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आंच पर हाइकु

हरीश प्रकाश गुप्त के हाइकु -- करण समस्तीपुरी हाइकु हिंदी साहित्य में अभिनव आयातित पद्य विधा है। यह जापान से बरास्ते अंग्रेजी भारत आयी है। हाइकु का उद्गम स्थल जापान है। जापान में सतरहवी शताब्दी में 5-7-5 नाद वाले तीन पंक्तियों की कविता लिखने का प्रचलन
 
मनोज कुमार
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देसिल बयना - 34 : पूत सपूत तो का धन संचय....

-- करण समस्तीपुरी राम-राम ! अरे ई दुनिया का है ? वृथा मोह-माया है। आदमी भौतिक सुख-सुविधा के पाछे रन-रन करते रहता है। कौनो-कौनो आदमी के लिए तो धने संपत्ति सबस बड़का चीज होता है। मगर लालटेन प्रसाद ऐसन में से नहीं थे। थोड़ा-बहुत मरौसी (पुर्वजी) जायदाद था,
 
करण समस्तीपुरी
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निःशब्द नीड़

निःशब्द नीड़ -- करण समस्तीपुरी दिन भर दूर नीड़ से श्रम कर,चना-चबेना दाना चुन कर,सांझ पड़े खग आया थक कर,किन्तु यहाँ क्या पाया ?नीड़ देख निःशब्द,विहग का उर आतुर घबराया !!क्षुधा तृषित क्या सो गए परिजन,या फिर से आया कोई रावण ?पड़ीं नीड़ पर बाज की छाया,या
 
करण समस्तीपुरी
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मनोज

पिछली किश्तों में आप पढ़ चुके हैं, 'कैसे रामदुलारी तमाम विरोध और विषमताओंकेबावजूद पटना आकर स्नातकोत्तर तक पढाई करती है। बिहार के साहित्यिक गलियारे मेंउसका दखल शुरू ही होता है कि वह गाँव लौट जाती है। फिर सी.पी.डब्ल्यू.डी. केअभियंताबांके बिहारी से परिणय
 
करण समस्तीपुरी
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देसिल बयना - 33 : हुआ ब्याह करेगा क्या...

-- करण समस्तीपुरी राम-राम ! उफ़... ! गाँव दिश तो बड़ी गर्मी है। हालांकि पले-बढे तो वही में मगर अब उ बात तो रहा नहीं न.... ! सुनते हैं, गिलोबल वारमिन (ग्लोबल वार्मिंग) गांवो तक पहुँच गया। पहुंचेगा नहीं.... ? ससुर गाछ-विरिछ सब काट दिहिस, माटी-भित्ति, चार-फूस
 
करण समस्तीपुरी
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मन हो गया उदास

मन हो गया उदास -- करण समस्तीपुरी बहुत दिनों के बाद नहीं हो जब तुम मेरे पास !बहुत दिनों के बाद आज फिर मन हो गया उदास !! जान रहा हूँ मैं भी है यह बस कुछ दिन की बात,पर दिन लम्बा लगता तुम बिन, लम्बी लगती रात !पल-पल काट रहा मुझको खालीपन का अहसास,बहुत दिनों के
 
करण समस्तीपुरी
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देसिल बयना - 32 : घर में आग लगे, भर घर इजोत

-- करण समस्तीपुरी बाप रे बाप ! ओह... !! उ साल भी ऐसने झरकल (जला हुआ) गर्मी पड़ रहा था। किरिन के साथे लू चलने लगता था। लोग गोसाईं उगने से पहिलही मुंग-उंग तुडवा के घर पकर लेते थे। मगर घरो में का चैन था... ! घैला का पानी भी लगता था घुर पर चढ़ा के लाया है। उहो
 
करण समस्तीपुरी
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पूछ मत आज मुझसे ये क्या हो गया... !

