पसंद करें
8
नापसंद करें

सर्द मुस्कान

एक   साझा  नज़्म....कभी कभी कुछ रचनाएँ मुक्कमल होती हैं जुगलबंदी से.....आज की  यह नज़्म भी एक ऐसी ही जुगलबंदी है...मैंने नज़्म ड्राफ्ट की ही थी कि शिखा (वार्ष्णेय ) Online दिखाई  दे गयी...बस मैंने यह नज़्म उसको भेज
 
sangeeta swarup
पसंद करें
4
नापसंद करें

लेखनी को चाहिए अब अंगार

मच   रहा  है चहुँ ओर हाहाकार लेखनी को चाहिए अब  अंगार एक धमाके से कितनी ही जाने हो  रहीं  निसार और कान में तेल दिए बैठी  है सरकार अपने ही कर रहे पीठ  पीछे
 
sangeeta swarup
पसंद करें
6
नापसंद करें

रचयिता सृष्टि की

माँ के गर्भ में साँस लेते हुए मैं खुश हूँ बहुतमेरा आस्तित्व आ चुका है बस प्रादुर्भाव होना बाकी है। मैं माँ की कोख से ही इस दुनिया को देख पाती हूँ पर माँ - बाबा की बातें समझ नही पाती हूँ माँ मेरी सहमी रहती हैं और बाबा मेरे खामोशबस एक ही प्रश्न उठता है
 
sangeeta swarup
पसंद करें
3
नापसंद करें

मात्र एक डोर

कल्पना की पतंग सोच की डोर  से बाँधउड़ा  दी थी  मैंनेअनंत में | पर  तुम्हारीसोच के मांझे नेकाट दी थीमेरी डोरधराशायी  होते हुएपतंग मेरीअटक गयी थीसमाज रुपीबिजली के तारों में              
 
sangeeta swarup
पसंद करें
2
नापसंद करें

कैसे मन मुस्काए

रोटी समझ चाँद को बच्चा मन ही मन ललचाएआशा भरकर वो यह देखेमाँ कब रोटी लाएदशा देखकर उस बच्चे कीकैसे मन मुस्काए | घर के बाहरचलना दूभरसाँस सभी कीनीचे ऊपरकाँप रहाउसका दिल थर-थरमन बेहद घबरायेऐसे आतंकी साये मेंकैसे मन मुस्काए | हुआ धमाकाबम का
 
sangeeta swarup
पसंद करें
2
नापसंद करें

एक नया अंदाज़

बहुत दिनों से कुछ लिखा नहीं जा रहा....बस  लगता है कि कुछ लिख ही नहीं पाउंगी...मन में आये भावों को कुछ टूटे शब्द दिए हैं....शायद फिर से कुछ लिख पाऊं ....मन की बेचैनियों ने क़तर दिए हैं पंख मेरी कल्पना के उड़ने की सारी कोशिशें नाकाम हो रही हैं दिखता है
 
sangeeta swarup