सर्द मुस्कान
एक साझा नज़्म....कभी कभी कुछ रचनाएँ मुक्कमल होती हैं जुगलबंदी से.....आज की यह नज़्म भी एक ऐसी ही जुगलबंदी है...मैंने नज़्म ड्राफ्ट की ही थी कि शिखा (वार्ष्णेय ) Online दिखाई दे गयी...बस मैंने यह नज़्म उसको भेज
May 26 2010 06:20 PM



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