कोई चिराग नहीं है, मगर उजाला है ! ग़ज़ल की शाख पे इक फूल खिलने वाला है !! मित्रों ! काव्य-प्रसून में आज आपके पेश-ए-खिदमत है एक ग़ज़ल ! -- करण समस्तीपुरी पूछ मत आज मुझसे ये क्या हो गया !जिस्म से जान बिल्कुल जुदा हो गया !!आँख की रोशनी छिन गयी आंख से,जो न
 
करण समस्तीपुरी
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त्यागपत्र : भाग 29

पिछली किश्तों में आप पढ़ चुके हैं, 'कैसे रामदुलारी तमाम विरोध और विषमताओं के बावजूद पटना आकर स्नातकोत्तर तक पढाई करती है। बिहार के साहित्यिक गलियारे में उसका दखल शुरू ही होता है कि वह गाँव लौट जाती है। फिर सी.पी.डब्ल्यू.डी. के अभियंता बांके बिहारी से
 
मनोज कुमार
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देसिल बयना - 31 : बूरे वंश कबीर के उपजे पूत कमाल

-- करण समस्तीपुरी गाँव-घर में एगो फकरा बड़ा प्रचलित है, 'कबीर दास के उलटे वाणी ! आँगन सूखा, भर घर पानी !!' लेकिन जो कहिये कबीर दास का सब बाते अजगुत (अद्भुत ) होता था। जो बोल दिए उका अर्थ अद्भुत ही होगा। एक बात था, कबीर दास फाकमस्ती में जीए मगर कौनो
 
करण समस्तीपुरी
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देसिल बयना - 30 : गोनू झा की गाय नहीं बलाय

-- करण समस्तीपुरी चलिए बहुत दिन हो गया, आज आपको मिथिला धाम घुमा देते हैं। यही मिथिलांचल में एगो गाँव है भरवारा। हे... ई देख रहे हैं न पोखर के भीर.... हे... ऊ.... उंचा डीह... वही है न गोनू झा का घर। गोनू झा तो अब रहे नहीं मगर उनका किस्सा सब एक पर एक है।
 
करण समस्तीपुरी
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क्या अँधा के जागे और क्या अंधा के सोये... !!

-- करण समस्तीपुरी रे भैय्या, आल इज वेल........ ! उधर है न आल इज वेल.... ? इधर तो कुच्छो वेल नहीं है। समझो कि दरोगा जी, चोरी हो गयी। घोर-कलियुग आ गया है। सतयुग में तो सब ठीके-ठाक चल रहा था। त्रेता में रावण रामजी की लुगाई चुरा ले गया.... । द्वापर में तो
 
मनोज कुमार
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मन का पंछी उड़ना चाहे

आज फिर एक सूफी गीत -- करण समस्तीपुरीमन का पंछी उड़ना चाहे,लेकिन उड़ ना पाये !हाय !किसको दर्द सुनाये !!कतरे गए पंख कोमल औरआँखें हैं धुंधलाई !धुंधली आंखो में सतरंगी,सपने बहुत छुपाये !!हाय !किसको दर्द सुनाये !!कहाँ बसेरा, कहाँ ठिकाना,किस पथ से किस नभ को जाना
 
करण समस्तीपुरी
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त्यागपत्र : 26

पिछली किश्तों में आप पढ़ चुके हैं, "राघोपुर की रामदुलारी का परिवार के विरोध केबावजूद बाबा की आज्ञा से पटना विश्वविद्यालय आना ! रुचिरा-समीर और प्रकाश की दोस्ती! फिर पटना की उभरती हुई साहित्यिक सख्सियत ! गाँव में रामदुलारी के खुले विचारोंकी कटु-चर्चा !
 
करण समस्तीपुरी
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देसिल बयना - 28 : जिसके लिए रोएँ उसके आँख में आंसू ही नहीं...

-- करण समस्तीपुरी "आह.... भगवान करे, यजमान बढे ! दही-चूरा पर हाथ चले !! आज हमरा मन एकदम तिरपित है। बाते ऐसन है कि सुन कर आपका भी मन थई-थई हो जाएगा। जुलमी काका याद हैं न... ! उनके बड़का बेटा बकरचन भैय्या... ? गए दिनों उनकी बारात गए रहे। वैसे नाम तो जुलमी
 
करण समस्तीपुरी
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त्याग पत्र -- 24

पिछली किश्तों में आप पढ़ चुके हैं, "राघोपुर की रामदुलारी का परिवार के विरोध के बावजूद बाबा की आज्ञा से पटना विश्वविद्यालय आना ! रुचिरा-समीर और प्रकाश की दोस्ती ! फिर पटना की उभरती हुई साहित्यिक सख्सियत ! गाँव में रामदुलारी के खुले विचारों की कटु-चर्चा !
 
