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कार्ल मार्क्स

" धार्मिक पीड़ा, एक ही समय में, वास्तविक पीड़ा की ही अभिव्यक्ति है और वास्तविक पीड़ा के खिलाफ प्रतिरोध है. दबे-कुचले जीव की सिसकारी है धर्म, निर्दयी दुनिया का हृदय, और आत्माविहीन परिस्थितियों की आत्मा. यह लोगों के लिए अफीम है."
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अंतरराष्ट्रीय नारी दिवस पर विशेष

स्वतन्त्रता का अर्थ असामाजिक स्वच्छंदता और पुरुष के शोषण से मुक्ति का अर्थ "यौन मुक्ति" नहीं होता, यह कम्युनिस्ट नैतिकता और विज्ञान के विरुद्ध है -- इसे लेनिन ने एकाधिक बार स्पष्ट किया. : विश्व ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में नारी मुक्ति का प्रश्न और समकालीन
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जाना ज्योति बाबू का

यह ब्लॉग 'जो आता है उसको जाना है' टाइप का शाश्वत ज्ञान देने के लिए नहीं है। मुझे पता है कि एक बार कंप्लीट लाइफ सपोर्ट सिस्टम (जिसमें दिल, फेफड़े और शरीर के बाकी अंगों को मशीन के सहारे जिंदा रखा जाता है) पर जाने के बाद कम ही लोग वापस लौटते हैं। ज्योति
 
शिवेंद्र चौहान
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जाना ज्योति बाबू का

यह ब्लॉग 'जो आता है उसको जाना है' टाइप का शाश्वत ज्ञान देने के लिए नहीं है। मुझे पता है कि एक बार कंप्लीट लाइफ सपोर्ट सिस्टम (जिसमें दिल, फेफड़े और शरीर के बाकी अंगों को मशीन के सहारे जिंदा रखा जाता है) पर जाने के बाद कम ही लोग वापस लौटते हैं। ज्योति
 
शिवेंद्र चौहान
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कम्युनिस्ट होने का मतलब

ब्रेख्त कम्युनिस्ट थे, क्योंकि उनके लिए कम्युनिस्ट होने के मानी बहुत सहज थे- समकालीन होना. दूसरे शब्दों में अपने निजी घेरे के बाहर उन सब आवाजों का साक्षी होना, जो बीसवीं सदी के अंधेरे से टकराती हुई हमारे पास आती हैं.
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गोरखपुर और गुडगाँव के मजदूरों का दमन और बुद्धिजीवी वर्ग की चुप्पी

अगर मजदूरों की बुनियादी मांगों से संबंधित लडाई को लांछनात्मक तरीके से माओवादियों की घुसपैठ से जोड़ा जाता है तो क्या इससे वह ज़मीन तैयार नहीं होती जहाँ नक्सलवाद, माओवाद या और किसी भी प्रकार का वामपंथी या दक्षिणपंथी आतंकवाद न हो? जबकि गोरखपुर के ए .डी.
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आग्नेय अक्टूबर

अक्टूबर की रात को, लेनिन स्मोल्नी आ पहुँचे और उन्होंने खुद विद्रोह के संचालन का भार सँभाला। उस रातभर फौज के क्रान्तिकारी दस्ते और रेड गार्डों के जत्थे बराबर स्मोल्नी आते रहे। बोल्शेविकों ने शीतप्रासाद घेरने के लिए, जहाँ अस्थायी सरकार ने अपना अड्डा बन
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भगत सिंह, कम्युनिस्ट और गाँधी होने का मतलब

पूंजीपतियों के चाटुकार बुद्धिजीवियों द्वारा जानबूझकर परंतु कुछ पढ़े-लिखे लोगों द्वारा अनजाने में भावुकतावश यह प्रचारित किया जाता है कि गाँधी और भगत सिंह, दोनों आज़ादी के दीवाने थे. उनका मकसद इस देश को अंग्रेजी साम्राज्य से मुक्ति दिलाने तक सीमित था. ले
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कम्यनिस्ट और मजदूर वर्ग की पार्टियाँ

घोषणापत्र का यह वाक्य कि “कम्युनिस्ट मजदूर वर्ग की पार्टियों के बदले में अपनी कोई अलग पार्टी नहीं गठित करते हैं”, इस वक्त गलतफहमी प्रगट कर सकता है, बल्कि कुछ लोग तो इसका यही गलत अर्थ निकालते हैं कि मार्क्स और एंगेल्स सिद्धांतत: अलग कम्युन
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सर्वहारा आन्दोलन के अंतरराष्ट्रीय चरित्र का विकास और क्रांति

कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां “वर्ग विरोध पर आधारित समाज में शोषित वर्ग अनिवार्यत: विद्यमान रहता है. इसलिए शोषित वर्ग की मुक्ति से नए समाज का निर्माण होता है. शोषित वर्ग की मुक्ति के लिए आवश्यक है कि विद्य
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फासीवाद के 14 लक्षण

डा. लॉरेंस ब्रिट डा. लॉरेंस ब्रिट – एक राजनीतिक वैज्ञानिक जिन्होंने फासीवादी शासनों जैसे हिटलर (जर्मनी), मुसोलिनी (इटली ) फ्रेंको (स्पेन), सुहार्तो (इंडोनेशिया), और पिनोचेट (चिली) का अध्ययन किया और निम्नलिखित 14 लक्षणों की निशानदेही की है; 1. श
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स्वतंत्रता सेनानी और गदर पार्टी के आखिरी चिराग बाबा भगत सिंह बिलगा के निधन पर

स्वतंत्रता सेनानी और गदर पार्टी के आखिरी चिराग बाबा भगत सिंह बिलगा का शुक्रवार इंग्लैंड के बरमिंघम में एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। वे करीब 102 साल के थे और उनकी सेहत खराब होने के कारण उन्हें कुछ दिन पहले अस्पताल में दाखिल करवाया गया था।बाबा जी क
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यह तो भारतीय लोकतंत्र का चमत्कार है

यही भारतीय लोकतंत्र है, सभी गच्चा खा गए. खुशी की बात है कि महंगाई व आतंकवाद अब कोई मुद्दा नहीं रहे. शोराब्बुद्दीन के साथ साथ स्वीज बैंक भी खुश हो सकती है. एक अच्छी खबर जरूर है और वह है लाल झण्डों का कमजोर होना.
 
संजय बेंगाणी
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चुनावी नौटंकी का पटाक्षेप: अब सत्ता की कुत्ताघसीटी शुरू

जनता को सिर्फ यह तय करना है कि वह इसे कितना और बर्दाश्त करेगी! बिगुल डेस्क करीब डेढ़ महीने तक चली देशव्यापी चुनावी नौटंकी अब आख़िरी दौर में है। ‘बिगुल’ का यह अंक जब तक अधिकांश पाठकों के हाथों में पहुँचेगा तब तक चुनाव परिणाम घोषित हो चुके होंगे और दिल्ल
 
Shaheed Bhagat Singh Vichar Manch, Santnagar
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सलाम लोकतंत्र

मुझे अच्छा लग रहा था, बुश का एक सामान्य से विमान द्वारा विदा होना. नहीं, मुझे बुश से ऐसी कोई घृणा नहीं कि उनके जाने मात्र से खुशी होती हो.
 
संजय बेंगाणी