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'कविता इक लिख लेता हूँ'

घुमड़ता है जो भी दिल में,वो कहाँ भला सब कहता हूँ,कभी बोलने से उकता जाता,कभी कहने से डरता हूँ,कभी शब्द सही न मिल पायें,कभी मौके कहीं फिसल जाएँ,तब बातों को मन ही में,स्याही सा भर लेता हूँ,एकांत में इनके छींटों से,कविता इक लिख लेता हूँ,कुछ बातो को बोलना
 
Yogesh Sharma