करण समस्तीपुरी
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देसिल बयना - 27 : गोद का बच्चा डूबा जाए..... !

-- करण समस्तीपुरीमार बढ़नी............ एहन-एहन टोटमा (झार-फूँक) के। ई कौनो बात हुआ.... ? हमारा तो देह झरकता है..... ऐसन-ऐसन बात से। धत तोरी के....... हम दुआ-सलाम भी भूल गए पित्त के मारे। राम-राम !! आप भी का कहते होंगे कैसन भुच गंवार है...... ! उ दिन का
 
करण समस्तीपुरी
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कब आयेगी बेला मिलन की ….?

कब आयेगी बेला मिलन की ….?परम प्रिय परमात्मा से विलग जीव, जग-जंजाल में उलझा तो रहता है, किन्तु प्रियतम से मिलन के लिए आत्मा की आकुलता कभी कम नहीं होती! इसी भाव को संजोये प्रस्तुत है, एक सूफी गीत! आपकी प्रतिक्रया ही हमारी रचनात्मक ऊर्जा का इंधन है, इतना
 
मनोज कुमार
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देसिल बयना-26 : : गयी जवानी फिर नहीं लौटे !

गयी जवानी फिर नहीं लौटे !-- करण समस्तीपुरी हा.....हा....हा..... आ....हा.... हा...हा......... ! अरे बाप रे बाप ! आज भोरे-भोर ऐसन दिरिस देखे कि का बताएं......... एँ.... हें...हें...हें..... ! बाप रे बाप...... अभी तक हंसी नहीं रुक रही है..... एँ....
 
मनोज कुमार
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देसिल बयना 25 : न तोको ना मोको .....

-- करण समस्तीपुरी अरे बाप रे बाप........ उ दिन जे बघुअरा वाली और चमनपुर वाली के बीच 'महाभारत' हो रहा था..... ! ऊँह पूछिये मत। केतना दिन बाद ऐसन-ऐसन आशीर्वाद सुने कि मन तृप्त हो गया। अब आप पूछेंगे कि ये बघुअरा वाली कौन है ? अरे उका पहिचाने नहीं... ? वही
 
करण समस्तीपुरी
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किसे सुनाऊं अपने गीत

200* नॉट-आउट। वाह.......... क्लब 200 में सचिन के साथ हम भी शामिल हो गए। ब्लॉग-सदस्यों को बधाई, पाठकों, समीक्षकों, शुभचिंतकों का आभार.... !! मित्रों ! कभी अंतरजाल का बाउंसर तो कभी पाठकों की गुगली झेलते हुए ब्लॉग-प्रविष्टि का दोहरा शतक हमने पार तो कर
 
करण समस्तीपुरी
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त्यागपत्र : भाग 21

पिछली किश्तों में आप पढ़ चुके हैं, "राघोपुर की रामदुलारी का परिवार के विरोध के बावजूद बाबा की आज्ञा से पटना विश्वविद्यालय आना ! रुचिरा-समीर और प्रकाश की दोस्ती ! फिर पटना की उभरती हुई साहित्यिक सख्सियत ! गाँव में रामदुलारी के खुले विचारों की कटु-चर्चा !
 
करण समस्तीपुरी
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देसिल बयना 24 : जल नहीं जाए जीभ

-- करण समस्तीपुरी "धन्य दरभंगा.... दोहरी अंगा...... काहे नाच रहे हैं नंगा.... !! हो... ओ... ओ.... धन्य दरभंगा.... दोहरी अंगा...... काहे नाच रहे हैं नंगा..... !! उ दिन लहरू भाई साइकिल के घंटी पर ताल मिलाते हुए लहर छोड़ के गा रहे थे। लहरू भाई को पहिचाने
 
करण समस्तीपुरी
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देसिल बयना 23 : मार खाई पीठिया......

-- करण समस्तीपुरी जय हो ! जय हो !! भये प्रकट किरपाला..... दीन-दयाला कौसल्या हितकारी........... !!! बधाई हो रामनवमी का त्यौहार !!! अरे राम नवमी से याद आया......... ओह ! कहाँ गया उ दिन ! हाथ-पैर से होली का रंग छूटा नहीं कि जुट जाते थे रामनवमी के तैय्यारी
 
करण समस्तीपुरी
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देसिल बयना 22 : दिहैं तो कपाल....

