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कंक्रीट के जंगलों में...!!!

कंक्रीट के जंगलों में ,इंसानियत खो गयी , इन्सान हो गये पत्थर के ,जिन्दगी कंक्रीट हो गयी । अब नही बहते आंसूं यहाँ ,किसी के लिए , इन पत्थरों के आंसूओं को, ये आदत हो गयी । ढूंढें से नही मिलती, जिन्दगी इन मकानों में , मतलब परस्ती यहाँ की, रिवायत हो गयी ।
 
कमलेश वर्मा