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विष्णु नागर की एक कविता

मेरा जीवननाक की दिशा में दौड़ाता हैकान, आँखसिर, मुँहकुछ नहींनाक की दिशा में दौड़हाथ, पाँवपेट, पीठकुछ नहींनाक की दिशा में दौड़पीठ की दिशा में अन्धकार हैपेट की दिशा में दौड़मेरा जीवन कहता हैनाक की दिशा में दौड़मेरा जीवन कहता हैक्या करता है?नाक की दिशा में
 
Ek ziddi dhun
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रोटी और तारे : ओक्तई रिफ़त

गोद में रखी है रोटी और सितारे बहुत दूर मैं अपनी रोटी खाता हूँ सितारों को तकते हुए ख़यालों में इस कदर गुम कि कभी कभी मैं गलती से खा जाता हूँ एक सितारा रोटी के बजाए (अनुवाद असद ज़ैदी का है. इसे ८० के दशक की पत्रिका कथ्य से लिया गया है जिसका सिर्फ एक अं
 
Ek ziddi dhun
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