-- करण समस्तीपुरी जय राम जी की !सोचते-सोचते बुध का सांझ हो गया और हम अभी तक सोचिये रहे हैं कि देसिल बयना में आज आप लोगों के सामने का लेके हाज़िर होएं.... काहे कि आप तो पाठक लोग राजा हैं और कहावत है, "राजा-जोगी-पेखना (मेला) ! खाली हाथ न देखना !!" सो हाथ
 
करण समस्तीपुरी
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देसिल बयना 21 : तेल बनावे तिमना.....

-- करण समस्तीपुरी ई बार फगुआ में घर गए तो चमकी मौसी के घर बेनीपुर भी घूम आये। इस्कूल में कुछो के छुट्टी मिले कि हम सीधे बेनिपुरिया रास्ता पकड़ लेते थे। शीत भैय्या के बियाह में तो चार महीना तक हम बेनियेपुर में रहे थे। फागुन में गए सो गर्मी-तांतिल
 
करण समस्तीपुरी
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देसिल बयना - 20 : बिना ब्याहे घर नहीं लौटे..... !

-- -- करण समस्तीपुरी जय हो ! जनता-जनार्दन !! कैसन रही होली ? सब कुशल है ना.... ? अरे मरदे का बताएं.... हमरे होली में तो ऐसन गुलाल उड़ा कि जिनगी भर नहीं भूलेंगे। बड़ी शौक से गए रहे गाँव होली खेले.... लेकिन वही हो गया, 'शौक में सोहारी [रोटी] ! आलू बैगन के
 
करण समस्तीपुरी
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यह होली सचमुच होली थी

ऊन्न्ह्ह............... !!!!सज्जनों एवं सजनियों,राम-राम !!!ऊंन्ह्ह्ह......... कल होली थी और आज धुलेंदी......... ! खुम्हारी अभी भी नहीं टूट रही है ! ब्लॉग पर कुछ तो लिखना है..... तो पढ़िए क्या हुआ होली में..... कैसी रही होली ?-- करण समस्तीपुरी यह होली
 
करण समस्तीपुरी
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देसिल बयना 19 : घर भर देवर.....

-- करण समस्तीपुरी है जोगीरा..... सा.....रा....रा...रा..... जोगीरा...... सा....रा....रा.....रा.....रा..... ! भैय्या रे होली है...... ! भैय्या रे होली है... !! "अरे ! हल्ला गुल्ला शांत करो, सुनो हमारी वाणी जी ! वाह जी वाह... ! देसिल बयना में कहता हूँ अपने
 
करण समस्तीपुरी
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देसिल बयना 18 : वर हुआ बुद्धू दहेज़ कौन ले....

पछिला हफ्ता तो खूब धम-कुच उड़ा। शहर में भोलंटाइन बाबा का मेला लगा रहा तो गाँव में भोला बाबा का। हम तो शहर से देखना शुरू किये और गाँव तक पहुँच गए। मिसरिया बाबा के मठ पर खूब धूम-धाम से शिवरात हुआ। शिवजी का बरातियो निकला था। पंडौल के पंडी जी आये रहे माधो
 
करण समस्तीपुरी
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किस अधर का गीत हूँ मैं

-- करण समस्तीपुरी किस अधर का गीत हूँ मैं ?जान पाया मैं नहीं,किस साज का संगीत हूँ मैं??किस अधर का गीत हूँ मैं ??***किस भाव की अभिव्यक्ति हूँ,किस भाव में अनुरक्ति हूँ,किसी तप्त उर का उच्छवास,या तृषित मन की प्यास हूँ मैं!जान पाया मैं नहीं,किस हृदय का प्रीत
 
करण समस्तीपुरी
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देसिल बयना भाग 16 : तेल जले तेली का आँख फटे मशालची का

-- करण समस्तीपुरीजय हो ! जय हो.... !! आप सोच रहे होंगे हम इत्ता फुदक काहे रहे हैं.... ? वजह वाजीब है। खरमास गया। अरे बाप रे बाप... ! ई बार जो शीतलहरी पड़ा है, पूछिये मत। एक पन्द्रहिया तो पते नहीं लगा कि दिन है कि रात। गोसाइयों बाबा दुपहर में एक घड़ी के
 
