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बस कर जी

रचना: बाबा बुल्ले शाह स्वर: पूरण चन्द्र वडाली और प्यारेलाल वडाली (वडाली बन्धु) बस कर जी हुण बस कर जी, इक बात असाँ नाल हँस कर जी तुसीं दिल मेरे विच वसदे हो, एवें साथों दूर क्यों नसदे हो नाले घत जादू दिल खसदे हो, हुण कित वल जासो नस कर जी बस कर जी हुण ब
 
अंकुर वर्मा
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ख़ुमार बाराबंकवी की कुछ ग़ज़लें…

ख़ुमार बाराबंकवी हम उन्हें वो हमें भुला बैठे… ऐसा नहीं के उनसे मुहब्बत नहीं रही… एक पल में एक सदी का मज़ा हम से पूछिये… वो हमें जिस कदर आजमाते रहे… Posted in कला और संगीत
 
अंकुर वर्मा