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कार्ल मार्क्स
" धार्मिक पीड़ा, एक ही समय में, वास्तविक पीड़ा की ही अभिव्यक्ति है और वास्तविक पीड़ा के खिलाफ प्रतिरोध है. दबे-कुचले जीव की सिसकारी है धर्म, निर्दयी दुनिया का हृदय, और आत्माविहीन परिस्थितियों की आत्मा. यह लोगों के लिए अफीम है."
Shaheed Bhagat Singh Vichar Manch, Santnagar
May 05 2010 05:06 AM



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