करण समस्तीपुरी
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स्वागत बसंत

-- करण समस्तीपुरीस्वागत ! स्वागत !! स्वागत बसंत !!!हे प्रेमपुँज ! हे आश रूप !!ऋतुपति ! तेरी सुषुमा अनंत !!स्वागत ! स्वागत !! स्वागत बसंत !!!कानन की कांति के क्या कहने !किसलय-कली-कुसुम बने गहने !!अवनी सूचि पीत सुमन पहने !मानो, विधि की रचना जीवंत !!स्वागत
 
करण समस्तीपुरी
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देसिल बयना - 15 : छौरा मालिक बूढा दीवान

-- करण समस्तीपुरी राम राम हजूर ! हमका भूले तो नहीं... ? हमका भूले तो भूले.... आज बुधवार है, सो याद है न...... !! बुध याद है तो देसिल बयना भी यादे होगा... हमका भूलियो गए तो कौनो बात नहीं। उ का है कि हम पिछले पख में अपने गाँव गए रहे। रेवा-खंड। अब गाँव का
 
करण समस्तीपुरी
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देसिल बयना - 14 : भला नाम ठिठपाल

-- करण समस्तीपुरी ऊँह...ऊँह....... जय हो महाराज की ! ओह रे ओह... ! आज तो मुढ़ी, लाई, तिल आ गुड़ की सोंधी सुगंध से चारो दिशाएँ ग़म-ग़म कर रही हैं। रवि का फसल निकल आया था। अबकी बार इन्दर महराज धोखा दे दिए। पटवन तो अब विश्कर्मे बाबा के भरोसे है। पोर भर का
 
करण समस्तीपुरी
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देसिल बयना - 13 : मान घटे जहँ नित्यहि जाय।

-- करण समस्तीपुरी जय राम जी के हजूर ! नया साल मंगलमय हो! देखिये, हँसते-बोलते नया साल का हफ्ता भी लगने वाला है। सच्चे समय बीतते कौनो देरी नहीं लगता है। देखिये खखोरने काका को। अभी कुछे साल पहिले क्या करक्का जवानी था। चौरस सीना पर कोठारी गंजी और हाथ में
 
करण समस्तीपुरी
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देसिल बयना - 11 : बिना बुलाये कोहबर गए

करण समस्तीपुरी हा ... हा ... हा ... ! हा ... हा ... हा .. हा ... !! आ ... हा .. हा ... हा ... हा ......... !!! अरे बाप रे बाप ! हा ... हा ... हा ... !!!! बुध का सांझ हो गया । आप लोग भी देसिल बयना का इंतिजार कर रहे होंगे ..... ! हा ... हा ... हा ....
 
करण समस्तीपुरी
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स्मृति शिखर से

करण समस्तीपुरी स्मृति शिखर से चला प्रखर, वह मधुर पवन, वह मुखर पवन ! उर सिहर गया क्षण ठहर गया, और अतीत बना दर्पण !! स्मृति शिखर से चला प्रखर, वह मधुर पवन, वह मुखर पवन ! कर यत्न दिया विश्राम इसे ! पीड़ा उर की बतलाऊं किसे !! यह काल आवरण ओढ़ परी ! स्मरण
 
करण समस्तीपुरी
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देसिल बयना - 10 : मियाँ बीवी के झगड़ा !

जय हो, पाठक वृन्द ! मान गए साहिब आपको ! एक तो बुध आते ही हम सुध खो देते हैं और महराज आप भी सब कुछ भुला कर देसिल बयना का बाट जोहते रहते है। ई सब आपका प्रेम ही है नहीं तो आज तो हमरा मूडे ऑफ था। अब आप आ गए हैं तो आपको एगो देसिल बयना सुना देते हैं। बंकिय
 
करण समस्तीपुरी
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जीवन पथ पर

करण समस्तीपुरी मैं जीवन पथ पर चल-चल कर, क्यूँ बार-बार रुक जाता हूँ ? है कोई शक्ति अदृश्य कि मैं, उसके आगे झुक जाता हूँ ?? मैं जीवन पथ पर...... !! क्या इस पथ का उद्देश्य भला ? मैं क्यूँ इस पथ पर आन चला ?? आगे का पथ है ज्ञात नहीं ! कोई पथ-प्रदर्शक साथ
 
करण समस्तीपुरी