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कईसे खेतवा से बोझा ढोवाई (भोजपुरी)

हिलत नाहीं पेड़वा क डाल बा गरमी से त जियरा बेहाल बा कईसे खेतवा से बोझा ढोवाई कईसे बतावा अब दऊरी दवाई सूखाय गयल देखा इ ताल बा हिलत नाहीं पेड़वा क डाल बा गरमी से त जियरा बेहाल बा . झर गयल अमवा क टिकोरवा कटहर चोराय लेहलेस चोरवा कैसों रोटी क जुगाड़ हो गयल त रीष
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याद करने लगे हैं लोग पिछला दंगा ~

जब आदमी फितरत से हो जाये नंगा मत लेना तुम उससे भूलकर भी पंगा . वह तो जमीर बेचकर आया है भाई उसे क्या वह पल में उठा लेगा गंगा . तोड़ता है क्योंकि वह खुद ही टूटा है देखने में क्यूँ न दिखे वो भला-चंगा . सलीके की बात करता है देखिये तो जिसकी जिन्दगी ताउम्र रही
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घरौन्दे की नींव आज रखिये

हथेली पर अपने ताज़ रखिये कुछ तो नया अन्दाज़ रखिये . आप तो आप हैं, नाम बेशक रीना, मेरी या शहनाज़ रखिये . ज़माना कान लगाये बैठा है दफ़्न अपने कुछ राज़ रखिये . बेसुरापन है, शोर का मंजर है संग अपने अपना साज़ रखिये . वज़ूद सलामत रखनी हो तो निगाहों में आप बाज़ रखिये .
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उसकी लालसा ~~~

आपने मेरे हर मसले पर अपना बेबाक नज़रिया दिया, ये अलग बात है कि इन्हें पूरा करने को आपने तो कोई भी न ज़रिया दिया. ~~~~~ मेरे तेरे बीच अब तो कोई रहा ना राज, फिर क्यूँ रहती हो तुम अक्सर मुझसे नाराज. ~~~~~~~ उसकी तो अब बस यही है लालसा, कि गोदी में आ जाये अब
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बस थोड़ी देर और

हालाँकि रात के तलवों मेंचुभा पाला अभी नुकीला है,सुबह हर दफा मूंहखोलती है एक टुकड़ा धुंध के साथमाथे पर ठंड का गूमड़ लिएपीठ पर कोहरे की पोटली लादे,वक्त अभी डटा हुआ है औरकहता है सूरज लेकर ही आयेगा ......नए ऊर्जा का ,नये रंग का ,नये साल का .......वक्त के इस
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मां

कुछ वक़्त हुआ, तस्वीरों का मुझे जकड़ना शुरु किये हुए...यहां-वहां, इधर-उधर शॉट्स नज़र आने लगे हैं। कुछ पोर्ट्रेट, कुछ कुदरत की ख़ूबसूरती, कहीं बेहिसाब एहसास छिटके हुए...चुनौती देने के अंदाज़ में। जैसे कह रहे हों...अच्छा, कैमरा रखते हो, चलो हमें क़ैद क
 
प्रबुद्ध
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वो अजीब एहसास

रात के दो बज रहे थे शायद, ऑफिस से वापस लौट रहा था, इस वक्त इंदिरा नगर के लिए जल्दी ऑटो नहीं मिलते इसलिए बादशाह नगर तक एक साथी के साथ आया और वहां ऑटो का वेट करने लगा। काफी देर इंतज़ार करने के बाद आखिरकार मुझे अगली सीट पर बैठना पड़ा। मैं यहाँ बैठने से बच
 
Nikhil Srivastava
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