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रूप की आभा

रूप की आभा दिसंबर के १७ वें दिन सायं जब लन्दन में इस वर्ष का पहला हिमपात प्रारम्भ हुआ तो १८ की प्रातः तुरंत अपने कैमरे से उसके चित्र लेने और उन्हें संजोने तक का विवरण मैंने अपने संस्मरण रूप से स्निग्ध हुई प्रकृति और जीवन के एकाकार क्षण शीर्षक से लिखा
 
कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee
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स्त्रीदेह : कितनी ढँके, कितनी उघड़े

ये पोस्ट दुबारा डाली जा रही हैं क्युकी पिछले लिंक मे कुछ हिस्सा गार्ब्ल हो गया हैं स्त्रीदेह : कितनी ढँके, कितनी उघड़े कविता वाचक्नवी गत दिनों स्त्री के वस्त्रों के अनुपात से उसके चरित्र की पैमाईश करने वाले कई प्रसंग उठते रहे हैं और स्त्री के वस्त्रों
 
कविता वाचक्नवी