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गूंजअनुगूंज / GUNJANUGUNJ

आज फिर हम ओशो के एक प्रवचन से चुनी हुई कहानी को प्रस्तुत कर रहें हैं । यह कहानी दमन और संयम के सही अर्थ खोलती है । दमन एक संध्या दो भिक्षु किसी पहाड़ी नदी को पार करते थे । एक था वृद्ध संन्यासी, दूसरा युवा । वृद्ध आगे था, युवा पीछे । नदी तट पर एक युवती खड़ी
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गुरु को मारी लात

नौकर-चाकरों को कोई गौर से देखता है भला। नौकर चाकरों को आदमी भी मानता है? तुम अपने कमरे में बैठे हो, अख़बार पढ रहे हो, नौकर आकर गुजर जाता है, तुम ध्‍यान भी देते हो? नौकर से तुमने कभी नमस्‍कार भी की है? नौकर की गिनती तुम आदमी में थोड़ी  करते हो। नौकर
 
अन्तर सोहिल
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समझौता

"तुम लोगों को देखते हो -- वे दुखी हैं क्योंकि उन्होंने हर मामले में समझौता किया है, और वे खुद को माफ नहीं कर सकते कि उन्होंने समझौता किया है। वे जानते हैं कि वे साहस कर सकते थे लेकिन वे कायर सिद्ध हुए। अपनी नजरों में ही वे गिर गए, उनका आत्म सम्मान खो
 
सुभाष चन्द्र
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वह किताब, वह शास्त्र, वह संदेश सही होना चाहिये

मन की यह स्वाभाविक आकांक्षा होती है कि जो मैं मानता हूं, वही दूसरा भी मान ले। यह आकांक्षा क्यों होती है? यह आकांक्षा इसलिये होती है कि मुझे खुद भी भरोसा नहीं है, जो मैं मानता हूं उस पर। जब मैं दूसरे को भी राजी कर लेता हूं, तो थोडा भरोसा आता है। जब भीड
 
अन्तर सोहिल
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रजनीश: ओशो: एक्सप्लेण्ड

या ब्लॊगवर गेल्यावेळी रजनीशांबद्दल मी मुद्दामच एका ति-हाईताच्या नजरेने लिहिले आहे. तेच आताही करतो आहे. कितीही काही म्हटले तरी जगावर छाप पाडणा-या या व्यक्तिमत्वाच्या जीवनातील विसंगती स्वस्थ बसु देत नाही. तशी त्यांनी कधीच कोणत्याच गोष्टीत संगती ठेवली
 
यशवंत कुलकर्णी
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आचार्य रजनीश उर्फ़ भगवान श्री रजनीश उर्फ़ ओशो

रजनीश:ओशो नावाचं गारुड समजुन घेताना आपण स्वत:लाच हरवुन बसतो. रजनीशांची व्याख्याने किंवा साहित्य हे भोव-या सारखं आहे. ते तुम्हाला आकर्षीत करतं, गरगर फिरवतं, घेरी आणतं, तुम्ही आजवर वाहात राहीलेली ओझी फेकायला लावतं. त्यांची व्याख्याने किंवा साहित्य या फक्त
 
यशवंत कुलकर्णी
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ओशो के सम्बोधिं दिवस पर

21 मार्च 2010 ओशो के सम्बोधिं दिवस परवो ब्लैक होल साबुलाता रहा मुझे दूर सेऔर जब आकर्षित हुआ मै उसकी ओरनिचोड़ लिया उसने मुझेयापी गया था मैं उसे!गहन अथाह अन्धेरे के दूसरे सिरे परउसका दिव्य स्वरूप दिखाई दियाजिसमें अनंत विस्तार थामैं था या नहीं ??कुछ नहीं
 
SAMVEDANA KE SWAR
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मैं ही सही, क्योंकि तू गलत है

कुछ लोग खुद को सही, श्रेष्ठ, बेहतर साबित करने के लिये  बजाय अपनी उपलब्धि  बताने के ; दूसरे को गलत, निकृष्ट, कमतर साबित करने में अपनी सारी शक्ति और ऊर्जा लगा देते हैं। प्रत्येक को ऐसी प्रतीति हो सकती है कि जिस मार्ग पर मैं जा रहा हूं, वह सही है।
 
अन्तर सोहिल
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बहुत हो चुकी यह बकवास; उठो! आँख खोलो!

बहुत हो चुकी यह बकवास; उठो! आँख खोलो! सूफी कहानी है -- कि घर में आटा है, चावल है, दाल है, लकडी है, चुल्हा है, आग है - ओर तुम भूखे बैठे हो. आग कों जलाओ. चूल्हे पर  बर्तन चढाओ. चावला पकाओ. आटे पर पानी मिलाओ. घी  मिलाओ.  नमक डालो.  ग
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सब बना-बनाया खेल मिट जाए

मुल्ला नसरुद्दीन एक दिन गया है अपने शराबघर में और उसने जाकर पूछा कि मैं पूछने आया हूं कि क्या शेख रहमान इधर अभी थोडी देर पहले आया था? शराबघर के मालिक ने कहा कि हां, घडीभर हुई, शेख रहमान यहां आया था। मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा कि चलो इतना तो पता चला । अब
 
अन्तर सोहिल
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