात में जिस हाथ ने सुलगता जिस्म तुम्हारा छू लिया है वही हाथ सुलगता है अग्नि के कुंड में से जो चुल्लू भरा था आचमन के लिए मैंने न उसे अचव ही सका न उसे गिरा ही सका पहली बार मेरे जिस्म की सारी दरारें बेबस लगती हैं कोई जल है जो टपकता
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कवि हरिभजन सिंह की कविताएं

दीवार: कहीं कोई दीवार उभर रही है चुपचाप, अचेत, अदृश्य देह को सहला-सहला जाती पौष-माघ की धूप जितना भी खटका नहीं उसका दबे पाँव चली आती मौत जितना भी सन्देह नहीं उस पर लेकिन कोई दीवार उभर रही है ज़रूर…. -अनुवाद: मनजीत कौर भाटिया दीवार कहीं कोई दीवार उभर
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हम ज़मीन हैं : अष्टभुजा शुक्ल की कविता

अष्टभुजा शुक्ल  हमारे ऊपर है एक मोटरसाइकिल उसके ऊपर एक मारूति कार उसके ऊपर वायुयान और हम पदाति हैं हमारे ऊपर है एक चौकीदार उसके ऊपर सिपाही उसके ऊपर दरोगा उसके ऊपर कप्तान उसके ऊपर गृहमंत्री और हम अपराधी हैं हमारे ऊपर है ग्राम प्रधान उसके ऊपर विधा
 
Reyaz-ul-haque
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कविता रचती स्त्री

साथी रणेंद्र की कुछ कविताएँ आपने पहले पढ़ी हैं. एक कविता और.  आकाशगंगा संग अन्तरिक्ष में नाचते हैं शब्द अपने आत्मा की उजास और रक्त के ताप से करती है उनका आह्वाहन उसकी ही जटाओं में अवतरित होती है शब्द-भागीरथी जिन्हे हौले से पृथ्वी पर सजा देती है व
 
Reyaz-ul-haque
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अब वे खाकी से रंगेंगे पूरा कैनवास : साथी रणेंद्र की कविताएँ खाकी से रंगेगे अब वे खाकी से रंगेगे पूरा कैनवास : साथी रणेन्द्र की कविताएँ

साथी रणेंद्र की इन कविताओं को पढ़ते वक्त हम उत्पीडन और फासीवाद की उन वैश्विक परम्पराओं से रू-ब-रू होते हैं जो हमारी सत्ता के ज़रिये हम तक भी पहुँच रही है, और हमें इदी अमीन जैसा किसी को चुनने पर हर पांच साल पर विवश होना पड़ता है. पढ़िए इन कविताओं क
 
Reyaz-ul-haque
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एक दिन बस स्‍टॉप पर

एक ही शहर में बहुत दिनों तक गुम रहने के बाददोनों मिलेमिले तो मीठा कुछ, ठंडा कुछ, कुछ गरम गरमउनके भीतर बहुत कुछ घटाउबलाफिर वे उसी तरह बात करते घूमते रहेगलियों में जैसे बचपन की गलियों में जा पहुंचे होंगली जहां मुड्ती है उसी जगह घर है उनकाजहां लौट सकते
 
लाल बहादुर ओझा
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तुम्हारी और मेरी आवाज़

तुम्हारी आवाज़,आज तुमने मुझसे पूछा कि मुझे तुम्हारी आवाज़ कैसी लगती है,तो सुनो, तुम्हारी आवाज़ मुझे दुनिया की सबसे मीठी आवाज़ लगती है,जब जब तुम बोलती हो,खाना बन गया है,तुम आराम करो,लाओ मैं तुम्हारे पैर दबा दूं,मुझे लगता है की मेरे कानों में शहद घोल रही हो
 
अभिनव
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एक कविता - “आमार शोनार बांगला”

गूँजा था वन्दे मातरम का गान जहाँ से, गुरूदेव ने दी थी हमें पहचान जहाँ से, ये शस्य श्यामला, विवेकानंद की धरती, साहित्य में डूबी है शरदचंद्र की धरती, चैतन्य महाप्रभु के अदभुत प्रकाश ने, हमको दिखाई राह जहाँ थी सुभाष ने, उड़ती हैं खुशबुएं जहाँ गंगा की छाँव
 
अभिनव
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एक कविता - सूर्य, ग्रहण और मानव

मिहिर, भानु, आदित्य, दिवाकर,दिनकर, रवि, मार्तंड, प्रभाकर,पद्मिनिकांत, दिव्यांशु, नभश्चर,अरणी, द्युम्न, अवनीश, विभाकरआदिदेव, ग्रहराज, दिवामणि,छायानाथ, अरुण, कालेश,ध्वान्तशत्रु, भूताक्ष, त्रयीतन,वेदोदय, तिमिरहर, दिनेश,पुष्कर, अंशुमाली, प्रत्यूष,सूर्य देव
 
अभिनव
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इनका रूप संवर सकता है

एक बार लखनऊ से इलाहबाद जाते समय एक मजदूरनी सामने आ कर बैठ गयी. उसे आस पास के सभी लोगों नें बड़ी हेय दृष्टि से देखा और सब थोडा थोडा सरक गए. न जाने तभी कहाँ से ये भाव उड़ते हुए आये और काग़ज़ पर उतर गए.   इनका रूप संवर सकता है   अगर शुष्कता से
 
अभिनव